उत्तराखंड [कुशल कोठियाल]। कई रियायतों के साथ उत्तराखंड पांचवें लॉकडाउन में पहुंच गया है। राज्यवासी यह जरूर सोच रहे हैं कि अगर पहले जमाती और अब प्रवासियों की अनियंत्रित आमद न होती तो उत्तराखंड काफी पहले कोरोना से निजात पा चुका होता।

इसके साथ ही लोग यह भी संकल्प ले रहे हैं कि पारस्परिक सहयोग एवं शारीरिक दूरी कायम रखते हुए आने वाले दिनों में कोरोना को हराएंगे। पंद्रह दिन पहले राज्य में कुल संक्रमितों की संख्या 82 थी, जो कि मई माह के अंत में 800 पहुंच गई। एक ही दिन में दो-दो सौ के पार संक्रमितों के जुड़ने से लोग चौंके तो जरूर, लेकिन हिमालयी राज्य में रह रहे लोग डिगे नहीं।

दो लाख के करीब प्रवासियों ने राज्य में आने के लिए नामांकन कराया था। इस बीच श्रमिक ट्रेनों तथा बसों से 1.80 लाख प्रवासी राज्य में पहुंचे हैं। छोटे से राज्य में महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों से इतनी बड़ी तादाद में आए लोगों में काफी संख्या में संक्रमित मिले हैं। अभी सैंपलिंग का दौर जारी है। ग्रीन जोन के आठ पहाड़ी जिले झटके में ऑरेंज हो गए हैं। गांव-गांव में संक्रमित लोगों की पहचान हो रही है।

बावजूद इसके सद्भावना, सहयोग और समर्पण सभी जगह तथा सभी स्तर पर दिख रहा है। आने वाले भी सतर्क हैं एवं स्थानीय लोग भी सजग। सतर्कता के साथ सहयोग के उदाहरण गांव-गांव में दिख रहे हैं। शुरुआती दौर में राजनीतिक दलों ने प्रवासियों के मुद्दे पर सियासत करने की कोशिश जरूर की, लेकिन कोई लाभ न मिलते देख कदम पीछे भी खींच लिए। शासन एवं प्रशासन के स्तर पर लापरवाही दिखी तो न्यायपालिका ने सख्त हिदायत दे डाली। दूसरे दिन ही प्रवेश द्वार पर ही संस्थागत क्वारंटाइन की व्यवस्था मजबूत कर ली गई। 

हुआ यह कि लॉकडाइन के पीरियड में सीधे अपने घर जाने का इरादा रखने वालों ने बदले हालात में न आना ही ठीक समझा, क्योंकि उत्तराखंड में घुसते ही संस्थागत क्वारंटाइन जरूरी कर दिया गया है। दिल्ली में देहरादून से प्रवासियों को लेने गई बीस बसें तीन दिन बाद भी सवारियां न मिलने पर वापस लौट आईं।

साथी हाथ बढ़ाना : 

राज्य में करीब दो लाख प्रवासी लौटे हैं और 65 हजार अन्य राज्यों के लोग यहां से अपने घरों को गए हैं। इनमें श्रमिकों की तादाद भी खासी रही। राज्य में लोगों की इतने बड़े पैमाने पर आवाजाही ने व्यवस्था को काफी हद तक हिला दिया। जो आए हैं वे पीड़ित हैं जो गए हैं वे भी मजबूर हैं। सरकार तमाम जतन के बावजूद जाने वालों को रोक नहीं पाई और आने वालों के लिए मनमाफिक जगह नहीं बना पाई।

राज्य में कई बड़ी परियोजनाओं पर मात्र बीस फीसद श्रम क्षमता के आधार पर काम हो रहा है। राज्य से बड़ी संख्या में निर्माण श्रमिक उत्तर प्रदेश और बिहार लौट गए हैं। चुने हुए प्रतिनिधि, राजनीतिक पार्टियां, स्वयंसेवी संगठन उन्हें रोक नहीं पाए। उनके उत्तराखंड जैसे शांत एवं व्यवस्थित राज्य से जाने की वजह भी समझ से परे है। राज्य में काम इंतजार कर रहा है, लेकिन श्रमिक उत्तर प्रदेश और बिहार में क्वारंटाइन हैं।

प्रदेश सरकार अब यह गुणा-भाग कर रही है कि किस परियोजना में किस तरह के और कितने श्रमिकों की जरूरत होगी। इसके बाद संबंधित राज्यों को रोजगार के इन अवसरों से अवगत कराया जाएगा तथा श्रमिकों की व्यवस्था की जाएगी। गौरतलब है कि जो प्रवासी श्रमिक राज्य में लौटे हैं वे निर्माण श्रमिक न के बराबर हैं। करीब पौने दो लाख की संख्या में लौटे प्रवासियों के लिए रोजगार के अवसर तलाशने का काम भी विशेषज्ञ कर रहे हैं।

मंत्री परिवार समेत कोरोना पॉजिटिव :

उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज परिवार और अपने स्टाफ के कई कर्मचारियों के साथ कोरोना संक्रमण के दायरे में आ गए हैं। दरअसल एक दिन पूर्व ही महाराज की पत्नी अमृता रावत, जो खुद भी पूर्व मंत्री हैं, का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया था। एहतियातन महाराज ने परिवार एवं स्टाफ, सबका टेस्ट कराया तो कुल 22 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई।

नतीजतन महाराज और उनके परिवार के पांच सदस्य एम्स ऋषिकेश और बाकी को देहरादून में अस्पताल में भर्ती कराया गया। मंत्री सतपाल महाराज ने दो दिन पहले ही कैबिनेट बैठक में शिरकत की थी तो उसमें मौजूद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीन कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल ने स्वयं को क्वारंटाइन कर लिया है। [स्थानीय संपादक, उत्तराखंड]

 

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