यमुना होगी प्रदूषण मुक्त: नहीं आएगा गंदे नालों का पानी? सुप्रीम कोर्ट में 27 अक्टूबर को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर यमुना सहित प्रदूषित नदियों में उपचारित अपशिष्ट जल का प्रवाह रोकने की मांग की गई है।

यमुना प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। यमुना समेत देश की गंभीर रूप से प्रदूषित नदियों को बचाने के लिए अब केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और एफ्यूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) ही लगाने के बजाय इन संयंत्रों से उपचारित अपशिष्ट पानी का प्रवाह भी नदियों में रोकने की मांग हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मांग की गई है कि भविष्य में यमुना किनारे विकसित होने वाली नई टाउनशिप और औद्योगिक क्लस्टरों का उपचारित पानी भी यमुना या उसकी सहायक नदियों में छोड़ने की अनुमति न दी जाए। इसके बजाय इस उपचारित पानी का उपयोग खेती, सार्वजनिक पार्कों, वनीकरण और औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जाए।
यह याचिका डाक्टर संजय कुलश्रेष्ठ ने दाखिल की है। मंगलवार (27 अक्टूबर) को सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई करेगा। इसमें विशेष रूप से दिल्ली से आगरा तक यमुना के अत्यधिक प्रदूषित हिस्से पर चिंता जताई गई है।
यमुना एक्सप्रेस-वे के आसपास प्रस्तावित नई औद्योगिक और शहरी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए प्रदूषण की रोकथाम के लिए पहले से प्रभावी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि मांग भविष्य में विकसित होने वाली नई टाउनशिप और उद्योगों के लिए है, न कि मौजूदा अपशिष्ट निवारण व्यवस्था को चुनौती देने के लिए।
याचिका में जल संसाधन संबंधी स्थायी संसदीय समिति की 29 फरवरी, 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, नगरपालिकाओं से निकलने वाला अनुपचारित सीवेज यमुना में कुल प्रदूषण का लगभग 80 प्रतिशत योगदान देता है।
जल शक्ति मंत्रालय की फरवरी 2025 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जून 2024 तक लक्षित सीवेज उपचार क्षमता का केवल 52 प्रतिशत हासिल हो पाया था। 13 मार्च, 2025 को जल शक्ति मंत्रालय ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि सीवेज संबंधी बुनियादी ढांचे की अक्षमता के कारण प्रदूषित नदियों की स्थिति में अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं। नदियों में अत्यधिक मात्रा में मलजनित प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या है।
याचिका में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि अप्रैल 2025 तक 37 में से 16 एसटीपी मानकों पर खरे नहीं उतरे। औद्योगिक प्रदूषण के संदर्भ में कामन एफ्यूलेंट प्लांटों की सीमित क्षमता और मानकों का पालन नहीं करने वाले उद्योगों की समस्या रेखांकित की गई है। वैकल्पिक रूप से यमुना के लिए नदी बेसिन समिति या विशेष कार्य बल गठित करने की मांग की गई है।
तर्क दिया गया है कि नदियों की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। इसलिए प्रदूषण स्रोतों को रोकना भी जरूरी है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर नदी का प्रदूषण कम करने के साथ भूजल और सतही जल पर बढ़ते दबाव को घटाने में भी मदद मिल सकती है।
