नई दिल्‍ली, जेएनएन। सृष्टि में जीव कोशिका के साथ पादप कोशिका की व्यवस्था का अंतर्निहित मर्म बहुत गहरा है। पादप (पेड़-पौधे) और जीव एक दूसरे के परस्पर अस्तित्व के पूरक हैं। वृक्ष कार्बन डाईआक्साइड का अवशोषण करके पर्यावरण में आक्सीजन यानी हम जीवधारियों की प्राणवायु को अवमुक्त करते हैं। वातावरण में नमी बनाए रखते हैं। माना जाता है कि हरियाली से आच्छादित किसी शहर का तापमान किसी सामान्य शहर के मुकाबले सात डिग्री सेल्सियस कम रह सकता है।

वृक्ष एक लाभ अनेक...इस कहावत का स्याह पक्ष यह है कि वृक्षों के तमाम गुणों को जानते-बूझते हुए भी हममें से अधिकांश अपने जीवनकाल में एक भी पौधा वृक्ष में रूपांतरित नहीं कर पाते हैं। आज दुनिया की सबसे बड़ी विपदा ग्लोबल वार्मिंग है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 जैसी महामारियां अब कुछ अंतराल के बाद पुनरावृत्ति कर सकती हैं। इन दोनों ही विकट संकट की काट सिर्फ और सिर्फ प्रकृति है। पर्यावरण है। पेड़ हैं। जल्द ही मानसून देश के सभी हिस्सों को अपनी फुहारों से गीला कर देगा। यही वह समय है जब रोपे गए किसी पौधे के पनपने की संभावना गुणात्मक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे में 130 करोड़ की आबादी अगर हर साल एक पौधा रोपे तो हमारा देश प्रकृति के अपने पुराने वैभव को फिर से धारण करने में समर्थ होगा।

सवाल यह है कि कौन से पौधे लगाए जाएं? भारतीय जलवायु और भौगोलिक दशाओं को देखते हुए वनस्पति शास्त्री मानते हैं कि भारतीय पारंपरिक प्रजातियों में वे तमाम गुण हैं जो उन्हें वरण योग्य बनाती हैं। ये दुनिया की सबसे अच्छी प्रजातियां है। ये छायादार, फलदार, आर्थिकी, सुगंध, औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं। तो आइए, इस मानसूनी सीजन में हम एक पौधे को वृक्ष बनाने के अपने कदम का श्रीगणेश करें।

अर्थव्यवस्था का अहम घटक हैं वन: आक्सीजन और स्वच्छ पर्यावरण के साथ ही पेड़-पौधों एवं वनों की भूमिका सीधे हमारी अर्थव्यवस्था में भी है। फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन आफ यूनाइटेड नेशंस द्वारा जारी ‘द स्टेट आफ द वल्ड्र्स फारेस्ट्स 2022’ रिपोर्ट में अर्थव्यवस्था में पेड़-पौधों एवं वन आधारित उत्पादों के महत्व को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि किस तरह से लोग अर्थव्यवस्था में वनों की भूमिका को कमतर आंक रहे हैं। रिपोर्ट के कुछ अहम बिंदुओं पर डालते हैं नजर:

कार्बन कटौती की कठिन चुनौती: दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के संकट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में वनों की अहम भूमिका होगी। भारत ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचने के लिए 2030 तक वन क्षेत्र को बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निसंदेह पौधारोपण की गति को और तेजी से बढ़ाना होगा।

पौधारोपण के आगे भी है जिम्मेदारी: पौधारोपण के अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाने के दो बड़े कारण हैं। पहला कारण है कि लोगों को स्थान विशेष की मृदा एवं जलवायु के आधार पर पौधों का चयन करने की जानकारी नहीं है। दूसरा बड़ा कारण है जिम्मेदारी न निभाना। किसी पौधे को मजबूत वृक्ष का रूप लेने में कम से कम पांच साल का समय लगता है। पौधारोपण के बाद कुछ वर्ष तक उसकी देखभाल करना भी आवश्यक है। सरकारी अभियान के रूप में होने वाले पौधारोपण में भी निगरानी की सुदृढ़ व्यवस्था होनी चाहिए।

एमएसपी से भी निकल सकती है राह: कोई किसान पेड़ क्यों लगाए? कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के प्रयासों के बीच यह अहम प्रश्न है। इस प्रश्न के समाधान की राह एमएसपी से निकल सकती है। तमाम वनस्पति शास्त्री मानते हैं कि सरकार पेड़ों से पैदा होने वाले फलों व अन्य उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी तय करके लोगों को पौधारोपण के प्रति प्रोत्साहित कर सकती है।

Edited By: Sanjay Pokhriyal