अलीगढ़, जागरण संवाददाता।  The Amrit Festival of Freedom : आजादी यूं ही नहीं मिली। हजारों शहादत और लंबी लड़ाई। राष्ट्रभक्तों का सैलाब था सड़कों पर। जब तिरंगा हर तरफ लहराया तो अलीगढ़ में भी जोश और जज्बा देखते बना। इस तिरंगे की आनबान शान के आगे सब फीका लगा। शहर के प्रमुख स्थानों पर तब ध्वजारोहण किया गया था। झंडा लगाने की होड़ हर तरफ थी। यह अब भी कम नहीं। अनेक स्थान हैं, जहां तिरंगा हमारी ताकत का अहसास कराता है। आजादी के बाद तिरंगा ध्वज लगाने की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी गई। यह लड़ाई सरकारी महकमों से लेकर कोर्ट तक चली। इसमें जीत का परिणाम ही है कि हम तिरंगे को पूरे सम्मान के साथ अपने मन चाहे स्थान पर फहराने को आजाद हैं।

हर घर पर होगा तिरंगा : इस बार Independence day पर हर घर पर तिरंगा होगा। Amrit Mahotsav के चलते ऐसा किया जा रहा है। इसके लिए PM Narendra Modi ने संदेश दिया है। करीब 15 साल पहले आमजन को अपने घर, प्रतिष्ठान व फैक्ट्री पर तिरंगा लगाने की अनुमति नहीं थी। इसके लिए कई लोगों को संघर्ष करना पड़ा। इसमें अलीगढ़ के Prominent industrialist Pradeep Singhal भी शामिल रहे। उन्होंने देश के Prominent industrialist Naveen Jindal का साथ दिया और सुप्रीम कोर्ट तक में तिरंगा के लिए पैरोकारी की।

एसडीएम ने किया था चालान : सिंघल बताते हैं कि नवीन जिंदल ने भीम कामजी प्लेस नई दिल्ली में जिंदल स्टील फैक्ट्री पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगवा दिया था। सामान्य दिनों में तिरंगा लगाने की सूचना पर क्षेत्र के एसडीएम ने फैक्ट्री प्रबंधन का चालान कर दिया था। तब नवीन जिंदल सुप्रीम कोर्ट गए। इस मामले की पैरोकारी करने वालों में प्रदीप सिंघल भी शामिल रहे।

कोर्ट में तर्क दिया गया कि नेता अपनी गाड़ी पर, उनकी अर्थी पर झंडा डाला जा सकता है तो देश की अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने वाले औद्योगिक घराने झंडा क्यों नहीं लगा सकते। उनके भी दिल में देशभक्ति का जज्बा है। तब सुप्रीम कोर्ट ने गाइड लाइन जारी करते हुए आमजन को भी राष्ट्रीय ध्वज लगाने की अनुमति दी, यह भी तय किया कि ऊंची इमारत पर लगने वाले राष्ट्रीय ध्वज को रोज नहीं उतारा जा सकता। सिर्फ फटा, या प्लास्टिक का झंड नहीं होना चाहिए। तब से प्रदीप सिंघल अपने रोलर फ्लोर मिल पर हमेशा झंडा लगाते हैं। शहर में कई स्कूल व अन्य फैक्ट्रियों में भी तिरंगा लगा देखा जा सकता है।

शहर का सबसे ऊंचा तिरंगा : शहर का हर्ट आफ सिटी कहे जाने वाले सेंटर प्वाइंट स्थित अटल चौक पर जिले का सबसे बड़ा तिरंगा लगा हुआ है। इस चौराहे का स्मार्ट सिटी के तहत सुंदरीकरण हुआ है। सेंटर प्वाइंट व्यापार मंडल के अध्यक्ष दीपक गर्ग का कहना है कि जब हमारे राष्ट्र का तिरंगा लहराता है, तो सीना फ्रक से ऊंचा होता है। दूरसे शहरों से आने वाले युवा सेल्फी लेते हैं।

हमारे गौरव : देश को आजाद कराने के लिए अलीगढ़ के अनेक देशभक्तों का योगदान रहा। मड़राक के ठा. टोडर मल पहले क्रांतिकारी थे। इसके बाद मोहन लाल गौतम, द्वारिका प्रसाद जिज्ञासू, लाल महीमल, ठा. मलखान सिंह सहित क्रांतिकारियों की फेहरिस्त लंबी है। अलीगढ़ के 400 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी रहे। बड़ी संख्या में ऐसे भी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने सरकारी सुविधाएं लेने से मना कर दिया था, इसलिए वे आजादी के लिए खून बहाने वालों में शामिल होने के बाद भी गुमनाम रहे।

आठ अगस्त वर्ष 1947 को जब British Quit India का नारा दिया गया था, तब देश के साथ शहर में भी खुशियां मनाई जा रही थीं। इनमें सबसे ज्यादा खुशी महान क्रांतिकारी सुभष चंद्र बोस की फौज के कैप्टन अब्बास अली परिवार में थी। उस समय जनाब कैप्टन अब्बास अली साहब ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भारतीय राष्ट्रीय सेना में कैप्टन के पद की जिम्मेदारी भी दी थी।

लाल किले पर झंडा फहराने के आरोप में कैप्टन फांसी की सजा हुई थी जिसमें कि कैप्टन शाहनवाज खान भी शामिल थे। उनको 15 अगस्त 1947 को फांसी दी जानी थीं, क्रांतिकारियों के जूनन व आजादी के दीवानों के संघर्ष से इस दिन देश आजाद हो गया। तिरंगा लहराने लगे। कलक्ट्रेट सभागार, घंटाघर, घंटाघर स्थित चर्च आफ एसेशन, नकवी पार्क चर्च, एएमयू के परिसर में तिरंगा लहराने लगा। जहां अंग्रेजों की फौज का पड़ाव था, ऐसे कई स्थानों पर जय हिंद के नारे गूंजने लगे।

जंग के निशान : यूं तो अंग्रेजों की ज्यादती के किस्सों से इतिहास के पन्ने रंगे हुए हैं। मगर 1857 की क्रांति से जिले के गंगीरी क्षेत्र के गांव मलसई का काला जार मैदान अभी भी रक्त रंजित है। अंग्रेजी सैनिकों से इस मैदान पर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में अंग्रेजी सैनिक भी मारे गए थे। हालांकि अंग्रेजों ने इस युद्ध को एक ही दिन में जीत लिया था। उस दौर के नवाब फैज अहमद खान शेरवानी को बगावत करने पर गंगीरी क्षेत्र के दतावली में रियासत से बेदखल कर दिया था। दे

श निकाला कर दिया था, तब वे सऊदी अरब चले गए थे। यह कई साल तक सऊदी अरब में रहे। इसके बाद रियासत उनके बेटों को वापस दी गई। मगर नवाब देश में वापस नहीं आ सके। नवाब के प्रपौत्र अनीसुर रहमान शेरवानी ने महानक्रांतिकारी ठा. टोडर मल की सरपरस्ती में सोशलिस्ट पार्टी को ज्वाइन किया। शेरवानी डा. राम मनोहर लोहिया, कमांडर अर्जुन सिंह भदोरिया, मणिलाल बागड़ी, मधु लिमए जैसे नेताओं के साथ पहली पंक्ति के नेता थे। 1977 में जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे व एमएलसी बने। कांग्रेस में जाने के यह बाद मंत्री बने।

इतिहास का साक्षी है मुशर्रफ मंजिल : सिविल लाइंस क्षेत्र स्थित मुशर्रफ मंजिल निकट अब्दुला कालेज भी इतिहास का साक्षी बना। नवाब अहमद खान के बेटे नवाब मूसा खान शेरवानी (दतावली) ने वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर खादी ग्रहण की थी। नवाब परिवार के बारिस अयाज शेरवानी ने बताया है कि महात्मा गांधी एक बार नवाब मूसा खान के आवास मुशर्रफ मंज़िल निकट अबदुल्लाह कालेज आए थे। उस दौर में अंग्रेजों के खिलाफ यह कमद उठाना एक बड़ी चुनौती थी।

इनका कहना है

हमारे नानाजी ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके पिता लाला बाबू लाल को अंग्रेजों ने रईश नाम दिया था। जिज्ञासु भवन पर हमेशा तिरंगा लहराता था। हमारे यहां महात्मा गांधी व सरदार बलभ भाई पटेल भी घर आए थे। जिज्ञासु अतरौली विधान परिषद के पहले सदस्य थे।

- अनुराग गुप्ता

अपने जीवन के 97 बसंत देख चुका हूं। अंग्रेजी हुकूमत में सरकारी कर्मचारी रहा हूं। अंग्रेजों के जुल्म देखे हैं। देश आजाद तब खुद हाथरस में मिठाई का वितरण किया था। तहसील से लेकर गांव तक स्वागत किया गया। बापू को मैंने देखा है।

- रघुनंदन श्रीवास्तव

Edited By: Anil Kushwaha