[राहुल लाल]। वैश्विक महाशक्तियां दुनिया को पुन: हथियारों के मुहाने पर खड़ा कर रही हैं। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया में निशस्त्रीकरण को अप्रत्याशित सफलता मिली थी, लेकिन वर्ष 2000 के बाद आर्म्स ट्रेड को महाशक्तियों ने पुन: गति प्रदान की। इसके लिए महाशक्तियां दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में फैल रहे तनावों में और वृद्धि भी करती है। एक तरह से विभिन्न देशों के बीच बढ़ता तनाव ही आर्म्स ट्रेड को प्रोत्साहित करता है। उदाहरण के लिए दक्षिण एशिया में भारत-पाकिस्तान तनाव हथियार निर्यातकों के लिए एक सुखद समाचार है। अगर भारतीय सुरक्षा के चुनौतियों की चर्चा की जाए तो इसमें दो महत्वपूर्ण कारक हैं। पहला भारत- पाकिस्तान तनाव और दूसरा चीन का आक्रामक रवैया।

चीन ने अपने रक्षा बजट में 7.5 फीसद की वृद्धि की है जो भारत के रक्षा बजट से चार गुना अधिक है। चीन का रक्षा बजट 12.5 लाख करोड़ है तो भारत का 3.18 लाख करोड़। चीन के रक्षा बजट में वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा उसके अत्याधुनिक हथियारों के अनुसंधान और विकास में जाएगा जिसे चीन पुन: हथियार निर्यात करने में प्रयोग करेगा। एक तरह से चीनी रक्षा बजट में वृद्धि जहां उसके पड़ोसी देशों समेत पूरी दुनिया को कड़ा संदेश दे रहा है, वहीं दूसरी ओर आर्म्स ट्रेड में भारी निवेश का भी संकेत मिलता है।

भारत- पाकिस्तान के मध्य तनाव में वृद्धि का चीन को भी काफी लाभ मिलता है। पाकिस्तान चीन से हथियार खरीद रहा है। पाकिस्तान की अमेरिका से दूरी बढ़ने के कारण वह चीन का सबसे बड़ा हथियार खरीदार है। चीन अपना 35 प्रतिशत हथियार केवल पाकिस्तान को निर्यात करता है। चीन के हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बांग्लादेश है, जिसकी भागीदारी चीन के कुल हथियार निर्माण में 19 प्रतिशत है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट अर्थात सिपरी के अनुसार 2008-2012 की तुलना में 2013-17 में चीनी हथियार निर्यात में 38 प्रतिशत वृद्धि हुई है। चीन हथियार निर्यात में बड़ा खिलाड़ी बनने की ओर अग्रसर है।

वहीं अगर भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व में सबसे बड़ा हथियार आयातक है। विश्व के कुल हथियार आयात में भारत की भागीदारी 12 प्रतिशत है। भारत-पाकिस्तान तनाव में वृद्धि से अंतत: देश के नीति निर्माताओं पर और भी हथियार खरीदने का दबाव बढ़ता है। भारत अपनी आवश्यकता का 62 प्रतिशत हथियार रूस से आयात करता है। अब यह झुकाव अमेरिका की ओर बढ़ता दिख रहा है। सिपरी रिपोर्ट के अनुसार 2008-12 की तुलना में 2013-17 में भारत ने अमेरिकी हथियारों के आयात में 557 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि की है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या महाशक्तियां कभी दक्षिण एशिया में शांति स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील होंगी?

अगर हम कल्पना करें कि भारत- पाकिस्तान में मित्रता हो जाए और चीन का भी इस क्षेत्र में वास्तविक सहयोगात्मक रवैया उत्पन्न हो जाए तो यह महाशक्तियों के हथियार व्यापार के लिए संकट की स्थिति होगी, वह भी तब जब दुनिया में हथियार व्यापार 2017 में ही 100 बिलियन डॉलर को पार कर चुका है। तब न तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक होगा और न ही पाकिस्तान चीन का सबसे बड़ा हथियार आयातक होगा। दोनों ही देश अपने ऊर्जा व संसाधनों को गरीबी, बेरोजगारी, आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि में प्रयोग कर सकेंगे।

हाल ही में भारत-पाकिस्तान तनाव में अगर देखा जाए तो जब भारत जैश के ठिकानों पर पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक करने वाला था, उसके पूर्व ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वियतनाम में घोषणा की थी कि भारत, पाकिस्तान पर कठोर कार्रवाई करने वाला है। उसी तरह जांबाज योद्धा अभिनंदन की रिहाई के पूर्व ही ट्रंप ने घोषणा कर दी थी कि भारत-पाकिस्तान से एक अच्छा समाचार आने वाला है। यानी संपूर्ण घटनाक्रम में पर्दे के पीछे से अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अब इस तनाव के बाद भारत में सेना के आधुनिकीकरण पर भी बहस प्रारंभ हो चुकी है। इसका सबसे ज्यादा लाभ अंतत: हथियार निर्यातक देशों को ही मिलना है।

इसी तरह महाशक्तियां मध्य पूर्व में भी तनाव में वृद्धि कर हथियार बेचने में लगी हुई हैं। मध्य पूर्व में शिया नेतृत्वकर्ता ईरान और सुन्नी नेतृत्वकर्ता सऊदी अरब के मध्य इस समय तनाव चरम पर है। ईरान सऊदी अरब तनाव की झलक सीरिया संकट और यमन संकट में स्पष्टत: देखी जा सकती है। दोनों क्षेत्रीय शक्तियां वर्चस्व की लड़ाई में संलग्न हैं। यही कारण है कि भारत के बाद सऊदी अरब दुनिया में सबसे बड़ा हथियार आयातक है जो अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार खरीदार है।

अमेरिका 34 प्रतिशत हथियार निर्यात करने के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है। सऊदी अरब के बाद अमेरिका का सबसे बड़ा दूसरा हथियार खरीदार यूएई है। कतर में अमेरिका का एक बड़ा मिलिट्री बेस भी है। इसके बावजूद ट्रंप ने अपनी पहली विदेश यात्रा में सऊदी अरब में मध्य पूर्व के देशों को कतर के विरुद्ध भड़काया। उसके बाद वर्ष 2017 से ही कतर संकट आज भी चल ही रहा है। इसमें सऊदी अरब के नेतृत्व में यूएई सहित छह देशों ने कतर पर न केवल आर्थिक प्रतिबंध आरोपित किए, बल्कि भौगोलिक प्रतिबंध भी लगाए। इन सब स्थितियों से निपटने के लिए कतर जैसा एक अत्यंत छोटा देश भी दुनिया का 20वां सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बन चुका है। इसी तरह अफ्रीकी देशों में भी महाशक्तियां स्थानीय गुटों में संघर्ष को बढ़ावा देकर हथियार बेचने में लगी हुई हैं।

महाशक्तियों की वर्तमान प्रवृत्ति ने दुनिया में शस्त्रीकरण की होड़ को प्रोत्साहित किया है। इससे निशस्त्रीकरण के प्रयासों को गंभीर चोट पहुंच रही है। आवश्यक है कि महाशक्तियां अपने संकीर्ण स्वार्थमूलक सोच से बाहर आकर विश्व शांति की ओर अग्रसर हो। विकासशील और अविकसित देश अगर शांति की ओर अग्रसर होंगे, तो उनके विकास की गति और तीव्र होगी, जो वर्तमान समय की मांग भी है।

महाशक्तियां वैश्विक तौर पर युद्ध उन्माद फैलाकर आर्म्स ट्रेड में शामिल हैं। मध्य पूर्व में शिया नेतृत्वकर्ता ईरान और सुन्नी नेतृत्वकर्ता सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिका, ब्रिटेन आदि इस तनाव में वृद्धि कर क्षेत्रीय शक्तियों को हथियार बेच रही हैं। सऊदी अरब अमेरिका व ब्रिटेन का बड़ा हथियार खरीदार है। भारत-पाक तनाव से भी अंतत: लाभ हथियार निर्यातकों को होना है। महाशक्तियों के लिए क्षेत्रीय तनाव सदैव सुखद समाचार की तरह होता है।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal