नई दिल्ली (जेएनएन)। एक व्यक्ति के शव को लेकर दो पत्नियों का विवाद मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया। कोर्ट में इस बात को लेकर फैसला लिया जाना है कि व्यक्ति के शव को ईसाई प्रथाओं के अनुसार दफन किया जाना चाहिए या हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उसका अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति पीएन प्रकाश ने विधवाओं को आपसी सहमति के लिए दो दिन का समय दिया है। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि यदि दोनों महिलाएं दो दिन में भी किसी समझौते पर सहमत नहीं होती हैं तो शव को लावारिस मानकर अंतिम संस्कार कर दिया जाए।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पहली पत्नी डी थांगममाल और उसके दोनों बेटों ने हाईकोर्ट में संयुक्त याचिका दायर कर अंतिम संस्कार के समय के लिए सुरक्षा की मांग की थी। पहली पत्नी चाहती थी कि उसके पति का हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाए। इसके बाद मृतक की दूसरी पत्नी की बेटी हेमालाथा ने भी उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपने पिता के शरीर को दफनाने के लिए सुरक्षा प्रदान करने की मांग की।

मृतक का शव 16 अगस्त से चेंगलनपट्टू में सरकारी अस्पताल के शव गृह में रखा हुआ है। मृतक दक्षिणमूर्ति ईसाई था और उसने अलग-अलग वक्त में दो महिलाओं से शादी की थी। मरने के समय वह दूसरी पत्नी के साथ रह रहा था। दूसरी पत्नी ने दावा किया कि पति ने अपने घर के इलाके में दफनाने की आखिरी इच्छा जताई थी।

जब न्यायाधीश ने इस मामले में पूछताछ की, तो पाया मृतक ने एक वसीयत छोड़ी थी और जिसके अनुसार वह चाहता था कि उसके शव को ईसाई प्रथाओं के अनुसार कलपक्कम में दफनाया जाए। हालांकि, वसीयत पर उसके हस्ताक्षर के बजाय अपने अंगूठे का निशान लगा था। मृतक की पहली पत्नी ने वसीयत की वास्तविकता पर सवाल उठाए हैं और दावा किया कि दूसरी पत्नी ने धोखे से उनके अंगूठे के निशान लिए हैं, क्योंकि वह मृत्यु के समय उसी का साथ रह रहा था।

जस्टिस प्रकाश ने कहा कि इस याचिका पर कोर्ट विल की वैधता पर फैसला नहीं ले सकता है। उन्होंने कहा कि यदि दोनों महिलाएं किसी सहमति पर नहीं पहुंच पाती हैं तो मृतक का अंतिम संस्कार लावारिस शव के मामलों की प्रक्रिया के तहत कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस को शवगृह में मृतक के शव को अनिश्चितकाल तक रखने की जरूरत नहीं है।

Posted By: Arti Yadav

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