नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। Chandryaan-2  भारत का ऐसा महत्‍वाकांक्षी मिशन है जिसका पूरी दुनिया बेसब्री से इंतजार कर रही है। भारत पहली बार चंद्रमा की सतह पर अपने यान की सॉफ्ट लैंडिंग कराने जा रहा है। इससे पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने (Indian Space Research Organisation, ISRO) चंद्रयान-1 की लॉन्चिंग की थी। चंद्रयान-1 चंद्रमा की सतह पर तो नहीं उतरा था लेकिन उसने यह पता लगाया था कि चंद्रमा की सतह पर पानी मौजूद है। अब भारतीय वैज्ञानिक चंद्रयान-2 को चंद्रमा की सतह पर लैंड कराने वाले हैं। आइये जानते हैं कि मौजूदा मिशन चंद्रयान-1 से किस प्रकार अलग है।

रॉकेट बाहुबली के जरिए हुई है चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग
चंद्रयान-2 की सफलता के साथ ही भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। इससे पहले साल 2008 में 22 अक्‍टूबर को भारत ने चंद्रयान-1 की लॉन्चिंग की थी। चंद्रयान-1 को पीएसएलवी-सी11 (PSLV-C11) के जरिये लॉन्‍च किया गया था जबकि चंद्रयान-2 को सबसे शक्‍तिशाली रॉकेट GSLV Mk-III जरिये लॉन्‍च किया गया। इसरो के वैज्ञानिकों ने इस रॉकेट को बाहुबली नाम दिया है।

वजन में भी दोगुने से ज्‍यादा का अंतर
चंद्रयान-1 चंद्रमा पर नहीं उतरा था। उसने चंद्रमा के 3400 से ज्‍यादा चक्‍कर लगाए थे। चंद्रयान-1 कुल 312 दिनों तक ऑपरेशनल था। इसने 29 अगस्‍त 2009 तक चंद्रमा की कक्षा में चक्‍कर काटते हुए प्रयोगों को अंजाम दिया था। चंद्रयान-1 का वजन 1380 किलो था जबकि चंद्रयान-2 का वजन इससे काफी ज्‍यादा 3850 किलो है। चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह पर उतर कर प्रयोगों को अंजाम देगा।

मील का पत्‍थर साबित होगी यह खोज
चंद्रयान-1 ने ही पता लगाया था की चंद्रमा पर पानी आइस वॉटर के रूप में मौजूद है। हालांकि यह कितनी मात्रा में मौजूद है इस बारे में यह बता पाने में असफल रहा था। अब चंद्रयान-2 के जरिये वैज्ञानिक यह पता लगाएंगे कि चंद्रमा की सतह पर पानी कितना और किस रूप में मौजूद है। चंद्रयान-2 यह भी पता लगाएगा कि क्‍या चंद्रमा पर मौजूद पानी का भविष्‍य में इंसानों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह खोज स्‍पेस अभियानों के लिए मील का पत्‍थर साबित होगी।

क्‍या चंद्रमा पर मौजूद है हिलियम-3
चंद्रयान-1 ने यह भी पता लगाया था कि चंद्रमा के उत्‍तरी ध्रुव पर आइस वॉटर के अलावा मैग्निशियम, एल्‍यूमिनियम और सि‍लिकॉन मौजूद है। वहीं चंद्रयान-2 के जरिये वैज्ञानिक यह भी पता लगाएंगे कि क्‍या चंद्रमा पर हिलियम-3 भी मौजूद है। वैज्ञानिक हिलियम-3 को इंसानों के लिए भविष्‍य का र्इंधन मान रहे हैं। चंद्रयान-2 का रोवर प्रज्ञान इसके अलावा भी कई दूसरे प्रयोगों को अंजाम देगा।

सॉफ्ट लैंडिंग है बुनियादी अंतर
इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायणन ने कहा कि यदि आप चंद्रयान-1 की चंद्रयान दो से तुलना करते हैं तो दोनों में बुनियादी अंतर सॉफ्ट लैंडिंग का है। पहले मिशन में रॉकेट पीएसएलवी के जरिये कम पेलोड भेजे गए थे जबकि दूसरे में अब तक के सबसे ज्‍याद पेलोड भेजे गए हैं। मौजूदा मिशन की सबसे बड़ी चुनौती चांद की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग को लेकर है। इसरो के मुताबिक, इस मिशन का मकसद चांद की सतह का नक्शा तैयार करना, खनिजों की मौजूदगी का पता लगाना, चंद्रमा के बाहरी वातावरण को स्कैन करना भी है।

इसलिए महत्‍वपूर्ण है मिशन चंद्रयान-2
चंद्रयान -2 चांद की भौगोलिक संरचना, भूकंपीय स्थिति, खनिजों की मौजूदगी का पता लगाने के साथ साथ सतह की रासायनिक संरचना, चंद्रमा की उपरी सतह पर मौजूद मिटटी की तापमान का अध्‍ययन करेगा। इससे चंद्रमा के अस्तित्व में आने तथा उसके क्रमिक विकास के बारे में नई जानकारियां मिल सकेंगी। चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर 100 किलोमीटर दूर की कक्षा में चक्‍कर लगाते हुए रिमोट सेंसिंग अध्ययन करेगा जबकि रोवर प्रज्ञान लैंडिंग साइट और चंद्रमा की सतह के आंकड़े जुटाएगा। रोवर इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, सिंथेटिक अपर्चर रेडियोमीट्री, पोलरीमिट्री और स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों की मदद से चांद पर पानी की मौजूदगी के विस्‍तृत और व्‍यापक आंकड़े जुटाएगा।

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Posted By: Krishna Bihari Singh

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