डॉ अनिल प्रकाश जोशी। देश गंदगी का पर्याय बन गया हो, अगर अपने चारों तरफ के छोटे-छोटे देश जैसे श्रीलंका, मॉरीशश, सिंगापुर, भूटान साफ-सफाई की अलहदा तस्वीर पेश कर रहे हों तो देश के प्रमुख के लिए चिंता की बात तो होगी ही। तभी प्रधानमंत्री मोदी ने सामूहिकता में लोगों का आहान किया है कि आइए हम सब मिलकर गंदगी भारत छोड़ो अभियान छेड़ दें। मर्म तो यही है। अंग्रेजों को भगाने के लिए हमें जितनी मशक्कत करनी पड़ी, उतनी ही गंदगी को भगाने के लिए करनी होगी। उसी सामूहिकता के भाव की आज भी दरकार है।

आज हर तरह की गंदगियां घर शहर-गांव-गलियों में भर चुकी हैं, उससे मुक्त होने के लिये ठोस पहल ही करनी होगी। गंदगी भारत छोड़ों सबको जोड़ने की प्रेरणा से भी जुड़ा है, जिसका प्रयोग राष्ट्र निर्माण के विभिन्न अर्थों में किया जा सकता है। यह भी सच्चाई है कि इस तरह की कोशिश जो आन्दोलनों की तर्ज में खड़ी होती है वो विचारों की समानता को भी बल देती है। इतना ही नहीं इस गंदगी से मुक्ति के जज्बे से हम उस मानसिक गंदगी से भी मुक्तहोंगे जो आज समाज में कूट-कूटकर भर चुकी है।

स्वयं पर केंद्रित समाज खुद को सुरक्षित रखने तक ही सीमित रहता है। उसे देश दुनिया की आलोचनाओं में ही अपनी भागीदारी दिखती है, व उस व्यावहारिकता से दूर भागता है जो उसके सामाजिक दायित्वों से भी जुड़ा है। ये बड़ा सच है कि इस गंदगी मुक्ति के आहान से ही सब कुछ पटरी पर आने की संभावनाएं बढ़ जाती है। इससे जगी चेतना न सिर्फ हमें कूड़ेकचरे से बचाएगी बल्कि हम उन तमाम विकारों से भी बचेंगें जो आज देश की प्रगति में सबसे बड़े बाधक हैं। हम प्रतिदिन 15000 टन कचरा पैदा कर देते हैं। जिसका मात्र 36 प्रतिशत का ही निस्तारण हो पाता है बाकी गंदगी हमारे घरों के चारों तरफ ही एकत्रित रहती है। हमें समझना चाहिए कि गंदगी कभी अकेले नहीं आती, इसके साथ कई तरह की बीमारियां भी जुड़ी होती है, जो पानी, हवा, मिट्टी के जरिये हमें चपेट में लेती हैं।

अपने देश की 80 प्रतिशत बीमारियों की जड़ों को गंदगी ही पनपाती है। गंदगी त्वचा, पेट, श्वसन व नेत्रों में सीधे असर डालती है, फिर इनसे निपटने के लिये अत्यधिक दवाईयों का उपयोग अन्य व्याधियों को भी जन्म देता है। इसे स्वीकार लेना चाहिए कि हमारा देश गंदगी का एक बड़ा गढ़ बन चुका है। और बड़ी बात यह भी है कि हमें इसके साथ जीने की आदत भी पड़ चुकी है, जो शायद इस परिस्थिति का ज्यादा खतरनाक पहलू है। हमने स्वीकार कर लिया है कि हम ऐसे ही पैदा हुए और ऐसे ही समाप्त हो जाएंगे। अब एक नजर हम अपनी परंपराओं की तरफ भी देखें तो घर गांव में प्रबंधन ऐसे थे जिनसे किसी भी तरह के व्यर्थ सामग्री को अन्य उपयोगों में ले आते थे। मसलन फसल कटाई के बाद जो कुछ भी बचे वो या तो चारे में जायेगा या उससे भी जो बचे वो खाद बन जाता रहा है। 

आज रसायन खाद की उपलब्धता व चारे के बाजारू विकल्पों ने कई गांवों में ये भी कचरे की तरह बिखरे दिखाई देते है। वैसे भी परिवारों के भीतर ही देखिये। कपडे़ पुराने हो जाने पर उन्हें कई उपयोगों में ले आते थे, मसलन पैंट का थैला और बाद में वह घर का पोछा बन जाता था। अब पुराना त्यागो और नये की दौड़ में लग जाते हैं। शायद ही पहले कुछ कचरे के नाम पर बचता था मतलब कचरा शब्द ही नयी सभ्यता की देन हैं। जिस तरह से अंग्रेजों ने देश की आत्मा से लेकर आर्थिकी को जकड़ लिया था। उसी से मिलती-जुलती हमारे बीच की गंदगी भी है जिसने हमें शारिरिक, मानसिक, आर्थिक गैरसमझी विवशता की ओर धकेला है। इसलिये जब तक एकजुट एकसाथ देश को मुक्त करने के लिये नहीं जुड़ेंगे तब तक हम सफल नहीं होगें।

(संस्थापक, हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एवं कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन, देहरादून)

 

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