राजाराम ने साथियों संग पलट दिए थे ट्रेन के डिब्बे

संवादसूत्र, लालगंज : देश को आजाद कराने में लालगंज तहसील के देऊम पूरब सांगीपुर निवासी राजाराम शुक्ल किसान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आठ नवंबर 1909 में जन्मे राजाराम अल्पायु में ही राष्ट्र के प्रति मर मिटने की कसम खाकर स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद गए थे।

12 वर्ष में ही उनके पिता सूर्यबली व 15 वर्ष की आयु में माता का निधन हो गया। इसके बाद दो बहनों व पत्नी की जिम्मेदारी इनके कंधों पर आ गई। देश में अंग्रेजों के बढ़ते कहर के चलते वह स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने से खुद को रोक नहीं सके। 13 वर्ष की आयु में ही एक दिन तीन सहपाठियों के साथ पैदल प्रयागराज पहुंचे और सरोजनी नायडू से मिले। यहां से वाराणसी में उनकी सभा में सुनने गए और बहुत प्रभावित हुए। कुछ दिनों बाद गांधी आश्रम वर्धा जाकर गांधी जी से मुलाकात किया। यहां फिरंगी हुकूमत के विरुद्ध बिगुल फूंकने का व्रत लेकर घर लौटे। किसानों को संगठित करने, लगान माफी, नमक सत्याग्रह, ट्रेन का डिब्बा पलटने, भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। कई बार जेल गए व अंग्रेजी हुकूमत का कहर झेला। राजाराम शुक्ल को 1942 में एक दिन पता चला कि अंग्रेजों की सेना ट्रेन से प्रतापगढ़ के रास्ते से होकर गुजरेगी। उन्होंने तत्काल साथियों को तैयार कर ट्रेन को पलटने की योजना बनाकर विश्वनाथगंज के पास पहुंचे। राजाराम ने यहां पर उस समय रेलवे लाइन की जो चाबी होती है उसे खोल दिया। इसके कारण ट्रेन उधर से गुजरने के दौरान पलट गई, लेकिन वह ट्रेन मालगाड़ी निकली तो वह अफसोस करते रह गए। इनके पौत्र योगेश शुक्ल कहते हैं बाबा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी गई अपनी लड़ाइयों का वृतांत सुनाते थे तो रोम रोम अंग्रेजों के प्रति आक्रोश से भर जाता था।

- महात्मा गांधी ने दी थी किसान की उपाधि

राजाराम शुक्ल ने किसानों के आंदोलन में महती भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी ने 1942 में मुंबई में ग्वालिया टैंक के मैदान पर करो या मरो का नारा दिया। इसमें प्रतापगढ़ से काफी लोग गए थे, जिसकी अगुवाई राजाराम ने किया था। यहीं पर उन्हें महात्मा गांधी ने किसान की उपाधि दी। तब से वह राजाराम किसान के नाम से विख्यात हो गए।

- देश आजाद होने के बाद बने विधायक

वर्ष 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद राजाराम का राजनैतिक जीवन शुरू हुआ। 1952 में वर्तमान रामपुरखास से कांग्रेस पार्टी से प्रथम विधायक चुने गए। इलाके में कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना किया। 1957 में उनकी पत्नी अमोला देवी इसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गईं। 104 वर्ष की अवस्था में 2013 उनका निधन हुआ।

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