डॉ. अश्विनी महाजन। पिछले कुछ समय से भारत के ‘नेशनल करियर’ एयर इंडिया के विनिवेश की कवायद चल रही है। बताया जा रहा है कि पिछले कई वर्षो से भारी घाटे में चलने के कारण यह सरकारी खजाने पर बोझ बनी हुई है। 1932 में जेआरडी टाटा ने टाटा एयरलाइंस के रूप में इसकी नींव रखी थी। तब से अब तक एयर इंडिया ने लाभ कमाते हुए भारी मात्र में परिसंपत्तियां अर्जित भी की। वर्तमान में एयर इंडिया के पास 132 विमान हैं, और यह 94 भारत और अंतरराष्ट्रीय मार्गो पर उड़ान भरती है। अपनी शक्ति, सामथ्र्य, कुशलता और विशालता के कारण एयर इंडिया को महाराजा एयरलाइंस का भी खिताब स्वाभाविक रूप से मिल गया। दुनिया भर में 30 स्थानों पर लैंडिंग अधिकारों से लैस एयर इंडिया के पास मूर्त और अमूर्त दोनों प्रकार की बेहिसाब परिसंपत्तियां हैं। इसके साथ ही विमानों की पार्किग के हजारों स्थान के रूप में कई ऐसे अधिकार हैं जिनकी गिनती संभव नहीं।

क्यों और कब घाटे में चली गई एयर इंडिया 

वर्ष 2007 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस, दोनों को मिलाकर एक इकाई एयर इंडिया लिमिटेड बना दी गई। विलय के समय एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस की कुल हानि 770 करोड़ रुपये थी, जो 2009 तक आते-आते 7200 करोड़ रुपये (लगभग 9 गुणा) हो गई। एयर इंडिया में व्याप्त अकुशलता और ईंधन की बढ़ती कीमत ने एयर इंडिया की मुश्किलें कई गुणा बढ़ा दीं। इन नुकसानों के चलते 2011 तक एयर इंडिया पर कुल कर्ज 42,900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह बावजूद इसके कि 2009 में कर्ज घटाने के लिए एयर इंडिया ने अपने कुछ विमान भी बेच दिए थे। दुनिया में कम एयरलाइंस ही ऐसी हैं जिनके पास विमानों के रख-रखाव और मरम्मत की सुविधा है। एयर इंडिया उस मामले में दुनिया की एक सुप्रसिद्ध कंपनी रही है। न केवल अपने विमानों का सही रख-रखाव कर लेती है, बल्कि निजी, घरेलू एवं विदेशी विमानों का भी रख-रखाव और मरम्मत कर लेती है। इससे एयर इंडिया को केवल आमदनी ही नहीं होती, बल्कि अपने विमानों के रख-रखाव और मरम्मत के पैसे भी बचते हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि पिछले लगभग 5-7 साल में एयर इंडिया की इस विशेषज्ञता पर ग्रहण लग गया। 2016 में एयर इंडिया ने अपना ईएएसए पंजीकरण भी खो दिया।

भ्रष्टाचार भी है कारण 

एयर इंडिया में भ्रष्टाचार इस कदर व्याप्त रहा कि माना जाता है कि यह एयर इंडिया की बदहाली का मुख्य कारण है। पिछली यूपीए सरकार के समय जब एयर इंडिया को घाटे से उबारने के लिए एक बड़ी आर्थिक सहायता दी गई तो सरकार ने यह फैसला किया कि नए ड्रीमलाइनर हवाई जहाज एयर इंडिया के लिए खरीदे जाएं, लेकिन उस खरीद में भारी भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। विमान बनाने वाली कंपनी ने जितने पैसे मांगे बिना मोलभाव किए विमान खरीद लिए गए, जबकि इस उद्योग में यह स्थापित है कि मोलभाव कर 35 से 40 प्रतिशत कम कीमत पर हवाई जहाज खरीदे जाते हैं। यही नहीं पहले से ही घाटे में चल रही कंपनी एयर इंडिया के लाभों वाले रूटों को बिना वजह दूसरी एयरलाइंस को दे दिया गया। इसमें भी भारी भ्रष्टाचार का अंदेशा है।

गत वर्षो में हुआ है सुधार 

पिछले कई साल से एयर इंडिया में दूसरे कारणों से नुकसान तो रहा, लेकिन कुशलता के मापदंडों में खासी बेहतरी हुई है। यही नहीं, अब तो एयर इंडिया परिचालन लाभ की स्थिति में आ गया है, लेकिन फिर भी खातों में नुकसान इसलिए है, क्योंकि उसे कर्ज और ब्याज की अदायगी में भारी रकम चुकानी पड़ती है। हालांकि एयर इंडिया में यात्री लोड, हवाई जहाज के प्रतिदिन घंटों की औसत संख्या विमान में भराव इत्यादि मापदंडों में भारी सुधार हुआ है। 2016-17 में नकदी घाटा 3991 करोड़ से घटता हुआ 2017-18 में मात्र 1674 करोड़ रह गया है। इस दौरान यात्रियों की संख्या में 15 लाख की वृद्धि और विमानन उपयोग के घंटों में भी खासी वृद्धि दिखाई देती है।

क्या विनिवेश है सही हल 

सरकार ने ऐसा मन बनाया है कि एयर इंडिया का 74 प्रतिशत हिस्सा किसी दूसरी कंपनी को देकर एयर इंडिया को आंशिक रूप से बेच दिया जाए। एयर इंडिया को बेचने की इस तरकीब में एयर इंडिया के परिसंपत्तियों को अलग रखा गया है, लेकिन जो कंपनी भी एयर इंडिया को खरीदेगी उसे इसका कर्जा भी लेना होगा। ऐसे में भारत की अधिकांश कंपनियों ने एयर इंडिया को खरीदने से अपने हाथ खींच लिए हैं। अभी केवल एक कंपनी, जिसने इसमें अपनी इच्छा जाहिर की है, वह है टाटा, लेकिन टाटा कंपनी भी सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर ही इस काम को अंजाम दे सकती है।

एयर इंडिया पर भारी कर्ज

इसमें कोई दो राय नहीं है कि एयर इंडिया पर भारी कर्ज है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि वर्तमान के घाटे और कर्ज अकुशलता, भ्रष्टाचार और लापरवाहियों के कारण हैं। यदि अन्य एयरलाइंस की तर्ज पर एयर इंडिया में कुशलता के मापदंड बेहतर किए जाते हैं तो यह कंपनी जिसने 2016-17 में 298 करोड़ रुपये और 2017-18 में 140 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ कमाया है, वह इससे कई गुणा ज्यादा लाभ कमा सकती है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि एयर इंडिया पर कर्ज ब्याज के कारण भी ज्यादा बढ़ा है। भारत के मुख्य लेखाकार और अंकेक्षक (कैग) ने भी कुशलता के मापदंडों के अनुसार एयर इंडिया की बेहतर सेहत की तरफ इंगित किया है।

कुशल नेतृत्व की जरूरत

ऐसे में एयर इंडिया को किन्हीं विदेशी हाथों में सौंपने के बजाय एक कुशल नेतृत्व की जरूरत है। नहीं भूलना चाहिए कि एक नेशनल करियर के नाते एयर इंडिया ने मुश्किलों के समय विदेशों में फंसे हुए भारतीयों को स्वदेश वापस लाने का भी काम किया है और सेनाओं और युद्ध के समय भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहण किया है। ऐसे रूटों पर जहां निजी कंपनियां लाभ नहीं होने के कारण सेवाएं देने से मना कर देती हैं, एयर इंडिया ही वहां कार्यरत होता है। सभी राज्यों की राजधानियों को वायु यातायात की सुविधा से लैस करने का काम भी एयर इंडिया करता है। और दूर-दराज के क्षेत्रों में यही मद्द करता है। आज जब निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए ऋणों की अदायगी में बैंकों द्वारा भारी छूटें दी जा रही हैं, एक सरकारी उपक्रम होने के कारण एयर इंडिया पर दोहरे मापदंड क्यों? क्यों उसे ये सुविधाएं नहीं दी सकतीं? सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।

[लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं] 

Posted By: Kamal Verma

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