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वंदे मातरम् पर फैला भ्रम, गायन से सम्मान तक क्यों है जरूरी? Inside Story

By Neelu RanjanEdited By: Shubham Kumar
Published: Sun, 23 Aug 2026 09:00 PM (IST)

भाजपा और कांग्रेस के बीच वंदे मातरम् के गायन पर विवाद के बीच, 1971 का राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक कानून सम्मान के स्पष्ट प्रावधान बताता है।

वंदे मातरम्।

वंदे मातरम्।

HighLights

  1. 1971 कानून वंदे मातरम् के सम्मान और गायन को स्पष्ट करता है।

  2. गृह मंत्रालय ने वंदे मातरम् गायन के लिए दिशानिर्देश जारी किए।

  3. सार्वजनिक स्थानों पर अपमान करने पर तीन साल की सजा।

नीलू रंजन, नई दिल्ली। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सम्मान को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते टकराव के बीच इसके याद करने की अनिवार्यता लेकर सरकारी और सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में सभी पदों के गायन को लेकर बहस छिड़ गई है। लेकिन 1971 के राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक कानून की धाराओं में इसे पूरी तरह से स्पष्ट किया गया है।

मानसून सत्र में पारित संशोधन विधेयक में इस कानून की सभी धाराएं जस की तस है, सिर्फ उसमें राष्ट्रगान के समान राष्ट्रगीत को भी सम्मान देने की बात जोड़ी गई है। 1971 के राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक कानून में कहीं भी राष्ट्रगान जन-गण-मन को पूरी तरह से याद करके गाने का प्रविधान नहीं है।

जाहिर है यह राष्ट्रगीत वंदे मातरम् भी लागू रहेगा। कानूुन में सिर्फ इसके सम्मान की बात कही गई है। इनमें गायन के समय अवरोध, बीच में रोकने की कोशिश, शोर करना या अधूरा गायन शामिल है।

गृह मंत्रालय ने जनवरी में जारी किया था निर्देश

जन-गण-मन की तरह वंदे मातरम् के गायन के लिए गृह मंत्रालय ने जनवरी में ही स्पष्ट दिशानिर्देश जारी कर दिया था। जन-गण-मन के लिए जहां 52 सेकेंड की समय निर्धारित है, वहीं वंदे मातरम् के सभी छह पदों के साथ गायन की तीन मिनट 10 सेकेंड की समय सीमा है।

कांग्रेस ने क्या दिया तर्क?

कांग्रेस की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि वंदे मातरम् का संपूर्ण गायन की अनिवार्यता सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों को लेकर है, पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रमों में यह अनिवार्यता लागू नहीं होती है। लेकिन 1971 के राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक कानून में इसका भी स्पष्ट उल्लेख है।

राष्ट्रगीत के अपमान और उसके लिए सजा की बात इस कानून की धारा दो में है। वहीं धारा एक में राष्ट्रीय ध्वज के मामले में साफ-साफ कहा गया है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान, जहां लोग इकट्ठे होते हैं, पर राष्ट्रीय गौरव का अपमान अपराध है। इसी कानून के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य करते हुए उसके सम्मान में सभी दर्शकों के लिए भी अनिवार्य रूप से खड़ा होने का आदेश दिया था।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म करते हुए सिनेमा घरों की मालिकों की मर्जी पर छोड़कर ऐच्छिक कर दिया था। लेकिन राष्ट्रगान बजने की स्थिति में उसके सम्मान में दर्शकों के खड़ा होने की अनिवार्यता बरकरार रखी थी।

इससे सिर्फ दिव्यांगों को छूट दी गई थी। साफ है राष्ट्रगान की तरह राष्ट्रगीत के लिए भी सभी सार्वजनिक स्थानों पर समान रूप से सम्मान करना अनिवार्य है। कानून में अपमान करने की स्थिति में तीन साल की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रविधान है।

पिछले साल पांच अगस्त को गृह मंत्रालय की ओर से सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के प्रमुखों को दिए गए निर्देश में राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और खेलकूद के अवसरों पर जनता द्वारा कागज के बने राष्ट्रीय ध्वज के झंडे को हाथ में लेकर लहराने की छूट दी गई थी।

लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया गया था कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन झंडों को न तो विकृत किया जाएगा और न ही जमीन पर फेंका जाए, बल्कि प्रशासन उन्हें राष्ट्रीय गौरव के पूरे सम्मान के साथ एकांत में निपटान किया जाए।