लखनऊ [जागरण ब्यूरो]। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने इसे लोकतंत्र की अनिवार्यता के रूप में विस्तार देते हुए निष्कर्ष रखा कि विकास की राह भी इसी से निकलती है और निकलेगी। राजनीतिक दलों के रोड मैप भले ही अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन लक्ष्य विकास ही है। अलबत्ता इस बात पर मतभेद हो सकता है कि विकास का मॉडल क्या होगा और क्या तरीके अपनाए जाएं।

जेटली का कहना था कि विपक्ष की तीन भूमिकाओं 'सुझाव, विरोध और सत्ता से हटाना' राजनीतिक नजरिए से जरूरी हो सकते हैं लेकिन राष्ट्र के निर्माण में हर दल की सामूहिक जिम्मेदारी है। तर्क था कि इस समय केंद्र में भाजपा विपक्ष की भूमिका में है जबकि नौ राज्यों में उसकी सरकार है। यानी कि प्रमुख राजनीतिक दल कहीं शासन में हैं और कहीं विपक्ष की भूमिका में। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दो दशकों में विकास के राष्ट्रीय एजेंडा में क्षेत्र व राज्यों की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि विकास दर बढ़ाने या वंचितों की सेवा जैसी बातों को लेकर सिद्धांतगत अंतर नहीं होता। आतंकवाद, माओवादियों की समस्या और अलगाववादियों से निपटने आदि में भी मतभेद की गुंजाइश नहीं है।

जेटली ने कहा राजनीतिक व्यवस्था का संचालन करने वालों की 'क्वालिटी आफ गवर्नेस' पर जब लगातार सवाल उठते हैं तो लोगों का विश्वास टूटता है। ढांचागत राजनीतिक दलों की संख्या में कमी और उनकी गुणवत्ता कास्तर भी कम हो रहा है। एक नेता के इर्द-गिर्द दलों का स्वरूप सिमट रहा है। यह किसी एक दल की समस्या नहीं, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इसे साफ देखा जा सकता है।

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