लखनऊ, सद्गुरु शरण। प्रियंका गांधी वाड्रा को नई यानी युवा पीढ़ी का नेता तो नहीं कहा जा सकता यद्यपि वह पुरानी पीढ़ी (राजीव-सोनिया वाली) के बाद की प्रतिनिधि हैं। वर्ष 1977 में मंत्री रहे सत्यदेव त्रिपाठी तो राजीव-सोनिया से भी पहले की पीढ़ी के कांग्रेसी हैं, जबकि उनके साथ पार्टी से बेइज्जत करके निकाले गए नौ अन्य वरिष्ठों को राजीव-सोनिया की पीढ़ी का माना जा सकता है। प्रियंका ने इन सबको धक्के मारकर पार्टी से रुखसत कर दिया, क्योंकि इन्होंने नए प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू की एक विचित्र आत्म-स्वीकारोक्ति पर आपत्ति जताई थी।

दरअसल अध्यक्ष बनने के बाद लल्लू ने यह जानकारी देकर सबको हैरत में डाल दिया था कि जीवन के शुरुआती दौर में वह धनोपार्जन के लिए सिनेमा के टिकट ब्लैक करते थे। लल्लू पहले नेता नहीं हैं जिन्हें परिस्थितियों के सामने इस तरह संघर्ष करना पड़ा। इसके बावजूद वजह और परिस्थिति जो भी रही हो, टिकट ब्लैक करना अच्छा नहीं माना जाएगा। लल्लू ने अपनी गुजरी जिंदगी का यह पन्ना किस प्रेरणा से खोला, वही बेहतर जानते होंगे, पर प्रदेश अध्यक्ष की जुबान से उद्घाटित इस सच ने अधिकतर कार्यकर्ताओं के मुंह का स्वाद कसैला कर दिया। चाय बेचने और सिनेमा के टिकट ब्लैक करने में बड़ा फर्क है।

बहरहाल टिकट ब्लैक करने से शुरू हुई जीवन-यात्रा में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर लेना साधारण उपलब्धि नहीं, पर इन सठियाए कांग्रेसियों ने इसे उपलब्धि के बजाय अनैतिक कृत्य ठहराने की कोशिश की और अंतत: इसका खमियाजा भोगकर पार्टी से बाहर हो गए। कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में लल्लू की उपलब्धियां ज्यादा चर्चित नहीं हैं। अध्यक्ष बनने के बाद एक वीडियो जरूर वायरल हुआ था जिसमें वह प्रियंका वाड्रा की कार के आगे कई अन्य कार्यकर्ताओं के साथ झूमकर नाचते दिख रहे हैं। कई कांग्रेसियों का यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अपनी बेहतरीन नृत्यनिपुणता की वजह से वह प्रदेश अध्यक्ष बना दिए गए। बेशक यूपी में कांग्रेस के अच्छे दिन नहीं चल रहे, पर इतने बुरे भी नहीं। प्रियंका जी ने उनमें कोई खूबी जरूर देखी होगी, यह बात सत्यदेव त्रिपाठी एंड कंपनी को भी समझनी चाहिए थी।

बुजुर्गों ने समझाया था कि हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए। वैसे माफी मंगवाकर मामला रफा-दफा किया जा सकता था, पर प्रियंका कुछ ज्यादा ही खफा हो गईं। शायद लल्लू फैक्टर की वजह से उनके दिल को ठेस लगी और उन्होंने अपना पूरा जीवन कांग्रेस के लिए न्योछावर करने वाले दस वरिष्ठों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। सिर्फ मक्खन-पॉलिश करके सियासी सफर में चांद-सितारे तलाशने वाले कांग्रेसी बेशक इस फैसले के लिए प्रियंका को बधाई दे रहे हैं, पर निष्ठावान कार्यकर्ताओं को नेतृत्व की यह अति-आक्रामकता अच्छी नहीं लगी। घर में ऐसी बातें होती रहती हैं। इसके लिए इतना अतिवादी कदम।

ये सब वे कांग्रेसी हैं जिन्हें हमेशा पता था कि कमजोर नेतृत्व और दिशाहीन नीतियों के कारण कांग्रेस यूपी की सत्ता में वापस नहीं आने वाली। इसके बावजूद पिछले 30 वर्षों में इनमें किसी ने कांग्रेस छोड़ने की बात नहीं सोची। कई अन्य की तरह इन्हें भाजपा, सपा या बसपा में बेहतर स्थान मिल सकता था, पर इनके दिल में कांग्रेस बसती थी। इन्हें आभास नहीं था कि उनकी जुबान से लल्लू के बारे में निकले कुछ लफ्ज उनके जीवन भर की वफादारी पर भारी पड़ जाएंगे।

जिस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद एक बुजुर्ग महिला हैं, उस पार्टी में बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार कितना उचित है, इस पर बहस करने को कांग्रेस नेतृत्व शायद ही तैयार हो। अब इसकी जरूरत भी नहीं, क्योंकि लीवर खींचा जा चुका है। भाजपा, सपा और बसपा बेशक खुश हैं, क्योंकि कांग्रेस की कमजोरियों से ही ये पार्टियां पिछले तीन दशक में मजबूत हुईं। हां, यह सोचकर कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता जरूर चिंतित हो रहे हैं कि पार्टी की दशा देख नए लोग आ नहीं रहे और पुराने धकियाए जा रहे तो फिर बचेगा कौन? प्रियंका के भरोसे की अपनी वजहें होंगी, पर क्या लल्लू में यह माद्दा है कि अकेले अपने दम पर कांग्रेस को वापस ले आएं?

योगी का अयोध्या एजेंडा जारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुछ दुकानदार टाइप हिंदू-मुस्लिम मठाधीशों को छोड़ दें तो दोनों खेमों में शांति और सुकून है। सबको भरोसा है कि विवाद सुप्रीम कोर्ट के जरिये हमेशा के लिए खत्म हो जाने के बाद अब देर-सबेर मंदिर और मस्जिद बन ही जाएंगे। इसके विपरीत मुख्यमंत्री बनते ही योगी आदित्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि विवाद को पीछे छोड़कर अयोध्या की प्रतिष्ठा एवं विकास के लिए जो एजेंडा निर्धारित किया था, उस पर निर्बाध अमल जारी है।

अयोध्या में सरयू तट पर साढ़े छह लाख दीपों का रिकॉर्डतोड़ दीपोत्सव, सरयू के किनारे विश्व में सर्वाधिक 251 मीटर ऊंची भगवान राम की प्रतिमा और सरयू पर ही गुप्तारघाट से नयाघाट तक सबसे लंबे नदी तट की स्थापना जैसी परियोजनाओं के बाद रामनगरी को त्रेतायुगीन इक्ष्वाकुपुरी के तर्ज पर विकसित करने की तैयारी मुख्यमंत्री के अयोध्या एजेंडे की ताजा कड़ी है। हिंदू श्रद्धालुओं को हमेशा यह शिकायत रहती थी कि राम और उनकी नगरी को राजनीतिक अस्त्र बनाने के बावजूद भाजपा सरकारों ने अयोध्या के विकास एवं समृद्धि के लिए कुछ नहीं किया। योगी के अयोध्या एजेंडे से यह शिकायत दूर हो गई है। इसी बीच राम मंदिर निर्माण संबंधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ जाने से अयोध्या के साथ पूरे प्रदेश का माहौल बम-बम है।

[स्थानीय संपादक,लखनऊ]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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