हरीश बड़थ्वाल। दो दशक पहले तक किसी ने नहीं सोचा होगा कि पानी की कीमत पेट्रोल या दूध को पछाड़ देगी। तेजी से बढ़ती आबादी और जल संसाधनों की सीमित उपलब्धता के चलते विश्व के अधिकांश देश दशकों से निरापद पेयजल की किल्लत से जूझ रहे हैं। विश्व बैंक के उपाध्यक्ष इस्माइल सैरागेल्डिन ने 23 वर्ष पहले अगस्त 1995 में आगाह किया था कि इस बेशकीमती संसाधन का दोहन और उपयोग दूरदर्शिता और विवेक से न किया गया तो 21वीं सदी के युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पानी के लिए लड़े जाएंगे। पुलित्जर पुरस्कार विजेता एलिस स्टीनबैच के शब्दों में ‘प्यार के बाद पानी के अधिकार को लेकर दुनिया में सर्वाधिक झगड़े होते रहे हैं।’ और फिर ‘प्यार’ बगैर कोई मर नहीं जाता, किंतु पानी बिना जीवन संभव नहीं। इसीलिए सभी पंथों और संस्कृतियों में चराचर जगत के सुचारू संचालन का दारोमदार चार मूल तत्वों- जल, वायु, मृदा और अग्नि पर माना गया है।

हिंदू तथा अन्य प्राचीन पंथों में प्रत्येक तत्व की एक पीठासीन देवी या देवता हैं। धार्मिक व अन्य अनुष्ठानों में उस शक्तिस्वरूपा दैविक शक्ति की कृपा बनी रहने के लिए उसकी स्तुति की जाती है। दूसरी ओर चिंतक, विज्ञानी, भूविद तथा पर्यावरणविद् भी एकमत हैं कि जल, वायु मृदा का संतुलन डगमगाने से समस्त जीवजंतुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अत: यह बार-बार आगाह किया जाता है कि जल और मृदा के प्राकृतिक रूप के साथ छेड़छाड़ या इनके संरक्षण में कोताही मानव जाति को महंगी पड़ेगी। अपने देश में केदारघाटी जैसी भारी आपदाओं के बावजूद उचित प्रयास किए जाने शेष हैं।

71 फीसद धरती पानी से ढकी, पीने योग्य ढाई फीसद
जल आदिकाल से लोक जीवन का केंद्र रहा है। मिखाइल गोर्बाचेव ने कहा था कि ‘धर्म और दर्शन की भांति पानी में लाखों लोगों को स्थानांतरित करने की क्षमता है। सभ्यता की शुरुआत से लोग इसके निकट बसते रहे हैं। जहां पानी नहीं था वहां से निकलकर वे पानी वाली जगह बस गए। पानी पर ढेरों गीत लिखे गए, नृत्य किए गए, इसके लिए भारी मनमुटाव, झगड़े, फसाद हुए। बेशक पानी हमें कैलोरी या पोषण नहीं देता, किंतु इसके बिना किसी जीव का गुजारा नहीं है। विडंबना है कि दुनिया में संप्रति 2.1 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। नदियों, समुद्रों व भूतल के रूप में भूमंडल के 71 प्रतिशत भाग में जल है, किंतु इसका मात्र ढाई प्रतिशत ही सेवनयोग्य है। पिछले 35 वर्षों में दोहन किए जा रहे भूमिगत जल की मात्रा तिगुनी हो गई है और जलस्तर लगातार गिर रहा है

अगले 7 साल में मचेगा पानी के लिए हाहाकार
कुछ अनुमानों के अनुसार 2025 तक करीब आधी वैश्विक जनसंख्या स्वच्छ पानी के लिए हाहाकार करने लगेगी। जल अभाव से ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है, चूंकि दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हाइड्रोइलेक्टिक, थर्मल या न्यूक्लियर संयत्रों को ऊर्जा उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर पानी चाहिए। इसके विपरीत विश्वस्तर पर 8 प्रतिशत ऊर्जा पानी की पम्पिंग या उपभोक्ताओं तक इसके परिवहन में खर्च होती है। जल की आपूर्ति के लिए प्राकृतिक स्नोतों से इतर विकल्प नहीं हैं। इसी दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र का 22 मार्च को पड़ने वाले विश्व जल दिवस का 2018 का थीम है, ‘प्रकृति की ओर मुखातिब’। बाढ़, सूखा और जल प्रदूषण से बेहाल पर्यावरण व्यवस्था की बेहतरी के लिए पुरजोर संस्तुति है कि ताजा पानी के विवेकपूर्ण उपयोग और ताजा पानी के स्नोतों के स्थाई प्रबंधन के उपाय खोजे जाएं।

प्लास्टिक ने किया बेड़ा गर्क
विश्व के सबसे बड़े शहरों में जल व्यवस्था पर संचालित एक ताजा शोध के हवाले से कोलोरेडो स्टेट यूनिवर्सिटी का कहना है कि 29 में से 19 शहरों में पेयजल की एक तिहाई आपूर्ति आसपास की भूमि में वर्षा के पानी से होती है। एक अन्य तेल अवीव यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि शताब्दी के अंत तक जलवायु परिवर्तन के चलते पूर्वी भूमध्य अंचल में बारिश का मौसम मौजूदा चार माह से घट कर दो माह रह जाएगा। प्राकृतिक तौर-तरीकों से दूर होती मौजूदा संस्कृति हमें बीमार कर रही है। बोतलबंद पानी के कुप्रभावों की पुष्टि बार-बार हो रही है। सैकड़ों साल तक भी विघटित न हो सकने वाला प्लास्टिक शरीर की क्या दुर्गति करेगा, आप अंदाज लगा सकते हैं।

ऐसे हालात के लिए हम ही हैं जिम्मेदार
रिहाइशी और सार्वजनिक स्थलों में आंगन, सड़कों आदि की सतह को पक्का बनाकर भूमि से दूरी बनाने का चलन पानी के भूतल में रिसाव को रोक रहा है और भूगत जल की भरपाई दुष्कर होने लगी है। इससे जल निकासी की समस्या उत्पन्न हो गई है वह अलग। जल समस्या के दीर्घकालीन उपाय के लिए आज जरूरत इसके अधिकाधिक संरक्षण की, लवणीय जल को स्वच्छ करने के तरीके ईजाद करने की और मौजूदा जल का अधिकतम प्रयोग, गंदे पानी के पुन:उपयोग, बायो ऊर्जा के व्यापक प्रयोग पर गौर करने की जरूरत है। गैर-मानसून के दिनों में नदियों में जल प्रवाह क्षीण हो जाता है। अनेक छोटी नदियां तो अपना अस्तित्व ही खो चुकी हैं।

पेयजल में मिल रही गंदगी
शहरी इलाकों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार नगर पालिका या निगम उन्नत जल संसाधन संयत्र जुटाने और पाइपों की सामयिक मरम्मत नहीं करवा पाते और लोग स्वच्छ जल के लिए तरसते रहते हैं। कई बार सीवेज पाइपों की लीकेज पेयजल से मिलने से जनस्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न हो जाता है। अमेरिका व अन्य विकसित देश भी असुरक्षित पेयजल की समस्या से अछूते नहीं हैं।

जल स्रोत मानव जाति की साझा संपत्ति
न्यूजर्सी के अध्ययन से पता चला है कि इस क्षेत्र की दो-तिहाई सार्वजनिक पेयजल प्रणालियां पीएफसी (परफ्लोरिनेटिड केमिकल्स) से दूषित हैं। टैफ्लॉन नाम से लोकप्रिय पीएफसी आसानी से विघटित न होने वाला रसायन है, जिसके अंश मनुष्य सहित उन सभी जीवों के ऊतकों में इकट्ठे हो जाते हैं जो कैंसर की संभावना बढ़ाते हैं। पीएफसी पशुओं का प्रजनन और उनका विकास बाधित करता है। कैसी विडंबना है, समूचे विश्व में आधे लोग अस्पतालों में इसलिए भर्ती हैं चूंकि उन्हें पानी नहीं मिला या उन्होंने प्रदूषित पानी का सेवन किया या साफ-सफाई नहीं बरती! जल और इसके स्नोतों को मानव जाति की साझा संपत्ति के रूप में स्वीकारना होगा। इन पर एकाधिकार अनुचित और अनैतिक है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Posted By: Digpal Singh