नई दिल्ली [जागरण स्‍पेशल]। सियाचिन ग्लेशियर, जिसे पूरी दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित युद्धस्थल के रूप में जाना जाता है। अब शायद सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाएगा। सरकार ने कुछ दिनों पहले ही घोषणा की है कि ग्लेशियर को पर्यटन के लिए खोला जाएगा। समुद्र तल से 16000-18000 फीट की ऊंचाई का यह ग्लेशियर सेना के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। आइये जानते हैं इस क्षेत्र में पर्यटन के लिहाज से क्या सुविधाएं मिलेंगी और क्या चुनौतियां आएंगी...

कई वर्षों से हो रही थी खोलने की मांग

पिछले कई सालों से पर्यटकों की ओर से सियाचिन ग्लेशियर को पर्यटन के लिए खोलने की मांग की जा रही थी। लोग देखना चाहते थे कि दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र आखिर दिखता कैसा है और सेना वहां कैसे अपने कार्यो का संचालन करती है। इस मांग पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले हफ्ते घोषणा की है कि सियाचिन ग्लेशियर को पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। सियाचिन के बेस कैंप से लेकर कुमार पोस्ट के बीच के 60 किलोमीटर के क्षेत्र में पर्यटकों को जाने की इजाजत मिलेगी।

अभी कहां तक पहुंच पाते थे पर्यटक

वर्तमान में पर्यटकों को कारगिल में केवल नुब्रा घाटी तक ही जाने की अनुमति है, जो सियाचिन ग्लेशियर का प्रवेश द्वार है। यह सियाचिन के बेस कैंप और आर्मी बैटल स्कूल से काफी दूर है। अब भविष्य में पर्यटकों के छोटे-छोटे बैच बनाकर उन्हें नुब्रा घाटी से आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी। अभी पर्यटक इस घाटी के वारसी और त्यक्शी गांव तक ही पहुंच पाते हैं। ये दोनों गांव 1971 के युद्ध के पहले तक पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का हिस्सा थे। 2010 तक यहां आम नागरिकों के आने पर भी मनाही थी। हालांकि, पर्यटकों को पहले भी ग्लेशियर जाने की अनुमति मिली है।

वर्तमान में कितना शांत है सियाचिन ग्लेशियर

2007-2016 तक सेना की एडवेंचर सेल ने ‘सियाचिन ट्रेक’ का संचालन किया था, जिसके तहत बहुत ही कम संख्या में आम नागरिकों को बेस कैंप से लेकर कुमार पोस्ट तक जाने की अनुमति मिलती थी। साल 2003 में युद्ध विराम लागू होने तक सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र था। यहां पर तोपें तैनात थीं। पाकिस्तान की ओर से आए दिन उकसावे की कार्रवाई होती थी और भारत जवाबी हमला करता था, लेकिन आज तोपे शांत हो गईं हैं। वर्तमान में साल्तोरो पर्वतमाला पर 23000 फीट की ऊंचाई पर सेना की चौकसी बरकरार है।

‘सियाचिन ट्रैक’ किन परिस्थितियों में संचालित किया गया था?

यह एक 30 दिन की यात्रा थी, इसमें भाग लेने वाले प्रतिभागियों को ग्लेशियर की चरम ऊंचाई तक पहुंचने के लिए बहुत कठिन हालातों से गुजरना पड़ता था। यह यात्र बेस कैंप से कुमार पोस्ट तक (60 किलोमीटर) होती थी। बेस कैंप 11000 फीट की ऊंचाई पर है तो कुमार पोस्ट 16000 फीट की ऊंचाई पर है। आर्मी की एडवेंचर सेल द्वारा यह यात्र 2007 से लेकर 2016 तक अगस्त और सितंबर माह के बीच में कराई जाती थी। इस यात्र में 45 की उम्र से कम का कोई भी नागरिक शामिल हो सकता था, जिसमें भारतीय सैन्य अकादमी, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और सैन्य स्कूलों के कैडेट भी शामिल थे।

क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं की क्या है स्थिति

सियाचिन ग्लेशियर से कुछ दूरी पर स्थित नुब्रा घाटी में अल्पविकसित चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं। दिस्कित में एक 50 बेड का उप जिला अस्पताल भी है। यहां एक्सरे, अल्ट्रासाउंड और लैब की सुविधा के साथ ही डेंटल यूनिट भी है। यह लेह से 120 किलोमीटर दूर है। इसके बाद फिर लेह में उन्नत उपचार उपलब्ध है। लेह के गांव हुंदर में मिलिट्री हॉस्पिटल और लेह जिले में एसएमएच मेमोरियल हॉस्पिटल है। इनकी क्षमता 150 बेडों की है।

पर्यावरणीय मुद्दों को भी ध्यान देने की जरूरत

अगर इस ग्लेशियर पर पर्यटन को बढ़ावा दिया जाना है तो कुछ ऐसे पर्यावरणीय मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। दुनिया के सबसे ऊंचे बैटल ग्राउंड पर केवल सेना की उपस्थिति होने से एक अनुमान के मुताबिक 1000 किलोग्राम कचरा प्रतिदिन उत्पन्न होता है। पर्यटकों के ज्यादा पहुंचने से यह कचरा और बढ़ेगा, जिससे इसके निपटान के उपाय खोजने होंगे। बेस कैंप तक वाहनों की संख्या काफी बढ़ जाएगी, जिससे अधिक गर्मी पैदा होगी और ग्लेशियर को नुकसान पहुंच सकता है। पर्यटन बढ़ने से सेना पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ेगा क्योंकि किसी भी आपातकालीन स्थिति में नागरिक प्रशासन कोई मदद नहीं कर पाएगा। इसके लिए सेना और एयरफोर्स को ही जिम्मेदारी उठानी होगी।

 

Posted By: Krishna Bihari Singh

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