नई दिल्ली, विनीत शरण/पीयूष अग्रवाल। बढ़ते प्रदूषण के चलते कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली आज दुनिया की जरूरत बन चुकी है, इसीलिए इन नए स्रोतों से मिलने वाली बिजली का जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ती होना भी जरूरी है। कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन से अब तक ज्यादातर बिजली उत्पादन होता रहा है, क्योंकि अब से पहले ऊर्जा के नवीन स्रोतों की तुलना में इससे बिजली सस्ती पड़ती थी। पर पिछले कुछ दशकों में इसमें काफी परिवर्तन हुए हैं। दुनिया के कई देशों में नवीन ऊर्जा स्रोतों से पैदा होने वाली बिजली जीवाश्म ईंधन की बिजली की तुलना में सस्ती पड़ने लगी है। इस बदलाव का कारण है नवीन ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों का लगातार बेहतर होना। इससे पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन की लागत में पिछले 10 साल में 70 फीसदी की कमी आई है।

बड़े प्लांट, सस्ती बिजली

ज्यादा क्षमता के पवन और सौर ऊर्जा प्लांट लगाने पर इसकी कीमत तुलनात्मक रूप से कम होती है, लेकिन जीवाश्म ईंधन की कीमत पर इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। इसके चलते ही अब नवीन ऊर्जा के बड़े-बड़े प्लांट लगाने के लिए बड़े निवेश हो रहे हैं, क्योंकि इससे बिजली ज्यादा सस्ती हो जाती है। ऊर्जा की कीमत में गिरावट के कई फायदे हैं। इससे लोगों की आय में वृद्धि होती है, वहीं इससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है।

कम और मध्यम आय वाले देशों की जरूरत

आने वाले वर्षों में बिजली की ज्यादातर नई मांग कम और मध्यम आय वाले देशों से आएगी। इसलिए इन देशों में कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली को बढ़ावा देने की काफी जरूरत है।

-79 फीसद बिजली का उत्पादन जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल और गैस) से होता है मौजूदा समय में

-87 फीसद कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन जलने के कारण होता है

-36 लाख लोगों की मृत्यु होती है दुनिया में जीवाश्म ईंधन जलने के कारण होने वाले प्रदूषण से

भारत में 10 फीसदी बिजली उत्पादन पवन और सौर ऊर्जा से

जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे थिंक टैंक एजेंसी एम्बर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 की पहली छमाही में कुल बिजली उत्पादन में पवन और सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन की हिस्सेदारी 10 फीसदी दर्ज की गई है। वहीं भारत भी अपनी 10 फीसदी ऊर्जा का उत्पादन विंड और सोलर की मदद से कर रहा है। विश्व की महाशक्ति अमेरिका 12 फीसदी, चीन, जापान और ब्राजील 10 फीसदी और तुर्की 13 फीसदी बिजली का उत्पादन पवन और सौर ऊर्जा से कर रहे हैं। 

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