[डॉ. अनिल जोशी]। पहले समय में जहां पानी होता था, लोगवहीं बसते थे। लेकिन अब इसके विपरीत जहां हम बसते हैं, वहां पानी ले जाना चाहते हैं। बहुमंजिली इमारतें इसका बड़ा उदाहरण हैं। प्रकृति व पानी ने सबकी व्यवस्था की थी चाहे वो पहाड़ी हो या मैदानी इलाका। पहाड़ों में धारे गांवों को तर रखते थे तो तालाब मैदानों को। राजस्थान, जहां पानी तलहटी में था, वहां और इस तरह की परिस्थितियों में कुओं की व्यवस्था थी। इतना ही नहीं खेती-बाड़ी की फसलें भी प्रकृति द्वारा तय थीं। जहां पानी नहीं वहां वर्षा पोषित फसलों को साधा गया और जहां सतही पानी उपलब्ध था वहां धान गेहूं ने जगह बनाई। आज इसके विपरीत हम खेतों में पानी के लिए पाताल पहुंच गए और अब इसलिए कुएं भी हाथ से निकलने को हैं। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि हमने पानी की नई व्यवस्था कायम की, जिसमें वितरण और उपयोग पर ज्यादा जोर था न कि संरक्षण में। हमने पानी के लिए नदियों से नहरों का जाल तो बनाया पर उसके पानी के स्तर की चिंता नहीं की। इसके परिणामस्वरूप देश की छोटी-बड़ी 4500 नदियां साथ छोड़ने को बैठ गई हैं। मतलब अब ये चलने के योग्य नहीं बचीं। उसका कारण साफ है कि नदियों के जलागम अब इस हाल में नहीं बचे कि वो पहले की तरह पानी को जोड़ सकें। कारण साफ है उनमें वनाच्छादित क्षेत्रफल घटा है। फलस्वरूप वर्षा के पानी के सोखने की क्षमताएं घट गईं।  इसका दूसरा नुकसान बाढ़ के रूप में भी झेलना पड़ा रहा है। ये प्राकृतिक बांध होते थे, जो वर्षा के पानी को रोकने में अहम भूमिका निभाते रहे, पर आज इनका अभाव साफ दिखाई देता है।

पचास साल पहले नदियों में जो पानी की चाल और मात्रा थी वो गंभीर रूप से घट गई। इसलिए ऐसी परंपराएं थीं कि जलागम वनाच्छदित रहें और स्थानीय समुदाय उसके संरक्षण से जुड़ा रहे। वन नीति ने इस रिश्ते को खत्म किया और वन विभाग इस परंपरा को समझाने में असफल रहा। ये नदियां ही हैं, जो समुद्र से पहले अपनी यात्रा में भूमिगत जल को भी संचित करती हैं। इनके गिरते स्तर ने भी भूमिगत जल पर संकट खड़ा कर दिया है।

हमारी परंपरा का ये बड़ा हिस्सा रहा कि हमने जल, जंगल, जमीन को हमेशा पूज्य दृष्टि से देखा और इसलिए इनकी अवहेलना करना अपराध माना जाता रहा है। इस परंपरा की अनदेखी ने इन्हें उपयोगी वस्तु बना दिया और एक तरफा दोहन ने इन्हें गर्त में पहुंचा दिया। परंपराओं के पीछे हमेशा संरक्षित उपयोग का नियम रहा है और इसके छिन्नभिन्न होने से संसाधन भी साथ छोड़ने में ही बेहतरी मान रहे है।

प्रकृति का पानी बार-बार एक ही इशारा करता रहा है कि मेरे उपयोग के साथ-साथ मेरे संरक्षण की व्यवस्था पर भी चिंता करो। पानी को परंपरागत तरीकों से ही जोड़ा जा सकता है। कोई भी पानी चाहे वो हिमखंडों में हो या फिर नदी, कुंओं और तालाबों में वर्षा की देन है। परंपरा की इन कड़ियों को हमने समाप्त किया है और इसलिए अब पानी साथ नहीं है। पानी को पाना है तो परंपराओं पर ही जाना होगा। पानी के लिए कोई नया विज्ञान चमत्कार नहीं दिखा सकता। नया विज्ञान हमेशा विकल्प तलाशता है। मतलब कुंओं से अगर पानी घटा तो पाताल में जाने के संयंत्र ढूंढे जाते रहे हैं। गुणवत्ता खत्म हुई तो प्युरीफायर ने जगह बनाई या फिर बोतलों का व्यापार खड़ा हो गया। विज्ञान की दिशा हमेशा विकल्पों पर ज्यादा केंद्रित रही है और यही मुख्य कारण रहा कि हम संसाधनों को जुटाने के प्रति गंभीर नहीं हुए बल्कि विकल्प तलाशते रहे। अब जब वर्तमान विज्ञान पानी को लेकर असंमजस में है तो परंपराओं पर फोकस करना होगा। मन की बात कार्यक्रम में जल संचयन को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा की गई बात तभी सार्थक होगी जब पानी के लिए हम परंपराओं वाले रास्ते ही चुनें। हर घर, हर गांव के लिए चुनौती का समय है क्योंकि आज हमने इस संकट को नहीं समझा तो मानकर चलिए हम फिर कहीं भी जाएं पर पानी हमारे साथ नहीं जाने वाला। 

70 फीसद गिरी उपलब्धता
हम भारतीय जल की तनाव वाली श्रेणी (वाटर स्ट्रेस्ड) में आते हैं। 1951 में देश की प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5177 घन मी. थी, 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि यह अब घटकर 1545 घन मी. हो चुकी है। यानी पिछले साठ साल में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में 70 फीसद की गिरावट आ चुकी है। अगर कहीं पर जल उपलब्धता 1700 घनमी से कम रह जाती है तो अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से उस क्षेत्र को वाटर स्ट्रेस्ड की श्रेणी में डाल दिया जाता है। सरकारी अध्ययन बताते हैं कि भारत जल वंचित श्रेणी की तरफ तेजी के साथ बढ़ रहा है। यह उस दशा को कहते हैं जब उपलब्धता एक हजार घनमी से कम रह जाती है।

भयावह भविष्य
2001 में देश की औसत सालाना प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1820 घनमी थी। सरकार का आकलन है कि 2025 तक यह 1341 घन मी. रह सकती है। स्थिति तो तब विकट होगी जब इसी अनुमान के मुताबिक 2050 तक इसकी मात्रा 1140 घन मी. रह जाएगी।

बारिश का दुरुपयोग
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार भारत की सालाना जल जरूरत 3000 अरब घन मी. है। देश में सालाना औसतन 4000 अरब घन मी. की बारिश होती है। दुखद यह है कि 130 करोड़ लोग इन अनमोल बूंदों के तीन चौथाई हिस्से का भी सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। जिसके चलते यह हर साल बर्बाद हो जाता है। एकीकृत जल संसाधन विकास पर गठित राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सालाना लोगों द्वारा बारिश के कुल 1123 अरब घन मी. पानी का ही इस्तेमाल हो पाता है। इसमें 690 अरब घनमी सतह पर मौजूद जल है और 433 अरब घन मी. जल रिसकर भूजल में मिलता है। बाकी सब व्यर्थ चला जाता है। इस बर्बाद होने वाले पानी को बचाकर हम पानीदार बन सकते हैं।

भूजल और पेयजल
विडंबना यह है कि भारत जितना भूजल दोहन करता है उसका सिर्फ आठ फीसद ही पेयजल के रूप में इस्तेमाल करता है। भारत का अधिकांश भूजल गुणात्मक रूप से अभी पीने लायक है जबकि अन्य स्रोतों का पानी प्रदूषित हो चुका है। उनके शुद्धीकरण की जरूरत होती है। समस्या इसलिए जटिल हो रही है क्योंकि देश की सिंचाईं प्रणाली की कुशलता निम्न स्तर की है। सिंचाई के लिए जितना पानी इस्तेमाल होता है उसमें से करीब 60 फीसद बर्बाद हो जाता है।

गिरता भूजल स्तर
सरकारी अध्ययन बताते हैं कि देश का भूजल स्तर 0.3 मीटर सालाना की दर से गिर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक 2002 से 2008 के बीच भारत ने 109 घन किमी भूजल का इस्तेमाल किया है। यह देश के सबसे बड़े सरफेस जलाशय अपर वैनगंगा की क्षमता से दोगुना है। लिहाजा सिंचाईं के लिए अन्य स्नोतों का इस्तेमाल बढ़ाकर भूजल के दबाव को कम किए जाने की जरूरत है।

घरेलू बर्बादी और आरओ प्यूरीफायर
ऐसा अनुमान है कि हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाला 80 फीसद पानी बर्बाद हो जाता है। अधिकांश मामलों में इस पानी को शळ्द्ध करके दूसरे या कृषि में इस्तेमाल नहीं हो पाता है। इजरायल और ऑस्ट्रेलिया में ऐसा नहीं है। इजरायल अपने शत-प्रतिशत इस्तेमाल पानी का शुद्धीकरण करता है और घर में इस्तेमाल होने वाले पानी के 94 फीसद को रिसाइकिल किया जाता है। वाटर प्यूरीफायर का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इससे होने वाले पानी का नुकसान बड़ी चिंता है। आरओ से एक लीटर पानी हासिल करने के लिए चार लीटर पानी की जरूरत होती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा अहमदाबाद में किए गए एक अध्ययन के अनुसार आरओ आधारित वाटर प्यूरीफायर 74 फीसद पानी का नुकसान करते हैं।

बोतलबंद पानी
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड से पंजीकृत 6000 कंपनियां देश में बोतलबंद पानी के कारोबार से जुड़ी हुई हैं। औसतन हर घंटे एक कंपनी पांच हजार लीटर से 20 हजार लीटर तक पानी धरती से निकाल रही है। सालाना 15 फीसद की दर से बढ़ रहे इस उद्योग से पानी इस्तेमाल में बर्बादी की दर करीब 35 फीसद है।

बारिश की बूंदों का महात्म्य उस रेगिस्तान वासी से पूछिए जहां एक पीढ़ी ने आसमान से छलकते इस अमृत को नहीं देखा है। यह हमारा सौभाग्य है कि हर साल हमारी जल जरूरत से एक हजार अरब घन मीटर ज्यादा पानी बारिश के रूप में देश के भौगोलिक क्षेत्र में बरस जाता है। पहले जगह-जगह ताल, तलैया, पोखर और झीलों के साथ नदी जैसे जलस्नोत थे, जो इस बारिश का अधिकांश हिस्सा खुद में पैबस्त कर लेते थे। जो धीरे-धीरे रिसकर धरती के पेट में समाधिस्थ होता रहता था। इससे भूजल स्तर ऊंचा बना रहता था। इन जलस्नोतों में सतह पर मौजूद पानी सिंचाई सहित जानवरों के पीने इत्यादि के काम में लिया जाता था। इससे भूजल पर बहुत भार भी नहीं पड़ता था। आज हालात बदल गए हैं। अमूमन जलस्नोत बचे ही नहीं, जो हैं वहां पानी की जगह दूसरी तमाम चीजें की जा रही हैं। पार्किंग बन गई हैं, रिहायश तैयार है, खेती हो रही है। इसके इतर जो जमीन है उसका अधिकांश हिस्से का कंक्रीटीकरण किया जा चुका है। लिहाजा पानी एकत्र हुआ पानी रिसकर धरती की गोद में समा नहीं पाता है। दूसरी बात वह ज्यादा दिन तक ठहरता भी नहीं, नालों के साथ बहकर नदियों से होते हुए समुद्र में जाकर नमकीन हो जाता है। इस पूरे दुष्चक्र को बदलने के लिए हमें अपने आचार, विचार और व्यवहार में 360 डिग्री की तब्दीली लानी होगी। तभी हमारी पीढ़ियां पानीदार हो सकेंगी।

(लेखक हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन से जुड़े हैं)

kumbh-mela-2021

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप