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पढ़िए वो आलेख, जो बता रहा है क्या थी स्वाधीनता संग्राम की सच्ची समाजवादी धारा

देश को एकजुट रखने और समाजवादी व्यवस्था कायम करने की दिशा में संगठित प्रयासों को तेज करने के उद्देश्य के साथ स्थापित हुई थी अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में गठित इस पार्टी के सदस्यों ने स्वाधीनता आंदोलनों में लंबी जेल यात्राएं कीं।

By Sanjay PokhriyalEdited By: Sun, 16 Jan 2022 10:20 AM (IST)
स्वतंत्र राष्ट्र का स्वप्न निहित था जो फिर कभी किसी के हाथों परतंत्र नहीं होगा... फाइल फोटो

के. सी. त्यागी। गांधी जी के भारत आगमन के बाद और उनकी सक्रियता के कारण कांग्रेस उत्तरांतर ग्राम और किसान अभिमुख बनने लगी। वर्ष 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस के उद्देश्यों में परिवर्तन किया गया और अधिक स्पष्टता के साथ घोषणा की गई कि स्वराज प्राप्ति ही कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य होगा। 1920 तक कांग्रेस के जितने अध्यक्ष हुए, उनमें सबसे अधिक संख्या वकीलों (17) की थी। तीन अध्यक्षों का जीवनकाल में शिक्षा से संबंध रहा, तीन भूतपूर्व अधिकारी थे और तीन उद्योगपति और व्यापारी। प्रारंभिक काल में तीन बार ब्रिटिश नागरिकों ने भी कांग्रेस के अधिवेशनों की अध्यक्षता की। इनमें सबसे मशहूर डा. एनी बेसेंट थीं, जिन्होंने बाद के दिनों में भारत को ही अपना निवास स्थान बना लिया था, लेकिन कांग्रेस को जनोन्मुखी बनाने का पहला प्रयास महात्मा गांधी के चंपारण आगमन के बाद हुआ। नील की खेती कर रहे किसानों के निर्मम शोषण के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई में विजय प्राप्त कर गांधी जी गरीब, किसान, श्रमिकों को स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदार बनाने में जुट गए। इसके बाद खेड़ा (गुजरात) के किसानों पर अकाल से हुई प्राकृतिक आपदा में लगान की दर बढ़ाने के अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सफल आंदोलन का नेतृत्व किया, लेकिन कांग्रेस पार्टी की कोई एक परिपक्व राजनैतिक विचारधारा नहीं थी।

परिभाषित हुए क्रांति के उद्देश्य: इसमें संदेह नहीं कि वर्ष 1917 की सोवियत क्रांति का वैचारिक असर भारत के मध्यमवर्ग के नौजवानों, लेखकों, बुद्धिजीवियों पर हुआ। पंजाब, महाराष्ट्र और बंगाल में कई ऐसे समूह उभरकर आए जो सशस्त्र क्रांति के जरिए अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करने के सपने संजोए हुए थे। पंजाब में लाला लाजपत राय बेशक सबसे सम्मानजनक स्वतंत्रता प्रेमी थे, लेकिन मतवाले नौजवानों की पसंद न तो गांधी थे और न ही लाला लाजपत राय। भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा, चंद्रशेखर आजाद, शचींद्र सान्याल, खुदीराम बोस, अशफाकउल्ला खान, राजगुरू और सुखदेव आदि नौजवान नेताओं र्ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन कर भूमिगत गतिविधियां संचालित करनी प्रारंभ कर दीं। लेनिन और सोवियत क्रांति के विचारों से लैस यह सशस्त्र विद्रोह की तरफ पहला प्रयास था, लेकिन अदम्य साहस एवं त्याग की संपूर्णता से भरे इन प्रयासों में जनता की हिस्सेदारी न के बराबर थी। काकोरी कांड, सांडर्स कांड, संसद में बम विस्फोट से संगठन जनता के प्रिय अवश्य हो चले थे, लेकिन जन आंदोलनों का रूप नहीं ले पाए थे। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव पर चले मुकदमों के दौरान इनके द्वारा अदालत में की गई बहस अवश्य चर्चा का विषय बनी। मोतीलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, पंडित जवाहर लाल नेहरू और रफी अहमद किदवई सरीखे शीर्षस्थ नेता उनकी जिरह सुनने के लिए अदालत में उपस्थित रहते थे और पहली बार उन्होंने सार्वजनिक तौर पर क्रांति के उद्देश्यों को परिभाषित करने का प्रयास भी किया कि ‘सिर्फ गोरे अंग्रेजों को भगाकर काले लुटेरों का शासन स्थापित करना उनका लक्ष्य नहीं है। जब तक व्यक्ति का व्यक्ति के द्वारा, एक वर्ग का दूसरे के द्वारा और राष्ट्र का राष्ट्र द्वारा शोषण समाप्त नहीं होता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा।’ देश इनकी गतिविधियों से गर्माने लगा और 1929 आते-आते निर्जीव पड़ी कांग्रेस को भी संपूर्ण आजादी का प्रस्ताव पास करना पड़ा। इससे पूर्व सहयोग और संघर्ष के कार्यक्रम साथ-साथ संचालित होते रहे।

शोषण के खिलाफ मुखर हुई जंग: भगत सिंह एवं उनके साथियों की 23 मार्च, 1931 को हुई फांसी के बाद जनमानस में आक्रोश था। कांग्रेस के अधिवेशन में जाते हुए गांधी जी को कई स्थानों पर असुविधाजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और कराची सम्मेलन में कांग्रेस पार्टी संपूर्ण स्वतंत्रता एवं असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव पास करने लगी। 1930 के सत्याग्रह का आरंभ दांडी मार्च और कानून तोड़ने से हुआ। गांधी जी के आकर्षक एवं चमत्कारिक नेतृत्व ने इस आंदोलन को काफी लोकप्रिय बना दिया। किसी भी सरकारी शर्त को स्वीकार करना गांधी जी को अस्वीकार था। अन्य नेताओं के विपरीत वह इसे आत्मसम्मान के विरुद्ध मानते थे। 1931 के कराची सम्मेलन में भगत सिंह एवं साथियों की शहादत की झलक दिखने लगी, जब मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रमों के बारे में भी प्रस्ताव पारित किए गए। इसी अधिवेशन में पहली बार किसानों पर लगे लगान को घटाने तथा गैर लाभकर जोतों पर लगान आवश्यक सीमा तक अथवा संपूर्ण माफ करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। स्मरण रहे 1930 का सत्याग्रह नमक कर के विरोध में हुआ था। कराची अधिवेशन में समाजवादियों द्वारा सुझाए गए समाजवादी कार्यक्रम तो नहीं अपनाए गए, लेकिन इस उसूल को मान लिया गया कि महत्वपूर्ण बुनियादी उद्योग राज्य के नियंत्रण में लाए जाएंगे। इसके बाद बंबई (अब मुंबई) के संशोधित प्रस्ताव में किसानों के कर्ज की बात भी उठी और महाजनों के शोषण पर लगाम लगाने के मुद्दे को भी स्वीकार कर लिया गया।

घबराने लगा जमींदार वर्ग: कांग्रेस में बढ़ने वाली समाजवादी प्रवृत्तियों के चलते तथा वर्ग शोषण एवं वर्ग संघर्ष की चर्चा के चलते निहित स्वार्थ वाले तत्वों में घबराहट पैदा होने लगी। जमींदार वर्ग से काफी लोग, जो कांग्रेस के समर्थक थे, कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव डालने लगे। उत्तर प्रदेश के लगान रोको आंदोलन से वे विशेषकर भयभीत थे। उनके प्रभाव में आकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने एक प्रस्ताव पासकर जमींदारों को आश्वस्त किया कि लगानबंदी कार्यक्रम का यह मतलब नहीं है कि कांग्रेस युद्ध चाहती है। प्रस्ताव में वर्ग युद्ध तथा बिना मुआवजा जायदाद जब्त करने की बात को गैर जिम्मेदाराना हरकत ठहराया गया। लगान बंदी के कार्यक्रम के बारे में यह सफाई दी गई कि यह जमींदारों के विरोध में न होकर आर्थिक मंदी की वजह से पीड़ित किसानों को राहत पहुंचाने की दृष्टि से एक उपाय है।

प्रयासों को मिली पहचान: इन घोषणाओं से समाजवादी विचार रखने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं में क्षोभ उत्पन्न हुआ। पंडित नेहरू ने भी इस विषय पर महात्मा गांधी को नाराजगी भरा पत्र लिखा। इन घोषणाओं के बाद जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से बिहार में सोशलिस्टों ने संगठित होने के प्रयास प्रारंभ कर दिए। 1932 में कांग्रेस के सत्याग्रह आंदोलन में आंशिक सफलता ने इन प्रयासों को और हवा दी। नासिक जेल में मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, पुरुषोत्तम दास, टीकमदास, यूसुफ मेहर अली, अशोक मेहता आदि के साथ जयप्रकाश नारायण भी बंदी थे। नए संगठन उनकी भूमिका को लेकर सक्रिय हो गए और 17 मई, 1934 को पटना के अंजुमन इस्लामिया हाल में आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में एक अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया गया और इन प्रयासों को अमली जामा पहनाया गया। अगले दिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक आहूत की गई, कांग्रेस के दक्षिणपंथी रुझानों के नेतृत्व पर भी सीधा निशाना साधा गया और सभी प्रकार के सरकारी संस्थानों से दूरी बनाकर आंदोलन को तय करने के कार्यक्रम घोषित किए गए, इसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का नाम दिया गया। आचार्य नरेंद्र देव इसके अध्यक्ष और जयप्रकाश नारायण इसके सचिव बने। इस संघटन के प्रस्तावों ने कांग्रेस पार्टी में हलचल तेज कर दी। पंडित नेहरू ने कांग्रेस महासमिति के उस प्रस्ताव की निंदा की, जिसमें समाजवादियों के विरुद्ध निंदात्मक टिप्पणी की गई थी और इसे समाजवादी विचारों पर हमला करार दिया। बाद में महात्मा गांधी के दखल के बाद इसे अधिक तूल न देने का प्रयास किया गया। 21-22 अक्टूबर, 1934 को मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई, इसमें कांग्रेस के झंडे के साथ सभागार में माक्र्स और लेनिन के भी चित्र दिखाई पड़ रहे थे। इसमें इन रुझानों के सभी वरिष्ठ नेताओं ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिसमें प्रमुख तौर पर आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, डा. राम मनोहर लोहिया, ई.एम.एस. नंबळ्दरीपाद, एन.जी. गोरे, मोहन लाल गौतम, मीनू मसानी, डा. संपूर्णानंद, अच्युत पटवर्धन, आचार्य कृपलानी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, एस.एम. जोशी, नवकृष्ण चौधरी, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि उपस्थित रहे।

मुश्किल घड़ी में संभाला मोर्चा: दो-तीन वर्ष में ही कांग्रेस समाजवादी दल प्रभावशाली हो गया और कांग्रेस के वामपंथ का नेतृत्व करने लगा। किसान सभा का गठन और एक सशक्त मजदूर आंदोलन के राष्ट्रीय स्वराज की रूपरेखा भी तैयार की गई। समाजवादी मंच द्वारा कांग्रेस के प्रांतों के मंत्रिमंडल में भी जाने का विरोध था, इसके बावजूद कांग्रेस कार्य समिति ने इसमें भाग लेने का मन बना लिया। इसी बीच 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शीर्ष नेतृत्व के गिरफ्तार होने के बाद समाजवादियों के कंधों पर समूचा भार आ पड़ा, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों द्वारा सोवियत संघ के साथ हुए गठबंधन के कारण कम्युनिस्ट विचारों के साथ समाजवादियों के एक बड़े तबके के साथ वैचारिक मतभेद उजागर होने लगे। एक बड़ा वर्ग सोवियत संघ में स्टालिनवादी नीतियों के कारण भी मोहभंग की स्थिति में आ चुका था और समाजवादियों और साम्यवादियों की वैचारिक विभिन्नता स्पष्ट होने लगी। इसी क्रम में सभी सोशलिस्ट महात्मा गांधी के और करीब हो गए, लेकिन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में किसान सभा के नारों की गूंज ‘मालगुजारी लोगों कैसे, डंडा हमारा जिंदाबाद’ को लेकर डा. राजेंद्र प्रसाद काफी असहज हुए और उन्होंने इसके लिए जयप्रकाश नारायण की काफी आलोचना भी की, लेकिन समाजवादी कहां झुकने वाले थे।

सहीं यातनाएं मगर नहीं बदले नियम: कांग्रेस के आंतरिक वैचारिक युद्ध में सबकी सहानुभूति नेताजी सुभाष के साथ थी। जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल तोड़कर नेपाल से भूमिगत आंदोलन संचालित करने लगे, जिसमें डा. लोहिया उनका पूरा सहयोग कर रहे थे। इससे पूर्व वे पंडित नेहरू के साथ कांग्रेस पार्टी के विदेश विभाग के इंचार्ज बनकर राष्ट्रीय स्तर पर काफी ख्याति अर्जित कर चुके थे। दोनों पुन: गिरफ्तार हुए और लाहौर सेंट्रल जेल में भीषण यातनाओं के दौर से गुजरे। धीरे-धीरे कांग्रेस पार्टी के नेताओं के आचरण और कार्यप्रणाली को लेकर समाजवादी अधीर हो गए। क्रांति और सत्ता हस्तांतरण के भेद को वे भलीभांति जानते थे, लिहाजा कांग्रेस शासित राज्यों में नीतिगत एवं वैचारिक बदलाव भी नगण्य थे। कई राज्यों में मजदूर, किसान प्रदर्शनकारियों पर हुई ज्यादतियां उन्हें अंग्रेजी राज की याद दिलाने लगीं। कई आंदोलनों के दौरान समाजवादियों की गिरफ्तारी के साथ निर्मम पिटाई के किस्से चर्चित होने लगे। इसके बावजूद संविधान सभा में बालिग मताधिकार के बिना चयन को वे अनुचित ठहराते रहे। पाकिस्तान के निर्माण को लेकर उनके शीर्षस्थ नेतृत्व से मतभेद जगजाहिर थे। गोवा के मुक्ति आंदोलन में पंडित नेहरू की उदासीनता से डा. लोहिया काफी क्षळ्ब्ध थे, लिहाजा 19-21 मार्च, 1948 को नासिक (महाराष्ट्र) में एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर कांग्रेस से अलग होकर प्रथम समाजवादी पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया।

इतिहास गवाह है कि वे सैद्धांतिक सवालों पर ईंधन की तरह जले और भावी पीढ़ी के लिए लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार और समानता के लिए लड़ने के संकल्प और इरादे छोड़ गए।

(लेखक पूर्व सांसद हैं)