कैलाश बिश्नोई। अमेरिका में रोजगार प्राप्ति के इच्छुक लोगों को एच-1 बी वीजा प्राप्त करना आवश्यक होता है। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में एच-1 बी वीजा की मांग इतनी ज्यादा रहती है कि इसे हर साल लॉटरी के जरिये जारी किया जाता है। यह वस्तुत: इमीग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट की धारा 101(ए) और 15(एच) के अंतर्गत अमेरिका में रोजगार के इच्छुक गैर-अप्रवासी नागरिकों को दिया जाने वाला वीजा है। यह अमेरिकी नियोक्ताओं को विशेषज्ञतापूर्ण व्यवसायों में अस्थायी तौर पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है।

यदि पिछले दो दशकों की बात करें तो भारतीय आइटी कंपनियां अमेरिकी एच-1 बी वीजा व्यवस्था की सबसे बड़ी लाभार्थियों में से रही हैं और 1990 के बाद से प्रत्येक वर्ष जारी किए जाने वाले वीजा का एक बड़ा हिस्सा इनके खाते में ही आता है। इस वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल 50 से ज्यादा भारतीय आइटी कंपनियों के अलावा कुछ बड़ी अमेरिकी कंपनियां भी करती हैं। इस वीजा की एक खासियत यह भी है कि यह अन्य देशों के लोगों के लिए अमेरिका में बसने का रास्ता भी आसान कर देता है।

भारत में लोकप्रिय : एच-1 बी वीजा भारतीय आइटी पेशेवरों के बीच भी बेहद लोकप्रिय है। विदेश मंत्री एस जयशंकर की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, पिछले पांच वर्षो में जारी किए एच-1 बी वीजा में 70 फीसद से ज्यादा भारतीयों को मिले हैं। यूएस सिटिजेनशिप एंड इमिग्रेशन सíवसेज (यूएससीआइएस) के अनुसार 2020-21 में एच-1 बी वीजा रजिस्ट्रेशन के लिए 2.75 लाख आवेदन प्राप्त हुए हैं। इसमें से 67.7 प्रतिशत यानी करीब दो लाख आवेदन केवल भारत से हैं। वहीं, चीन से करीब 13.2 फीसद आवेदन आए हैं। इन आंकड़ों को देखकर साफ हो जाता है कि वीजा पर प्रतिबंध हटने से सबसे ज्यादा भारतीय इंजीनियर और भारतीय कंपनियां लाभान्वित होंगी। भारतीय जीडीपी में भारतीय आइटी कंपनियों का योगदान 9.5 प्रतिशत के करीब है। ऐसे में वीजा नीति के उदार होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा।

वीजा पर विवाद : पिछले साल अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में एच-1 बी वीजा एक चुनावी मुद्दा बनकर उभरा था। वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अगर वे चुनावों में जीतते हैं तो उनका प्रशासन एच-1 बी वीजा सिस्टम में सुधार करने के साथ ही ग्रीन कार्ड के लिए ‘कंट्री कोटा’ भी खत्म करेगा। उस समय इन वादों को प्रभावशाली भारतीय अमेरिकी समुदाय को लुभाने की कोशिश के तौर पर देखा गया। दरअसल अमेरिका में पिछले कई वर्षो से एच-1 बी वीजा को लेकर बुद्धिजीवी वर्ग दो धड़ों में बंटा हुआ है। इसका विरोध करने वाले वर्ग का मानना है कि आइटी कंपनियां इस वीजा का गलत तरीके से इस्तेमाल करती हैं। उनकी अक्सर यह शिकायत रही है कि एच-1 बी वीजा ऐसे कुशल कर्मचारियों को जारी किया जाना चाहिए जो अमेरिका में मौजूद नहीं हैं, लेकिन कंपनियां इसका इस्तेमाल आम कर्मचारियों को रखने के लिए कर रही हैं। इन लोगों का आरोप है कि कंपनियां वीजा का इस्तेमाल कर अमेरिकियों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को रख लेती हैं। इसके चलते पिछले कुछ वर्षो में वीजा नियमों को लेकर कई अदालती लड़ाइयां भी लड़ी जा चुकी हैं।

दूसरी बात, यह पहली दफा नहीं था कि 2019 में वीजा संबंधी नीति अमेरिका में चुनावी मुद्दा बनी हो। इससे पहले भी वर्ष 2016 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। ट्रंप ने अपनी कई चुनावी रैलियों में इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। अगर पिछले दो दशकों की बात करें तो अमेरिकी सरकारें, चाहे किसी भी दल की रही हो, उनकी मंशा रही है कि कंपनियां एच-1 बी वीजा का कम इस्तेमाल कर पाएं और इसलिए समय-समय पर इसकी फीस में भारी इजाफा भी किया जाता रहा है।

इसी क्रम में ओबामा प्रशासन ने पहले वर्ष 2010 में और उसके बाद 2016 में एच-1 बी वीजा की फीस में भारी बढ़ोतरी की थी। इसे दो हजार से बढ़ाकर छह हजार डॉलर कर दिया गया था। अमेरिका द्वारा वीजा नियमों को कड़ा करने के पीछे कारण पिछले दो-तीन दशकों में भारत और चीन जैसे विकासशील देशों में इंटरनेट और कम लागत वाले कंप्यूटरों के आगमन के साथ ही बड़ी संख्या में स्नातकों का अपेक्षाकृत कम लागत पर अमेरिका में कार्य करने के लिए तैयार होना है। इसके चलते अमेरिका में भारत सहित कई विकासशील देशों से कम लागत पर कर्मचारी आने के कारण अमेरिका के अपने घरेलू कर्मचारियों को काम मिलना बंद हो गया, जिससे अमेरिका के स्थानीय निवासियों के बीच बेरोजगारी बढ़ने लगी। इस कारण यह बात धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी कि अमेरिका अपनी वीजा संबंधी नीति को कठोर बनाए। वर्ष 2016 में कार्यभार संभालने के बाद तबके राष्ट्रपति ट्रंप ने अन्य देशों से आए हुए कामगारों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बाधक और स्थानीय लोगों से रोजगार छीनने वाले कारक के रूप में देखा। इसके बाद 2020 में कोरोना महामारी के कारण अमेरिका में बेरोजगारी दर चार गुना हो गई तो वीजा संबंधी नियमों के प्रति कठोर रुख रखने वाले ट्रंप प्रशासन ने 31 मार्च 2021 तक इस वीजा पर प्रतिबंध लगा दिया।

प्रतिस्पर्धी बने आइटी क्षेत्र : अमेरिका में भारत के कुशल पेशेवरों को वीजा संबंधी मुश्किलें और चिंताएं लगातार सताती रहती हैं। वहीं दूसरी ओर, चीन आइटी क्षेत्र में अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है। भारत इस मामले में चीन से सीख सकता है। चीन ने फेसबुक और गूगल जैसी दिग्गज आइटी सेक्टर की अमेरिकी कंपनियों को ब्लॉक किया जिसका भरपूर लाभ बायडू, अलीबाबा, वीचैट और वीवो जैसी चीनी आइटी कंपनियों तथा उनकी सíवसेज को मिला। भारत भी बड़ी अमेरिकी कंपनियों पर नियमन की दिशा में आगे बढ़े तो इसका सीधा लाभ स्थानीय टेक फर्म्स को मिलेगा। वे न केवल अपना दायरा बढ़ा सकेंगी, बल्कि देश में हजारों की तादाद में रोजगार के अवसर सृजित होंगे। आज हालात ऐसे हैं कि भारत के डिजिटल विज्ञापन कारोबार पर गूगल और फेसबुक का दबदबा है। दोनों ने मिलकर बाजार के 75 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर रखा है। यह समझने की जरूरत है कि भारत अमेरिकी टेक कंपनियों की डिजिटल कॉलोनी नहीं बने रह सकता। हमें भारतीय स्टार्ट-अप को बढ़ावा देकर उन्हें इनका मुकाबला करने लायक बनाना होगा। भारत में प्रतिस्पर्धी स्टार्ट-अप का माहौल बने तो इससे उन भारतीय प्रतिभाओं को भी प्रोत्साहन मिलेगा, जिन्होंने सिलिकॉन वैली को खड़ा किया, पर आज खुद को पीछे मान रहे हैं। हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ केवल नारा बन कर न रह जाएं। वास्तव में ये भारत में आइटी क्षेत्र के विकास की नई लहर को पैदा करने में सक्षम हो सकते हैं।

क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, रोबोटिक्स और डाटा एनालिटिक्स कुछ इस प्रकार की नई तकनीकें हैं, जिनमें रोजगार और कमाई की अपार संभावनाएं हैं। एक सरकारी अध्ययन के अनुसार भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के वर्ष 2025 तक एक खरब डॉलर तक पहुंच जाने का अनुमान है। जब पूरे विश्व में चौथी औद्योगिक क्रांति को लेकर अटकलें और तैयारियां चल रही हैं, ऐसे में भारत के लिए भी लगभग पांच करोड़ तकनीक सक्षम पेशेवरों के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न करने की चुनौती है। विश्व बैंक की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक ऑटोमेशन के कारण भारत में 69 प्रतिशत नौकरियां और चीन में इसके कारण 77 प्रतिशत रोजगार खतरे में हैं। सर्वाधिक चिंतित करने वाली बात यह है कि विशेषज्ञों के मुताबिक एक दशक के अंदर हमें यह संक्रमण देखने को मिलेगा। इसलिए यदि स्वचालन को अच्छी तरह से नियोजित नहीं किया गया तो यह निर्माण क्षेत्र में आने वाली आपदाओं की सुनामी के जैसा ही होगा, जिसमें अनेक रोजगार नष्ट हो जाएंगे।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टििफशियल इंटेलिजेंस और स्वचालन से रोजगार सृजन के मोर्चे पर व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा। मुख्य रूप से भारत की 150 अरब डॉलर की सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) इंडस्ट्री सबसे अधिक प्रभावित होगी जो वर्तमान में लगभग 40 लाख लोगों को रोजगार दे रही है। चिंता की बात यह है कि न तो मानव और न ही संगठन, तकनीक की दुनिया की गति से तालमेल बिठा पा रहे हैं। उदाहरण के लिए हर 18 महीने में कंप्यूटर प्रोसेसर की शक्ति दोगुनी हो जाती है, जबकि हर पांच साल में ये 10 गुना तेज हो रहे हैं। तेज और सस्ते कंप्यूटर तथा कहीं अधिक ‘समझदार’ सॉफ्टवेयर मशीनों को वे क्षमताएं प्रदान कर रहे हैं जो एक वक्त इंसानों के पास होती थीं। आवाज को समझना, अनुवाद करना और तय रुझानों को पहचानना इसका उदाहरण है। तकनीकों के इस बदलते दौर में जरूरत इस बात की है कि विशेषज्ञतापूर्ण कार्यो के लिए लोगों को कौशल दिया जाए और इसके लिए अवसंरचना का भी विकास किया जाए। अगर हम आइटी सेक्टर की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से लड़ने में सक्षम होते हैं तो भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी/ आइटी क्षेत्र का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

व्यवस्थित रूप से कदम बढ़ाने पर भारत के लिए अपार संभावनाओं के द्वारा खुलने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन इस सेक्टर की सफलता को सुनिश्चित करने के लिए लिए दो स्तर पर काम करने की जरूरत है। पहला, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए स्कूली शिक्षा में आमूलचूल बदलाव लाना होगा। दूसरा, उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे तैयार करना होगा कि वे विद्याíथयों को रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम प्रदान कर सकें। कौशल विकास में गति और विस्तार लाना होगा। नए युग में हमें शिक्षा और प्रशिक्षण को नए ढंग से गठित करना होगा। डिजिटल रूपांतरण से देश का लगभग हर क्षेत्र प्रभावित होगा। जब बैंकों में सूचना प्रौद्योगिकी को अपनाया गया था, तब नए अवसरों का सृजन हुआ था। इसी तरह कृषि क्षेत्र में मृदा स्वास्थ्य, तथा फसलों के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता की जरूरत पड़ेगी।

[शोध अध्येता, दिल्ली विश्वविद्यालय]

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