नई दिल्‍ली [स्‍पेशल डेस्‍क]। ईरान और अमेरिका के बीच वर्ष 2015 में हुई परमाणु डील आखिरकार टूट गई। अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने इस डील से हटने का ऐलान तय समय से तीन दिन पहले ही कर दिया। हालांकि उनके ऐलान करने से पहले ही पूरी दुनिया को इसका अंदेशा था। लेकिन इस डील से हटने को लेकर अब अमेरिका कहीं न कहीं अलग-थलग पड़ गया है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि फ्रांस और जर्मनी ने परमाणु डील से जुड़े रहने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। डील के टूटने के बाद दुनिया के कई बड़े देशों में इसकी आहट सुनाई दी है। फ्रांस और जर्मनी दोनों ने ही इस डील से अमेरिका के पीछे हटने को दुर्भागयपूर्ण बताया है।

ओबामा ने जिसे बताया उपलब्धि, ट्रंप ने बताया भूल

ईरान और अमेरिका के बीच हुई इस डील में इन दोनों देशों के अलावा फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन भी शामिल थे। ज्‍वाइंट कांप्रिहेंसिव प्‍लान ऑफ एक्‍शन (JCPOA) को ही परमाणु डील के नाम से जाना गया था। वर्ष 2015 में तत्‍कालीन ओबामा सरकार ने इसको अपनी बड़ी उपलब्‍धि बताया था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने इसको ऐतिहासिक भूल और खराब सौदा करार देते हुए इस डील से पीछे हटने का फैसला लिया है। तीन माह तक इस डील को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच पशोपेश का दौर जारी था, जिसका अब पटाक्षेप हो गया है। ट्रंप ने अपना फैसला सुनाने से एक दिन पहले ट्वीट पर इस फैसले को सुनाने का जिक्र किया था। अपने ट्वीट में उन्‍होंने लिखा था कि वह कल यानि बुधवार को इस बाबत अपने फैसले की घोषणा व्‍हाइट हाउस में करेंगे।

भारत से व्‍यापार पर असर

बहरहाल इस परमाणु डील के टूटने के बाद भी पांच अहम देश इसके साथ जुड़े हैं। लेकिन इस डील के टूटने का असर सिर्फ ईरान तक ही सीमित नहीं है। इसका असर कहीं न कहीं भारत पर भी पड़ सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में तेल की आपूर्ति में ईरान काफी बड़ी भूमिका निभाता है। इसके अलावा ईरान तेल का निर्यात करने में दुनिया में तीसरे नंबर पर आता है। वहीं दुनिया में भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल का खरीददार है। ऐसे में अमेरिका से डील टूटने का असर भारत और ईरान के बीच तेल के व्‍यापार पर पड़ सकता है। ऑब्‍जरवर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत भी मानते हैं कि इस डील के टूटने का असर दोनों के बीच तेल के व्‍यापार पर पड़ सकता है। उनका मानना है कि भारत को फिर एक बार उन्‍हीं मुश्किलों से दो-चार होना पड़ सकता है जो इस डील के होने से पहले थीं।

भारत की बढ़ सकती है परेशानी

आपको बता दें कि वर्ष 2015 में इस डील के होने से पहले अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए थे, जिसके बाद मजबूरन भारत को ईरान से तेल की खरीददारी से हाथ खींचने पड़े थे। ऐसे में फिर एक बार भारत को इन्‍हीं सब से दो-चार होना पड़ सकता है। उनके मुताबिक 2015 में हुई डील के बाद ही भारत को चाबहार प्रोजेक्‍ट को आगे बढ़ाने में मदद मिली थी। चाबहार ईरान का एकमात्र बंदरगाह है और रूस यूरोप में सामान भेजने का हब है। प्रोफेसर पंत का मानना है कि ताजा हालात इसमें भी दिक्‍कत पैदा कर सकते हैं। उनका कहना है कि ताजा हालात से ईरान के साथ संबंधों में भी बदलाव हो सकता है। उनके मुताबिक भारत सरकार ने जिस तरह से बीते वर्षों में इजरायल समेत मिडिल ईस्‍ट के दूसरे देशों से संबंधों को बेहतर किया है उस पर इसका फर्क पड़ सकता है।

 

संबंधों में आ सकती है गिरावट

पंत का यह भी कहना है कि हाल के कुछ माह में ईरान के साथ यूं भी भारत के संबंधों में कुछ गिरावट जरूर आई है। इसकी दो बड़ी वजह हैं। इनमें पहली वजह एक ऑयल फील्‍ड को रूसी कंपनियों को सौंपना और दूसरी वजह ईरान का चाबहार प्रोजेक्‍ट में चीन और पाकिस्‍तान को शामिल करना। इन दोनों बातों से भारत नाराज है। ईरान के साथ परमाणु डील के खत्‍म होने से ईरान में चीन की घुसपैठ बढ़ सकती है। उनके मुताबिक अमेरिका की दबाव की रणनीति भी इस दिशा में काम करेगी। हालांकि भारत ने ईरान में निवेश के लिए काफी काम किया है।

इजरायल बना वजह

आपको यहां पर बता दें कि परमाणु डील खत्‍म करने के पीछे इजरायल को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। इसकी वजह ये है कि कुछ ही दिन पहले इजरायल के राष्‍ट्रपति बेंजामिन नेतन्‍याहू ने टीवी पर एक प्रजेंटेशन देकर ईरान पर आरोप लगाया था कि उसने डील की आड़ में अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा है और दुनिया को धोखे में रखा है। वहीं अमेरिका के माइक पोंपियो ने भी कहा था कि इजरायल ने जो बातें कहीं हैं वह सटीक हैं और ईरान ने दुनिया को धोखे में रखा है।

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Posted By: Kamal Verma