नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। मुद्रा के अस्तित्व में आने के साथ ही इंसानी सोच में बचत का विचार समाहित हुआ। बचत की इस संस्कृति में भारतीय हमेशा अव्वल रहे। पश्चिमी देशों की तरह इन्होंने वर्तमान में नहीं जिया, हमेशा भविष्य की चिंता की। कर्ज लेकर घी पीने में कभी नहीं विश्वास किया। अपनी हाड़तोड़ कमाई का कुछ हिस्सा हमेशा बचाकर रखा।

विकसित हुआ बैंकिंग तंत्र 

बक्से में बंद करके, जमीन के नीचे दबा करके, रजाई में डाल करके। धीरे-धीरे इनकी इस बचत को संभालने के लिए बैंकिंग तंत्र विकसित हुआ। ये तंत्र इस बचत को कुछ दिन रखने के एवज में अतिरिक्त रकम देने लगे। अब तो लोगों की चांदी हो गई। पैसे सुरक्षित रखने और उसके एवज में अतिरिक्त पैसा मिलना मानो गरीब को एक दिन का राजपाट मिल गया हो। व्यवस्थाएं चलती रही। भरोसा बरकरार रहा। लेकिन लोगों के इस भरोसे का अनुचित लाभ उठाने के लिए बाजार में कई वित्तीय संस्थाएं कूद पड़ी। लोगों को ज्यादा लाभ और मुनाफा देने की पेशकश के साथ उनके साथ छद्म धोखे की पीठिका रची जाने लगी। इन सबसे बेपरवाह उपभोक्ता अपनी गाढ़ी कमाई इस तंत्र में झोंकता गया। 

सबकुछ लेकर हो गए चंपत 

आखिर एक दिन ये वित्तीय संस्थान सब कुछ लेकर चंपत हो गए। कुछ ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। लोगों के सामने हाय-हाय करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। सरकारी और निजी बैंक भी इससे अछूते नहीं रहे। यहां लोगों को पैसा मरने की चिंता नहीं थी, लेकिन नीरव मोदी सरीखे लोगों ने सरकारी बैंकों को बड़ा चूना लगाकर एक तरह से वित्तीय तंत्र को संकट में ही डाला। तंत्र का कोई हिस्सा अगर प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है तो इसका असर पूरे बैंकिंग तंत्र पर पड़ता है। और अंतत: अर्थव्यवस्था के पहिए सुस्त हो जाते हैं। इस पूरे चक्कर में आम आदमी घनचक्कर बन जाता है। बैंक अपना विस्तार नहीं कर पाते हैं, उपभोक्ताओं को ज्यादा लाभ देने की स्थिति में नहीं होते हैं। 

दरकने लगा बैंकिंग तंत्र में भरोसा 

लिहाजा इस बैंकिंग तंत्र से आम आदमी का भरोसा दरकने लगता है। वो तो ऐसे बैंकिंग तंत्र की कल्पना करता है जो उसकी पाई-पाई की भरपाई कर सके। ऐसे में वित्तीय संस्थानों के प्रति लोगों में फिर से विश्वासबहाली के उपायों की पड़ताल आज सबसे बड़ा मुद्दा है। पिछली साल सरकार ने फाइनेंशियल रिजोल्युशन एंड डिपोजिट इंश्योरेंस (एफआरडीआइ) बिल, 2017 को वापस ले लिया था। इस बिल का उद्देश्य अपने काम को समेट रहे ऐसे वित्तीय स्थानों (बैंक, इश्योरेंस कंपनी, गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं, और स्टॉक मार्केट) के लिए फ्रेमवर्क तैयार करना था जिससे इंसाल्वेंसी की स्थिति में तंत्र पर कम से कम बोझ पड़े। इसी मकसद से एक और मसौदा तैयार किया था, जिसमें देयता को माफ करना प्रस्तावित था। 

संस्थान हुए दिवालिया 

हालांकि तमाम किंतु-परंतुओं के बीच यह सिरे नहीं चढ़ सका। एफआरडीआइ के वापस लेने के बाद कई वित्तीय संस्थानों के दिवालिया होने के मामले सामने आए। आइएल एंड एफएस के दिवालिया होने से एक लाख करोड़ रुपये जमाकर्ताओं और निवेशकों के फंसे। डीएचएफएल मामले में भी दूसरी वित्तीय संस्थाओं और निवेशकों के 85 हजार करोड़ रुपये की चपत लगी। अभी वित्तीय तंत्र इन बड़े झटकों से उबर ही रहा था कि एल्टिको कैपिटल दिवालिया घोषित हो गई और पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (पीएमसी) के कामकाज पर धोखाधड़ी के चलते रिजर्व बैंक ने रोक लगा दी। 

डिपोजिट इंश्योरेंस प्लान 

जमाकर्ताओं की दिक्कत दो दशक से पहले भारतीय बैंकिंग तंत्र पर एक तरीके से सरकार का आधिपत्य था। कुल जमा का एक बड़ा हिस्सा उनके पास ही सुरक्षित रहता था। इसी समय डिपोजिट इंश्योरेंस प्लान अस्तित्व में आया। जिसके तहत हर बैंक जमाकर्ता अपनी जमा डूबने की स्थिति में एक लाख रुपये पाने का हकदार है। इसके बाद से वित्त बाजार का तेजी से विस्तार हुआ। कुछ ही साल में विदेशी और स्थानीय फंड्स, एनबीएफसी, वैश्विक संपत्ति के बदले कर्जदाता (मॉर्गेज लेंडर्स), बड़ी निजी इंश्योरेंस कंपनियां और पोर्टफोलियो मैनेजरों ने भारत का रुख किया। वित्तीय बाजार में इन संस्थाओं का एक जटिल संजाल बुन गया, लेकिन डिपोजिट इंश्योरेंस वहीं का वहीं बना रहा जो समाजवाद के युग में हुआ करता था।

सुरक्षित जमा की घटती हिस्सेदारी 

अभी भारत में अगर कोई बैंक बंद हो जाता है तो जमाकर्ताओं के इंश्योरेंस के एवज में सिर्फ एक लाख रुपये मिलते हैं, भले ही उसका जमा करोड़ों में हो। बैंक में एक लाख से कम जमा को बीमा की सुरक्षा मिलती है लेकिन इससे अधिक के लिए कोई कानूनी सुरक्षा का प्रावधान नहीं है।

शुल्क और शर्तें 

डीआइसीजीसी ने पिछली बार एक मई 1993 को 1980 से चले आ रहे 30 हजार के इंश्योरेंस कवर को बढ़ाकर एक लाख किया था। इसके लिए बैंक प्रत्येक सौ रुपये जमा पर 10 पैसे शुल्क लेती है। इस शुल्क को बैंक वहन करता है। डीआइसीजीसी के आंकड़ों के अनुसार 2018-19 के दौरान वाणिज्यिक बैंकों ने बीमित जमा के लिए कुल 11190 करोड़ रुपये प्रीमियम चुकाया जब कोऑपरेटिव (सहकारी) बैंकों ने डिफाल्ट रिस्क को कम करने के लिए 850 करोड़ रुपये प्रीमियम अदा किया।

मकड़जाल 

ये सारे वित्तीय संस्थान एक दूसरे से इस तरीके से जुड़े थे कि एक के ढहने का असर दूसरे पर पड़ना तय था। इनमें से प्रत्येक का स्वामित्व अलगअलग रहा जिससे बाएं हाथ को नहीं मालूम होता था कि दायां क्या कर रहा है। गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का आज वाणिज्यिक क्षेत्र के एक चौथाई क्रेडिट पर कब्जा है।  

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