राज्य ब्यूरो, जम्मू। यह शिवालिक की पहाडि़यां हैं, जब्रवान और महादेव की चोटियां नहीं। कई बार सोचता हूं कि वापस चला जाऊं, लेकिन किसके पास। श्रीनगर के हब्बाकदल में गणपत्यार क्षेत्र के पास मेरा मकान जल चुका है, सुना है, वहां सड़क बन गई है। रिश्तेदार भी दिल्ली-मुंबई में हैं। फिर भी हिम्मत जुटाता हूं, लेकिन 19 जनवरी का ब्लैक आउट सोने नहीं देता। सबकुछ बदल गया है, पर कश्मीर लौटने की मेरी चाह और मेरा डर दोनों ही नहीं बदले हैं।

सिर्फ मस्जिदों में लाउड स्पीकर गूंज रहे

जम्मू में जगटी माइग्रेंट कॉलोनी के बाहर बरसाती नाले के साथ सटी सड़क किनारे बैठे कश्मीरी पंडित शुभनजी भावुक थे। 19 जनवरी 1990 की उस खौफनाक रात को याद करते हुए वह कहते हैं कि श्रीनगर में ही नहीं पूरे कश्मीर में धर्माध जिहादियों ने ब्लैक आउट कर दिया था। सिर्फ मस्जिदों में लाउड स्पीकर गूंज रहे थे। उस रात जो हुआ-उसके बाद की कहानी सभी को पता है, लेकिन जो हम पर बीती हम ही जानते हैं। उम्र 75 साल हो गई है, रह-रहकर घर याद आता है। ऐसे में अनुच्छेद 370 हटने से एक उम्मीद जागी है।

अखबार में निकले थे कश्मीर छोड़ने के फरमान

जम्मू में पले बड़े सुमित ने कहा कि मेर पिता हर साल कश्मीर जाते थे, इस उम्मीद में कि एक दिन अपने पुश्तैनी घर में रहेंगे। खैर, वह इसी ख्वाहिश के साथ इस दुनिया से चल बसे। मैं एक बार भी कश्मीर नहीं गया। या कहूं कि उन्होंने मुझे जाने ही नहीं दिया, वह कहते थे मौसम बदलते हैं, लेकिन कश्मीर के हालात नहीं। हमारा घर गणपतयार इलाके में था जो जमींदोज हो चुका है। मेरे पिता बताते थे कि वहां कुछ अखबारों में पंडितों को कश्मीर छोड़ने के फरमान निकले थे। मेरे घर में शायद आज भी वह पुराना अखबार पड़ा हो सकता है।

बहन-बेटियों के लिए लगते थे नारे, कैसे

एक अन्य पंडित सुनील धर ने कहा कि हम कश्मीरी विस्थापितों के नाम पर खूब सियासत होती है। हमें पुनर्वास और राहत के नाम पर हर माह नकद राशि और राशन दिए जाने की बातें होती है। हमें राहत मिलती है, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि अधिकांश लोगों को यह पांच-पांच माह तक नहीं मिलती। कौन यहां माइग्रेंट का सर्टिफिकेट लेकर रहना चाहता है। जाएं कहां। मेरी और मेरे छोटे भाई की पढ़ाई के लिए, मेरी बहन की शादी के लिए मेरे पिता को श्रीनगर के रैनावारी में अपना मकान औने पौने दाम बेचना पड़ा था। वह शायद न बेचते, लेकिन उस पर कब्जा हो चुका था। मैं उस समय 18 साल का था। हम शायद वहां रुकते, लेकिन जिस तरह से वहां हमारी बहन-बेटियों के लिए नारे लगते थे, कौन रुकता। हमारे घर पर पत्थर फेंके जाते थे।

कुछ नहीं बदला

एक कश्मीरी पंडित महिला जो प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीर में नौकरी कर रही है। नाम न छापे जाने की शर्त पर कहा कि मैं वेस्सु में बनाई गई कॉलोनी में रह रही हूं। जब हम लोग कश्मीर से निकले थे तब मैं सातवीं में पढ़ती थी। 2016 में एक आतंकी मारा गया और हमारी कॉलोनी पर पथराव हो गया। कॉलोनी में हम कैदियों की तरह हो गए थे। फिर 2017 में भी दो तीन बार ऐसा हुआ। मैंने वहां रहकर महसूस किया है कि कुछ नहीं बदला है। चेहरे बदले होंगे, सोच नहीं। कश्मीर में हमें कोई तंग बेशक न करे, लेकिन घूरती आंखें बहुत कुछ कहती हैं। इसलिए मैंने अपने बच्चों को यहीं अपने सास-ससुर के पास ही छोड़ रखा है।

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