लखनऊ, जागरण संवाददाता। मुख्‍यमंत्री योगी आद‍ित्‍यनाथ की कैब‍िनेट बैठक में मंगलवार को लखनऊ च‍िड़‍ियाघर को स्‍थानांतर‍ित करने के साथ ही इसे देश के पहले नाइट सफारी पार्क की तर्ज पर व‍िकस‍ित करने का फैसला हुआ है। इसके ल‍िए राजधानी के वन व‍िभाग के क्षेत्र प‍िकन‍िक स्‍पाट को चुना गया है। लखनऊ की शान और वन्यजीवों की दुनिया से अपनी पहचान रखने वाले लखनऊ चिडिय़ाघर को पहले भी कई बार हटाने की कवायद हो चुकी है। वर्ष 2001 में मायावती सरकार ने भी चिडिय़ाघर को हटाने का निर्णय लिया था और उसे हरदोई रोड पर मूसाबाग में ले जाने पर सहमति बनी थी।

उस समय सरकार के निर्णय का हर तरफ से विरोध हो गया था और तत्कालीन वन मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह ने सरकार की तरफ से घोषणा किया था कि चिड़‍ियाघर को नहीं हटाया जाएगा। हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों ने वन्यजीवों के हिसाब से चिडिय़ाघर को हटाने के निर्णय को उचित बताया है, लेकिन वे चाहते हैं कि हरियाली से छेड़छाड़ न हो। 

इसके बाद चिडिय़ाघर के जीर्णोद्धार का दौर चालू हो गया था। उसे कई बाल ट्रेन के साथ ही मनोरंजन के कई साधन मिले तो नए वन्यजीव यहां आकर्षण का केंद्र बने। नरही और पार्क रोड के अलावा डालीबाग के बीच बने 88 एकड़ वाले चिडिय़ाघर में करीब पंद्रह सौ से अधिक तरह की वनपस्तियां है जो इस इलाके के पर्यावरण को सुरक्षा देने का भी काम करते हैं। हर साल करीब पंद्रह लाख दर्शक यहां घूमने आते हैं और यहां की आय का मुख्य साधन भी दर्शकों के टिकट से होता है। यहां एक हजार वन्यजीव हैं।

पिछले साल बना था शताब्दी वर्ष : पिछले साल ही 29 नवंबर चिडिय़ाघर का शताब्दी वर्ष बनाया गया था। इस अवसर पर पांच रुपये कीमत का चिडिय़ाघर का टिकट भी जारी किया गया था। इसी के साथ ही नरही गेट से चिडिय़ाघर में प्रवेश करते ही सामने की तरफ अब शताब्दी स्तंभ भी बनाया गया है, जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया है। स्तंभ पर बबर शेर से लेकर पक्षियों व अन्य वन्यजीवों की आकृति बनी है।

वन्यजीवों के लिए था असुरक्षित माहौल : चिडिय़ाघर से जुड़ी सड़कों पर वाहनों की संख्या बढऩे से ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा था। इसी के साथ ही दीपावली के आसपास भी वन्यजीवों के सुकून में खलल पड़ती थी। दीपावली में चिडिय़ाघर प्रशासन को यह अपील जारी करनी पड़ती थी कि आसपास तेज आवाज वाली आतिशबाजी न जलाया जाए।

चिडिय़ाघर एक नजर में : 

  • उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर ने तत्कालीन प्रिंस आफ वेल्स के लखनऊ आगमन को यादगार बनाने के अवध के दूसरे नवाब नसीरूद्दीन हैदर ने बनारसी बाग को परिवर्तित कर 29 नवंबर 1921 को प्रिंस आफ वेल्स जूलोजिकल गार्डेन रखा था। बाद में अवध के नवाब वाजिद अली शाह का नाम इस उद्यान को मिला।
  • वर्ष 1960 में बाढ़ का कहर भी चिडिय़ाघर ने झेला था, तब वन्यजीवों को पानी से बचने के लिए ऊंचाई की जगह तलाशनी पड़ी। बाघ और शेर भी अपनी मांद की छत पर आ गए थे
  • वर्ष 1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी चिडिय़ाघर की सैर की थी और तीन दशक बाद उनका राजहंस जहाज भी चिडिय़ाघर की शान बन गया था।
  • वर्ष 1965 में संग्रहालय चिडिय़ाघर में शामिल हो गया। मिस्त्र की ममी (लाश, जो आज भी सुरक्षित है) भी यहां लाई गई थीं।
  • वर्ष 1968 में बाल ट्रेन चली थी।
  • 2002 में कोलकाता से जिराफ पहुंचा।
  • उमराव जान फिल्म का गाना 'दिल चीज है क्या, आप मेरी जान लीजिए' सफेद बरादरी में फिल्माया गया।
  • 15 मार्च 1995 को चिडिय़ाघर के चिकित्सक डा.रामकृष्ण दास को गेंडा लोहित ने मारा तो चिडिय़ाघर की चर्चा पूरी दुनिया में हुई थी।
  • मार्च 1998 में मोबाइल जू से लाए गए वृंदा नाम के बबर शेर ने भी चिडिय़ाघर का नाम देश दुनिया में चर्चा में रहा। पिजंड़े में अधिक समय रहने से उसकी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो गई थी। वर्ष 1999 में उसे मर्सी कीलिंग (मौत देना) का निर्णय लिया गया था। अखबारों में खबरें छपी तो देश ही नहीं विदेशों में रह रहे वन्यजीव वृंदा के पक्ष में उतर आए। दुआ ही नहीं दवाएं भी देश विदेश से आने लगी।
  • वर्ष-1998-हथिनी चंपाकली के पेट में उलटा बच्चा था। प्रसव में दिक्कत थी। खबरें छपी तो ब्रिटेन समेत कई देशों के चिकित्सकों ने सुझाव व दवाएं भेंजी।
  • वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री ने जापान के प्रधानमंत्री को हाथी का बच्चा भेंट करना चाहते थे। सड़क मार्ग से जा रहे बच्चे की हालात खराब हो गई थी और उसे बीमार हालत में चिडिय़ाघर लाया गया। यह घटना भी चर्चा में रही और जापान के राजदूत के अलावा भारत के रक्षा मंत्री भी हाथी बच्चा को देखने पहुंचे।
  • नन्हें सारस हैप्पी के पंख तराशने का मामला आया तो दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों ने हंगामा मचा दिया, लिहाजा उसे सुरक्षित गोंडा के पक्षी विहार में छोडऩा पड़ा। 

Edited By: Anurag Gupta