नई दिल्ली, यशा माथुर। बाइक पर सवार होकर 21 देशों की सफल यात्रा के बाद भारत लौटीं सूरत की डॉ. सारिका मेहता के चेहरे पर चुनौती पूरी करने की चमक है, जीत की झलक है। जब निकली थीं मिशन पर, तो उन्हें नहीं मालूम था कि रास्ते में कितनी कठिनाइयां आने वाली हैं? अपने और बाइक के सारे कागजात पूरे कर, यात्रा का पूरा खाका फाइनल कर वे भारत से आगे बढ़ीं लेकिन कभी मौसम ने कदम रोकने की कोशिश की तो कभी अनजानी मुश्किलों ने। लेकिन जहां चुनौतियां मिलें वहां ठहर जाना उनकी आदत में शुमार है। उन्होंने स्वीकार किया इम्तिहानों को और अपने लक्ष्य को पाकर ही दम लिया। उनके प्रत्यक्ष अनुभव प्रेरणा देते हैं, जीत का जज्बा दिखाते हैं। पेश है उन्हीं की जुबां से उनके 90 दिन के दुनिया के सफर की कहानी ....

हर दिन एक चुनौती थी

मैंने रूताली पटेल और जीनल शाह के साथ यात्रा की शुरुआत की और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी ने वाराणसी से हमें हरी झंडी दिखाई। हमें नेपाल के रास्ते आगे बढऩा था और म्यांमार होते हुए चीन की सीमा में प्रवेश करना था, लेकिन म्यांमार की आंतरिक समस्याओं के चलते वह रास्ता बंद मिला। हमें पूरा रास्ता बदलना पड़ा। हमने तय किया कि नेपाल की दूसरी सीमा से प्रवेश करेंगे, लेकिन वह बहुत मुश्किल रास्ता था। हमने स्थानीय लोगों और बाइकिंग कम्युनिटी से बात की तो पता चला कि नेपाल में आए भूकंप के बाद वह पूरा रास्ता टूटा हुआ और चट्टानों से भरा है। उन्होंने कहा कि उसे आप पार नहीं कर पाएंगे। आपकी बाइक्स भी टूट सकती हैं। लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। हमें उसे करना ही था। 70 किलोमीटर पूरा करने में हमें आठ-नौ घंटे लगते थे। बड़ी मुश्किलों के बाद हमने चीन में प्रवेश किया। हर दिन एक चुनौती थी।

पहली महिला, जो एवरेस्ट बेस कैंप तक बाइक पर गईं

मैं एक माउंटेनियर भी हूं। मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि एवरेस्ट बेस कैंप तक बाइक से जाऊंगी। जैसे ही तिब्बत में आए तो पता चला कि हम एवरेस्ट बेस कैंप तक जा सकते हैं। लेकिन वह खतरनाक है और उसके लिए शरीर भी तैयार होना चाहिए। हमें 8500 मीटर की ऊंचाई तक जाना था। जैसे हमें ऑक्सीजन की जरूरत होती है वैसे ही बाइक को भी ऑक्सीजन की जरूरत होती है। लेकिन जैसे ही कोई चुनौती सामने आती है तो उसे पूरा करने की ठान लेती हूं। फिर क्या था पूरा तिब्बत हमने बाइक पर नापा। और मैं दुनिया की पहली महिला बाइकर बनी, वो भी भारतीय, जो एवरेस्ट बेस कैंप तक बाइक पर गई हूं। खाने से लेकर सेहत तक की कई दिक्कतें आईं क्योंकि हम जीरो लेवल पर थे। हमारी तबियत भी बिगड़ी। लेकिन यह मेरे लिए गौरव का क्षण था।

बर्फीले तूफान में 32 घंटे फंसे रहे

नेपाल में गर्मी थी। तिब्बत में ठंड थी। वहां एक बर्फीला तूफान भी आया जिसमें हम 32 घंटे तक फंसे रहे। दो पहाड़ों को जोडऩे वाला पुल क्षतिग्रस्त हो गया। पूरी सड़क ब्लॉक हो गई। वहां कोई जगह नहीं थी रुकने की। साथ में बहुत थोड़ा खाना था। सड़क जाम हो गई, तापमान माइनस हो गया। हम फ्रीज हो गए। एक क्षण को लगा कि हम आगे नहीं जा पाएंगे। हम बाइक पर खुले में थे। शरीर ठंड सहन नहीं कर पा रहा था। खाना और पानी खत्म हो गया था। फिर सोच आई कि बाइक पर लंदन जाने का फैसला मेरा था, इस रास्ते पर आने का फैसला मेरा था तो मुझे ही इसका सामना भी करना होगा। मदद की सोच बेकार है। मेरे पिताजी कहते थे कि मुश्किल समय है तो अच्छा भी आएगा। बस सीखो और आगे बढ़ो। इसी सोच के साथ आगे बढऩे की हिम्मत की। दूसरे दिन सुबह रास्ता खुला तो हम वहां से निकले। हम बच गए। आज सोचते हैं कि जिस हिम्मत को हम बाहर ढूंढ़ रहे थे वह तो हमारे भीतर ही थी। बस उसे बाहर निकालने की जरूरत थी। यह मुश्किल एक लर्निंग थी।

चीनियों को मनाने की मशक्कत

नेपाल में हमारा बहुत अच्छा स्वागत हुआ। फिर जब हम चीन की और बढ़े तो वे हमें लेने तक को तैयार नहीं थे। यह सीमा तिब्बत की तरफ आती है और आम लोगों के लिए नहीं है। इन दोनों के बीच भी तनाव है। वे मानने को तैयार नहीं थे कि भारतीय महिलाएं यूं बाइक पर दुनिया को नापने निकल सकती हैं। एक तो वहां भाषा की समस्या भी बहुत थी। वे अंग्रेजी भी नहीं समझते। वहां सोशल साइट्स भी नहीं चली। गूगल बंद था। ट्रांसलेशन की एप भी नहीं चली। बचपन के खेल की तरह इशारों में ही उन्हें समझाया। हमारे डॉक्यूमेंट्स काफी मजबूत थे क्योंकि हमने पहले दस देशों की यात्रा की थी। उसमें जो मुश्किलें आईं उन्हें समझ कर कोई गलती नहीं की। खैर किसी तरह से वे माने और हमें चीन में आने दिया। अब गहन चेकिंग की बारी थी। बैग्स की एक-एक चीज हटा कर देखी उन्होंने।

चीन में हमारा लाइसेंस और नंबर प्लेट नहीं चली

चीन में हमारे पास खाना नहीं था। उनको शाकाहार समझाना मुश्किल था। कोई भी साइन बोर्ड हम समझ नहीं सकते थे, सड़क समझ नहीं आ रही थी। चीन के लोग मदद करने वाले भी नहीं थे। जैसे ही प्रवेश किया तो बताया गया कि आपका लाइसेंस और आपका नंबर प्लेट नहीं चलेगा। अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक हमारा अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस और बाइक का वीजा सब जगह चलता है। हमें फिर लगा कि अब आगे नहीं जा पाएंगे। फिर एक आदमी ने बताया कि यहां का एक एजेंट लीजिए जो आपके साथ तब तक रहे जब तक आप चीन में हैं। हमने ऐसा ही किया। हम एजेंट के साथ गए। अपनी बाइक रजिस्टर करवाई फिर मेडिकल चेकअप के बाद वहां का लाइसेंस और वहां का नंबर लिया। समय भी बहुत लगा लेकिन समाधान तो निकालना ही था। उस नंबर प्लेट को अभी भी साथ रख रहे हैं। हां, वहां की सड़कें बहुत अच्छी हैं। 170-180 स्पीड पर पता भी नहीं चलता था। हमें सात चेकिंग पोस्ट पार कर चीन से बाहर निकलना था। वह सिनजांग सैन्य क्षेत्र था। पहली चेकपोस्ट पर हमारा मोबाइल और लैपटॉप को पूरा स्कैन किया गया। जो उन्हें सही नहीं लगता उसे डिलीट कर देते। उन्होंने अपना सॉफ्टवेयर लोड किया। बहुत कठिनाई हुई चीन में।

तीन देश सुंदर थे लेकिन ...

चीन से हमने किर्गिस्तान में प्रवेश किया। यहीं से कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान गए। ये देश बहुत अच्छे, सुंदर थे लेकिन सड़कों की हालत बहुत खराब थी। कहीं-कहीं 300, 400 किमी. तक सड़क थी ही नहीं। सिर्फ पत्थर और मिट्टी होती। सौ किलोमीटर तक शेड नहीं मिलता। रेगिस्तान था। कितनी बार हमारे पास पेट्रोल खत्म हो जाता। खाना भी नहीं मिलता। पत्थर जैसी ब्रेड मिलती। हम लोगों से उनका किचन प्रयोग करने की रिक्वेस्ट करते, बाजार से आटा, चावल और सब्जी लाते और खाना बनाते। वहां हमसे बहुत अलग कल्चर है। कई वीडियोज बनाए हैं हमने। यहां यह जाना कि सब जगह पर महिलाओं को अभी भी इज्जत नहीं मिलती। अभी नारी को सशक्त करने की जरूरत है। गांवों में लोग अभी भी महिलाओं को उतना सम्मान नहीं देते हैं।

जब रूस में पासपोर्ट, वीजा खो गए

जब हम रूस में गए तो मास्को में गुजराती लोगों से मिले। कई दिनों बाद हमें गुजराती खाना मिला। अपनी डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए हम रेडस्क्वॉयर गए। वहां कोई फेस्टिवल चल रहा था और बड़ी भीड़ थी। हम वहां वीडियोज बना रहे थे। बैग हमारी पीठ पर थे, उनमें पासपोर्ट थे। वहां बहुत ठंड थी और एक राइडर की बाइक पीछे थी। किसी ने उनका पर्स निकाल लिया। हर जगह भारतीय दूतावास में हमारा स्वागत होता। यहां भी हमने दूतावास में डिनर किया। दूसरे दिन जब हमें रूस क्रॉस करके लातिविया में प्रवेश करना था। हम तीनों जल्दी ही निकल गए। करीब 600 किमी. आगे आ गए और सीमा करीब 100 किमी. आगे थी। बहुत ठंड और बारिश में हमने ब्रेक लिया और एक जगह कॉफी पी, वहां मैंने पर्स निकालना चाहा तो देखा कि पासपोर्ट वाला पर्स बैग में नहीं था। उसमें हमारा और बाइक का पासपोर्ट, वीजा, बाइक का आरसी बुक सब था, और वही नहीं था। हमें दूसरे ही दिन बॉर्डर क्रॉस करना था। गौर से देखा तो बैग नीचे से काटा गया था।

वापस इंडिया लौटना पड़ा जीनल को

हमें होटल बुकिंग के हिसाब से ही वीजा मिलता है। अब हम सोच में पड़ गए कि क्या करें? मैंने एंबेसी फोन किया, एंबेसेडर से रात को ही बात की। उन्होंने उन जगहों पर पासपोर्ट, वीजा ढुंढ़वाया जहां हम रुके थे। लेकिन वह कहां मिलना था? एंबेसेडर ने हमें कहा कि जिनकी पहचान खो चुकी है वे आगे नहीं बढ़े। मैं गाड़ी भेजता हूं, डिप्लोमेट की गाड़ी में ही सफर करें नहीं तो बहुत मुश्किल होगी। उन्होंने 600 किमी. दूर गाड़ी भेजी। हम चिंता में थे कि उसे छोड़ कर आगे कैसे जाएं? हम दो दिन रुके लेकिन एंबेसेडर ने कहा कि प्रैक्टिकल बनिए, और आगे बढि़ए। अगर आपके वीजा भी खत्म हो जाएंगे तो हम सभी का वीजा नहीं बनवा पाएंगे। इनका पासपोर्ट और वीजा बन जाएगा तो यह कहीं भी जा सकेंगी। लेकिन बाइक नहीं जा पाएगी। हमने फैसला किया कि उन्हें वहीं रुकना होगा। हम आगे बढ़ गए और लातिविया चले गए। वे मास्को में रिश्तेदार के यहां रुक गईं। बाद में उनका पासपोर्ट और वीजा बना और जीनल दिल्ली आ गईं।

... और बाइक्स ही चोरी हो गईं

हम लातिविया, लिथुवानिया, पोलैंड होकर जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया गए। एल्प्स पर भी हमने राइड की। हर जगह हमने कार्यक्रम किए। इसके बाद जब नीदरलैंड्स पहुंचे तो हमें पता नहीं था कि यहां हमारे सामने सबसे बड़ी कठिनाई आने वाली है। वहां हमने एक कार्यक्रम किया, सुषमा स्वराज जी की प्रार्थना सभा में भाग लिया और रात को होटल के बाहर बाइक पार्क कर, लॉक कर हम सोने चले गए। अगले दिन सुबह छह बजे ही हमें एंट्रप होते हुए पेरिस के लिए निकलना था। वहां हमारा भव्य स्वागत किया जाना था। सुबह जब हम नीचे आए तो पाया कि हम दोनों की बाइक ही नहीं हैं। हमारे पैरों तले जमीन ही खिसक गई कि हमारी बाइक्स कहां गायब हो गईं। होटल में बताया तो बोले कि ऐसा हो ही नहीं सकता। हम पुलिस से संपर्क करते हैं। शायद उन्होंने उठवाई है। लेकिन सिस्टम में ऐसा नहीं दिख रहा था। हमने सीसीटीवी फुटेज मांगे तो उन्होंने एफआइआर करवाने के लिए कहा।

कोर्ट में जाना पड़ा

उस दिन रविवार था। दो पुलिस स्टेशन में कोई मिला नहीं। तीसरे पर एक महिला अधिकारी मिलीं, उन्होंने हमारी मुश्किल को समझा। उन्होंने तुरंत एफआइआर दर्ज की और सीसीटीवी फुटेज को देखा दुर्भाग्य से होटल का सामने वाला कैमरा काम नहीं कर रहा था। तो उसमें भी कुछ नहीं मिला। फिर पुलिस ने सड़क के सरकारी सीसीटीवी चेक करने के लिए कहा लेकिन उसके लिए हमें कोर्ट में एप्लीकेशन देनी थी। वह मेरे लिए बहुत ही मुश्किल समय था। क्योंकि मुझे फैसला करना था। यात्रा हमें बाइक पर करनी थी और हमारे पास बाइक्स नहीं थी। अब हम क्या करें? कुछ सूझ नहीं रहा था। पुलिस अधिकारी ने कहा कि केस में टाइम लगेगा। आप वापस अपने देश चले जाएं।

बिटिया ने सुझाया आइडिया

एंबेसेडर से बात की तो वे बोले कि अपना फैसला आप करें। हम वापस भारत जाने में आपकी मदद कर सकते हैं। कोई रास्ता नहीं मिल रहा था। मुझे अंदर से लगा कि अब मैं यह यात्रा पूरी नहीं कर पाऊंगी। अंत में मैंने अपने बच्चों, पति और दोस्तों को वीडियो कॉन्फ्रेंस में लेकर अपनी स्थिति बताई और कहा कि अब मुझे अपनी यह यात्रा बीच में ही छोडऩी पड़ेगी। हमें घर वापस आना पड़ेगा। बाद में फिर से यह मिशन पूरा करूंगी। पंद्रह अगस्त को हमें बार्सिलोना पहुंच झंडा फहराना था। एंबेसेडर ने हमें आमंत्रण दिया था। हमारे लिए बहुत बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन था। हमें वहां पहुंचना ही था। अचानक ही मेरी छोटी बेटी ने कहा कि मम्मी आप दूसरी बाइक ले लो और अपनी यात्रा पूरी करो। यह तो जरूरी नहीं कि आपके पास वही बाइक हो। हमें आप पर पूरा विश्वास है कि आप यात्रा पूरी करके ही लौटेंगी। उसका आइडिया मुझे क्लिक कर गया। पति ने कहा आप समस्याओं से ज्यादा मजबूत हो। नहीं जानते थे कि इतनी बड़ी मुश्किल का आपको यूं समाधान मिल जाएगा।

स्पेन के दोस्त बाइक लेकर आए

हमारी यात्रा को हमारे कई इंटरनेशनल फ्रेंड्स देख रहे थे। क्योंकि मैं डब्ल्यूएचओ की बाइक राइड्स में भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं। स्पेन के एक दोस्त ने कहा कि आप बहुत बड़ी प्रेरणा हैं। जहां से आपकी बाइक्स चोरी हुई हैं वहीं से आप अपनी यात्रा शुरू करो। वे स्पेन से 1000 किमी. की यात्रा करके हमारे लिए बाइक लेकर आए। अब जो बाइक्स आई थीं वे बीएमडब्ल्यू थीं और बहुत भारी थीं। बहुत पावरफुल थीं। जो बाइक हम पहले चला रहे थे और अब जो आईं थीं उनमें बहुत अंतर था। लेकिन भगवान को साबित करना था कि भारतीय महिलाएं सब कुछ कर सकती हैं। और हमने अपनी यात्रा फिर से शुरू की। वहां से पेरिस गए, बार्सिलोना में पंद्रह अगस्त को झंडा फहराया। मोरक्को गए। फिर बार्सिलोना होते हुए पेरिस आए वहां संत मुरारी बापू ने हमारा स्वागत किया। वहां से हम यूके गए। यहां हमारी यात्रा समाप्त होनी थी। लेकिन मैंने यह जाना कि जितनी भी मुश्किल हमें आती थी तो हम बाहर समाधान ढूंढ़ते हैं लेकिन हम खुद में ही समाधान है। अगर हम गिरते हैं तो खुद को ही उठना पड़ता है। यूके में हमारा बहुत स्वागत हुआ। वहां हमें वल्र्ड रिकॉर्ड दिया गया। हम पहली महिलाएं बनीं जिन्होंने सामाजिक अभियान के साथ यह मुश्किल यात्रा की। फिर हम दिल्ली लौटे और सूरत गए जहां 90 दिन बाद बच्चों से मिले।

महिला सम्मान के लिए राइड की

हमने अपनी पहली राइड सूरत से लेकर सिंगापुर तक की थी, इस दौरान 10 देश गए और प्रधानमंत्री के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को फैलाया। वहां हमने स्थानीय लोगों के साथ बात की थी। इसके बाद हमने ऑल इंडिया राइड की थी जिसका संदेश सशक्त नारी, सशक्त भारत था। इस बार की यात्रा महिला सम्मान को लेकर थी। इस राइड में हमने जाना कि लोग महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं लेकिन उनके अपने घर पर ही उन्हें सम्मान नहीं मिलता। हमने अपनी यात्रा के दौरान कई देशों के महिला समूहों और स्थानीय लोगों के साथ बात की, जो वहां काम करते हैं। प्रोफेशन से मैं साइकोलॉजिस्ट हूं। मुझे पता है कि बात करना बहुत अच्छा रहता है। मैं बहुत अच्छी तरह से बात कर सकती हूं।

हमने खुद प्लेटफॉर्म क्रिएट किया

पूरे भारत से महिलाएं हमें कहती थीं कि आप सही बोल रही हैं लेकिन हम कोई कदम नहीं उठा पा रहे हैं आपको तो एक प्लेटफॉर्म मिला हुआ है। उनसे मैं कहना चाहती हूं कि हमें किसी ने यह प्लेटफॉर्म दिया नहीं है हमने क्रिएट किया है। यह राइड हमने खुद प्लान की है। खुद को समय देना जरूरी है, शिकायत नहीं करनी है। क्योंकि जो फैसले आपने लिए हैं वे आपके हैं। तीसरा कोई आपकी मदद करने वाला नहीं है क्योंकि जिस रास्ते पर आप जा रहे हैं, उसे आपने चुना है। चौथे, आपको खुद अपना सम्मान हासिल करना होगा। हम सम्मान के लिए भी दूसरों के मोहताज रहते हैं कि कोई हमें सम्मान दे।

कम से कम छह प्लान होने चाहिए

लक्ष्य छोटा बड़ा नहीं होता, बस लक्ष्य होता है। मैं सुरक्षा का बहुत ध्यान रखती हूं क्योंकि घर पर सब परिवार वाले मेरा इंतजार कर रहे होते हैं। मैं फैमिली पर्सन हूं। हमने अपनी पिछली यात्राओं से सीखा है कि केवल एक योजना से आपका काम नहीं चलता। आगे बढऩे के लिए कम से कम पांच या छह प्लान आपके पास होने चाहिए। प्लानिंग पहले से होनी चाहिए। हम टूट जाते हैं क्योंकि हमारे पास दूसरा प्लान नहीं होता। हमें शुरुआत में ही म्यांमार सीमा पर रोक दिया गया लेकिन हमारे पास अगला प्लान बी था जिसे हमने तुरंत लागू कर दिया। मैं यह सुनिश्चित करती हूं कि जिस देश में जाएं वहां के नियमों और लोगों का सम्मान करें।

मैं साइकोलॉजिस्ट हूं

महिला के रूप में हम घर, बच्चे संभालते हैं, काम करते हैं तो अपना पैशन क्यों नहीं फॉलो कर सकते। हमें भगवान ने हमें अपना सपना पूरा करने का हौसला भी दिया है। मैं दुनिया नहीं बदल सकती लेकिन अपने तरीके से समाज की भलाई के लिए काम कर सकती हूं। शिकायत करने से अच्छा समाज के भले के लिए एक कदम उठाइए। मैंने यही किया है। हमारे बच्चे हमें देख रहे हैं। मैं सूरत जैसे छोटे शहर में रह कर यह सब कर रही हूं तो मेरे बच्चे भी ऐसा कर रहे हैं। वे दोनों कम उम्र में माउंटेनियर है। उनके लिए हीरो मैं ही हूं। यह मेरे लिए प्राउड मूमेंट है। वह मुझसे पॉजिटिविटी और एडवेंचर सीख रहे हैं।

मानसिक मजबूती जरूरी

फिटनेस में दो चीजें बहुत जरूरी हैं। मैं माउंटेनियर हूं तो वर्कआउट तो करती हूं। क्योंकि बैक बहुत इंपॉर्टेंट है। लेकिन राइडिंग के लिए मेंटल हेल्थ सही होना बहुत जरूरी है। हर दिन 400-500 किमी. की यात्रा। कार्यक्रम अटेंड करो। मुश्किलों को जीतो। मानसिक मजबूती जरूरी है। यही राइडिंग की सफलता का आधार है। घरेलू उपचार करते हैं। मैं हर दिन हल्दी का दूध लेती हूं जो एंटीबायोटिक काम करता है। हमें अपने इम्यून सिस्टम का बहुत ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि हम माइनस डिग्री में और 48 डिग्री तापमान में रेगिस्तान में भी राइड करते हैंं। हर दिन मौसम बदलता है और हर दिन पानी बदलता है जिससे इन्फेक्शन होने की नौबत आ जाती है। मैं अध्यात्म में विश्वास रखती हूं। सुबह की प्रार्थना और राइड के बाद की मेंटल सेटलमेंट और शांति के लिए मेडिटेशन मैं बहुत पहले से ही करती हूं। यह मुझे बहुत सपोर्ट करता है। हमने याक, ऊंट और बकरी का दूध पिया है।

सफर के दौरान लाइफ स्टाइल

हम अपना मसाला लेकर चलते हैं। जो भी सब्जियां मिलती हैं उनमें अपना मसाला डाल लेते हैं। क्योंकि बाहर देशों की तो उबली सब्जी भी अजीब होती है। चावल भी चिपचिपा सा होता है। ड्राई फूड पैकेट्स भी होते हैं लेकिन वे इतने काम नहीं आते। सब कुछ खत्म होने पर हम स्थानीय लोगों से कुछ देर के लिए किचन प्रयोग करने की इजाजत मांगते हैं और अपना खाना बना लेते हैं। हमारे बैग में दो टीशर्ट, दो जींस और एक रेन कोट होता है। कपड़े रोज रात को धोते हैं जो दूसरे दिन सूख ही जाते हैं। बारिश के दिनों में हमारे पास ब्लोअर होता है। कपड़े सुखाने की दिक्कत नहीं होती। बड़ी जरूरत फस्र्ट एड बॉक्स, दवाइयों की होती है। यहां भारत में हम पहले दिन से ही एंटीबायोटिक खाते हैं और विदेश में एंटीबायोटिक कोई डॉक्टर आसानी से देता नहीं है। इसलिए अपनी दवाइयां लेकर चलना बहुत जरूरी होता है। हम बाइक के स्पेयर पाट्र्स भी लेकर चलते हैं। भारत के लिए बनी इस केटीएम 390 के स्पेयर पाट्र्स कहीं नहीं मिलते। एक बार मेरी बाइक डैमेज हुई तो भारत से स्पेयर पार्ट कोरियर से मंगाना पड़ा। ओरिजिनल डॉक्यूमेंट्स भी हर वक्त साथ रखते हैं।

प्रेरणा है परिवार

परिवार में सास-ससुर हैं, मेरे पति जिग्नेश मेहता हैं और दो बच्चे हैं। पति ने ही मुझे बाइक चलाना सिखाया। मेरी बेटी धनुश्री मेहता और बेटा जनम मेहता है। उनकी अपनी पहचान है। वे 'यंगेस्ट माउंटेनियर इन द वल्र्डÓ हैं। बहुत छोटी उम्र में उन्होंने रूस के माउंट एल्ब्रुस की चढ़ाई की। गए तो हम चारों थे। मेरे पति माउंटेनियर नहीं थे। लेकिन बेटी के जाने पर वे भी साथ गए और हम चारों ने यह पर्वतारोहण किया। इसके बाद बच्चों ने दो और पहाड़ की चढ़ाई की है। परिवार में हम शिकायत नहीं करते हैं बल्कि एक-दूसरे की प्रेरणा बनते हैं।

स्त्रीशक्ति का प्रतिनिधित्व

इन नब्बे दिनों में काफी कुछ सीखने को मिला। बहुत सारी संस्कृतियां और जगहें देखीं। बहुत ही अच्छे लोगों से मिले। अच्छे दोस्त बने। जो अनुभव हुआ वह अच्छा ही था। बाइक चोरी हो जाने की सूरत में भी हमने यह सीखा कि हममें ही वह शक्ति है जो समाधान देती है। हम इसे बाहर ढूंढ़ते हैं लेकिन खुद में पावर होती है। हर अनुभव सिखाने वाला था। सूरत में हमारी संस्था 'बाइकिंग क्वीन' है जो हमारा सपना है। यह चैरिटेबल ट्रस्ट है। हमारे सामाजिक अभियान भी चलते रहते हैं। बाइकिंग क्वीन की तरफ से मैं पिछले पांच सालों से भारत का यूएन में प्रतिनिधित्व कर रही हूं। बाइक एक माध्यम है जो स्त्रीशक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें 45 लड़कियां हैं जो बाइक चलाती हैं।

मैंने सीखा है समस्याओं का सामना करना

मैं फाइनेंस में एमबीए कर रही हूं। पिछले तीन साल से बाइकिंग कर रही हूं। मैं ऑल इंडिया राइड कर चुकी हूं। मैं टिपिकल काठियावाड़ी परिवार से हूं। जहां लड़कियों पर शादी का दबाव रहता है। लड़कियों को बाहर भेजना नहीं चाहते लेकिन मेरे पिता ने मेरा सपना पूरा करने में मुझे बहुत सपोर्ट किया। मैंने समस्याओं का सामना करना सीखा है।  

रुताली पटेल, स्टूडेंट

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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