नई दिल्ली [सुरेंद्र प्रसाद सिंह]। ‘डेढ़ सेर का आम तब होगा काम’ यह कहावत भले ही मजाक में कही जाती हो, लेकिन आज सीमित होते प्राकृतिक संसाधनों से इसी तरह की उत्पादकता की जरूरत है। आज यह सब संभव भी है। हालांकि, इसके लिए उपयुक्त मॉडर्न टेक्नोलॉजी की जरूरत है। इसके लिए देश में कुशल वैज्ञानिकों की जरूरत होगी, जो इसे समझें और ऐसी खेती पर जोर दें।

कृषि को विज्ञान और मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लैस करने की जरूरत है, लेकिन कुशल वैज्ञानिकों की भारी कमी के चलते इस जरूरत को पूरा करना आसान नहीं होगा। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कुछ संसाधनों की किल्लत से जूझ रहा है। सवा सौ अनुसंधान संस्थानों और केंद्रों के अलावा लगभग एक सौ कृषि विश्वविद्यालयों के हाल बुरे हैं, जहां भारी संख्या में पद रिक्त हैं। वहां पढ़ने वाले छात्रों की दशा भी संतोषजनक नहीं है। ऐसे में कृषि की दशा व दिशा सुधारने की योजना कागजों तक ही रह जाएगी।

कृषि मंत्रालय से जुड़े आईसीएआर के लगभग सवा सौ संस्थान देशभर में फैले हुए हैं, जिनका दायित्व देश की कृषि को उन्नत बनाने का है। लेकिन ये संस्थान इन दिनों कृषि वैज्ञानिकों, तकनीकी व प्रशासनिक अधिकारियों की कमी से बुरी तरह जूझ रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) समेत लगभग तीन दर्जन संस्थानों में निदेशक के पद तक खाली पड़े है।

देश के सभी जिलों में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्रों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहे ज्यादातर केवीके में अनुसंधान के साथ प्रसार का काम ठप पड़ा हुआ है। राज्यों की प्रसार प्रणाली पहले से ही ध्वस्त चल रही है। ऐसे में कृषि क्षेत्र के उद्धार की सारी योजनाओं पर सही से अमल करना आसान नहीं होगा। कई सालों से लगातार हो रही रिक्तियों को भरा नहीं जा रहा है।

दरअसल, इसके लिए कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड है, जिसका गठन कई सालों के बाद हो सका है। होने वाली नियुक्ति प्रक्रिया शुरु हो चुकी है, लेकिन रफ्तार बहुत मद्धिम है। सूत्रों के मुताबिक आईसीएआर ने अपने सभी अऩुसंधान संस्थानों को निर्देश भेजकर वैज्ञानिकों की भर्ती ठेका पर करने को कह दिया है, जो अपने आप में कृषि शोध के साथ भद्दा मजाक होगा।

Posted By: Amit Singh

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