डा. अभिषेक आत्रेय। देश में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए सबसे पहले 1913 में मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग अधिनियम आया। उसके बाद 1923 में मुसलमान वक्फ अधिनियम आया। स्वतंत्रता के बाद वक्फ अधिनियम 1954 अस्तित्व में आया। 1984 में भी वक्फ अधिनियम आया, लेकिन उसे अधिसूचित नहीं किया गया। 1995 में बहुत सारे परिवर्तनों के साथ वक्फ अधिनियम 1995 लाया गया और फिर 2013 में संशोधन अधिनियम से इसमें कई अहम परिवर्तन करते हुए वक्फ बोर्ड्स को असीमित और निरंकुश शक्तियां दे दी गईं। इसी का परिणाम है कि वक्फ संपत्तियां दिन दूनी रात चौगुनी होने लगीं। 1913 से 1995 तक के वक्फ अधिनियमों में वक्फ की परिभाषा के संदर्भ में एक बात समान थी कि ‘किसी मुस्लिम द्वारा धार्मिक एवं पवित्र उद्देश्य से परोपकार के लिए खुदा को हमेशा के लिए दान कर दी गई उसकी संपत्ति वक्फ है।’

2013 के संशोधन अधिनियम द्वारा वक्फ की इस परिभाषा से मुस्लिम शब्द हटा दिया गया, जिससे अब किसी भी धर्म के व्यक्ति द्वारा अपनी संपत्ति वक्फ के लिए दान की जा सकती है। वैसे तो वक्फ परोपकार के लिए किया गया दान है किंतु वक्फ अधिनियम में वक्फ अलल औलाद यानि प्राइवेट वक्फ को भी मान्यता दी गई है। इसके तहत कोई व्यक्ति अपने बच्चों के लिए भी अपनी संपत्ति को वक्फ में दान कर सकता है। वक्फ की परिभाषा के अनुसार वाकिफ का वयस्क होना या स्वस्थ दिमाग का होना आवश्यक नहीं है। वक्फ मौखिक रूप से भी की जा सकती है, इसका लिखित होना आवश्यक नहीं है। यह भी जरूरी नहीं है कि वक्फ किसी डर, धोखे या दबाव के बिना हो, जो कि भारतीय संविदा अधिनियम या संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की आवश्यक शर्तें हैं। रजिस्ट्रेशन अधिनियम में वक्फ का रजिस्ट्रेशन भी आवश्यक नहीं है, न ही कोई स्टांप शुल्क देना आवश्यक है।

एक बार वक्फ घोषित हो जाने के बाद उस संपत्ति को खरीदा या बेचा नहीं जा सकता, उसे केवल किराए पर दिया जा सकता है, वह भी अधिकतम 30 वर्षों के लिए। चाहे उस जमीन पर शापिंग माल, मार्केट या आवासीय अपार्टमेंट ही क्यों न बना दिया जाए, वह संपत्ति हमेशा वक्फ बोर्ड्स के प्रबंधन में ही रहेगी। बोर्ड के पास किसी भी वक्फ संपत्ति के मुतावल्ली को कभी भी हटाने की असीमित शक्तियां हैं। कोई गैर मुस्लिम किसी वक्फ बोर्ड या सेंट्रल वक्फ काउंसिल का सदस्य नहीं हो सकता, किसी बोर्ड का चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर नहीं हो सकता, किसी वक्फ संपत्ति का मुतावल्ली नहीं हो सकता। वक्फ बोर्ड्स स्वयं ही पहचान कर सकते हैं एवं स्वयं ही घोषित कर सकते हैं कि कौन सी संपत्ति वक्फ संपत्ति है, चाहे वह किसी रजिस्टर्ड ट्रस्ट या सोसायटी की ही संपत्ति क्यों न हो।

वक्फ संपत्ति घोषित किए जाने से पहले वक्फ बोर्ड्स पर बाध्यकारी नहीं है कि वह उस संपत्ति के मालिक या उसके उत्तराधिकारियों से कोई सहमति ले या उन्हें कोई सूचना दे। वक्फ बोर्ड के निर्णय के विरुद्ध उस संपत्ति में कोई हित रखने वाले व्यक्ति द्वारा ही वक्फ अधिनियम के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल्स में ही मुकदमा किया जा सकता है, वह भी मात्र एक वर्ष के अंदर। इन ट्रिब्यूनल्स के अतिरिक्त किसी दीवानी न्यायालय को वक्फ अधिनियम से जुड़े मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है तथा पूरे भारत में अभी तक केवल 14 वक्फ ट्रिब्यूनल्स हैं। इन ट्रिब्यूनल्स को किसी मामले में स्टे देने का अधिकार नहीं है तथा किसी भी परिस्थिति में एक दिन की भी देरी माफ करने का अधिकार नहीं है क्योंकि वक्फ अधिनियम में लिमिटेशन अधिनियम को स्पष्ट रूप से बाधित किया गया है। वक्फ अधिनियम के प्रविधानों को देश के किसी भी अन्य अधिनियम के प्रविधानों के ऊपर प्रभावी बनाया गया है। इस प्रकार वक्फ अधिनियम देश के संविधान के मूलभूत ढांचे के विरुद्ध है क्योंकि यह न केवल न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बाधित करता है बल्कि धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को भी विघटित करता है। इसलिए इस अधिनियम में आमूलचूल संशोधन करने की अति शीघ्र आवश्यकता है।

[एडवोकट आन रिकार्ड, सुप्रीम कोर्ट]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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