नीलू रंजन, नई दिल्ली। कोरोना वैक्सीन को लेकर विभिन्न कंपनियों की ओर से हो रहे दावों के बावजूद पूरी स्थिति इस साल के अंत या अगले साल जनवरी में ही साफ हो पाएगी। फाइजर और मोडेरना ने अपनी-अपनी वैक्सीन के 94.5 और 95 फीसद कारगर होने के दावे फिलहाल आंकड़ों के अंतरिम विश्लेषण पर आधारित है और अंतिम रिपोर्टों के आने में अभी वक्त लगेगा। मौजूदा वक्‍त में भारत की निगाहें जिन दो वैक्सीन कोवैक्सीन और कोविशील्ड पर सबसे ज्यादा है उनका अगले महीने फेज तीन का क्लीनिकल ट्रायल पूरा होने जा रहा है।

वैक्‍सीन आने में लग सकते हैं तीन से चार महीने

यही वजह है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कोरोना के वैक्सीन मिलने में तीन से चार महीने लगने की बात कही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो फाइजर और मोडेरना की वैक्सीन से भारत को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। इन दोनों वैक्सीन में सबसे बड़ी बाधा यह है कि इनका भारत में क्लीनिकल ट्रायल नहीं हुआ है। ऐसे में सामान्य रूप से ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की ओर से इसके भारत में इस्‍तेमाल की अनुमति मिलना मुश्किल है।

वैक्सीन के आपात इस्‍तेमाल का प्रावधान नहीं

यही नहीं ड्रग एंड कास्मैटिक एक्ट में भी वैक्सीन के आपात इस्‍तेमाल की अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दवा के मामले में कई शर्तों के साथ इमरजेंसी उपयोग की अनुमति तो दी जा सकती है लेकिन वैक्सीन के मामले में नहीं। वैसे कुछ दिन पहले नीति आयोग के सदस्य और वैक्सीन पर गठित उच्चाधिकार ग्रुप के प्रमुख डॉक्टर वीके पॉल ने दावा किया था कि कोई भी संप्रभु राज्य अपने नागरिकों की रक्षा के लिए देश में ट्रायल हुए बिना भी किसी वैक्सीन के इमरजेंसी उपयोग की अनुमति दे सकती है। हालांकि ऐसी स्थिति में विवाद की गुंजाइश होगी।

फाइजर और मोडेरना की वैक्सीन से उम्‍मीदें कम

डॉक्टर वीके पॉल भी मानते हैं कि फाइजर और मोडेरना की वैक्सीन का उत्पादन सीमित मात्रा में होना इसकी सबसे बड़ी सीमा है जो भारत और दुनिया की जरूरत को पूरा ही नहीं कर पाएगी। इसके अलावा फाइजर की वैक्सीन के लिए -70 डिग्री सेल्सियस और मोडेरना की वैक्सीन के लिए -20 डिग्री सेल्सियस के तापमान के कोल्डचैन को बनाए रखने की जरूरत होगी। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह मुश्किल साबित हो सकता है। जाहिर है भारत की उम्मीदें देश में ही चल रहे कई वैक्सीन ट्रायल के नतीजों पर टिकी है।

कुल सात वैक्सीन का चल रहा ट्रायल

देश में कुल सात वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल के अलग-अलग चरण में हैं। इनमें पांच ह्यूमन क्लीनिकल ट्रायल और दो प्री-क्लीनिकल ट्रायल स्टेज में है। इनमें आक्सफोर्ड और आस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड वैक्सीन और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन सबसे आगे है। दोनों वैक्सीन का फेज तीन ट्रायल चल रहा है। इनमें भी कोविशील्ड का फेज तीन ट्रायल ब्रिटेन, ब्राजील समेत कई देशों में एक साथ चल रहा है। इन दोनों वैक्सीन का फेज तीन का ट्रायल दिसंबर में पूरा हो जाएगा।

डीजीसीआइ की अनुमति के बाद होगा वितरण

ट्रायल के फाइनल नतीजे के बाद डीसीजीआइ की एक्सपर्ट कमेटी वैक्सीन के बारे में किए जा रहे दावे का सुरक्षा, कारगरता और उपयोगिता के मापदंडों पर विश्लेषण करेगी। डीजीसीआइ की अनुमति मिलने के बाद ही आम लोगों को वैक्सीन देने का काम शुरू हो जाएगा।

इन वैक्‍सीन से भी उम्‍मीदें

कोवैक्सीन और कोविशील्ड के अलावा रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-पांच का भी दूसरे और तीसरे फेज के ट्रायल की अनुमति मिल गई है और अगले कुछ दिनों में शुरू हो जाएगा। जबकि कैडिला की वैक्सीन का फेज दो का ट्रायल का पूरा हो चुका है और इसके आंकड़े सामने आने के बाद फेज तीन का ट्रायल शुरू किया जाएगा। इसी तरह से बायोलॉजिकल ई कंपनी ने अपनी वैक्सीन के फेज एक और दो का ट्रायल एक साथ कुछ दिनों पहले शुरू किया है।

भारत बायोटेक और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्‍सीन मुफीद

फाइजर और मोडेरना की तुलना में भारत बायोटेक और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन भारत के लिए ज्यादा मुफीद इसीलिए भी है। इन्हें रखने के लिए बहुत कम तापमान की जरूरत नहीं पड़ेगी और यह सामान्य रेफ्रीजेरेटर में भी सुरक्षित रहेगा। वैसे अभी तक भारत बायोटेक ने अपनी वैक्सीन की उत्पादन क्षमता और कीमत का खुलासा नहीं किया है। लेकिन भारत कोविशील्ड बनाने वाली सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (सीआइआइ) ने इसकी कीमत दो से तीन डॉलर तक होने का दावा किया है।

सीआइआइ बना रहा 10 करोड़ डोज

यानी यह वैक्सीन दो सौ रूपये में उपलब्ध हो सकेगी। बड़ी बात यह है कि सीआइआइ कोविशील्ड की कई करोड़ डोज हर महीने उत्पादन करने का दावा कर रहा है और वैक्सीन पर मुहर लगने के पहले ही दिसंबर तक 10 करोड़ डोज तैयार लेगा। सीआइआइ और एस्ट्राजेनेका के बीच हुए करार के मुताबिक वैक्सीन की कुल उत्पादन का आधा भारत को मिलेगा और आधा ब्रिटेन को मिलेगा। इससे बड़े पैमाने पर वैक्सीन की उपलब्धता हो सकेगी।  

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