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क्या अब चांद पर शुरू होगा न्यूक्लियर सुपरपावर्स का महासंग्राम? अमेरिका, चीन और रूस के बीच लूनर रिएक्टर बनाने की होड़ तेज

Published: Mon, 05 Oct 2026 02:00 AM (IST)

दुनिया की महाशक्तियां अमेरिका, रूस और चीन चंद्रमा पर स्थायी बेस और अंतरिक्ष अभियानों के लिए न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की ...और पढ़ें

चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की होड़ (AI फोटो)

चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की होड़ (AI फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों को रफ्तार देने और चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने के लिए दुनिया की महाशक्तियों के बीच एक नई होड़ शुरू हो गई है। अमेरिका, रूस और चीन अब चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की तैयारी में जुटे हैं।

द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, तीनों देशों का मानना है कि चांद पर स्थायी बेस बनाने, उसके कीमती संसाधनों की खोज करने और अंतरिक्ष में असरदार मिशनों को संचालित करने के लिए पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के बजाय परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र सबसे भरोसेमंद विकल्प है।

नासा और रूस-चीन की योजनाएं

अंतरिक्ष में बढ़त बनाए रखने के लिए अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने बीते अगस्त को कॉन्ट्रैक्टर्स से एक ऐसा न्यूक्लियर रिएक्टर डिजाइन करने को कहा है, जो अंतरिक्ष की कठिन यात्रा को झेल सके और चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बिना किसी रखरखाव के काण कर सके।

नासा का लक्ष्य दिसंबर 2030 तक अपने लूनर रिएक्टर 1 को लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार करना है। यह रिएक्टर 20 किलोवाट बिजली पैदा करेगा और बिना किसी इंसानी हस्तक्षेप के लगातार पांच सालों तक काम करने में सक्षम होगा।

दूसरी ओर, रूस और चीन एक गुप्त साझेदारी के तहत काम कर रहे हैं। रूस 2036 तक सेलेना लूनर रिएक्टर विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। 10 किलोवाट बिजली क्षमता वाले इस रिएक्टर को चीन के नेतृत्व में बनने वाले स्टेशनों को ऊर्जा देने के लिए डिजाइन किया जा रहा है, जो एक दशक तक स्वचालित रूप से काम कर सकेगा।

न्यूक्लियर पावर प्लांट पर क्यों जता रहे भरोसा?

चांद पर स्थायी बेस चलाने के लिए लगातार बिजली की आवश्यकता होगी। हालांकि सोलर पैनल दिन में बिजली दे सकते हैं, लेकिन चांद पर रातें पृथ्वी के कैलेंडर के हिसाब से 14 दिनों से ज्यादा लंबी और बहुत ठंडी होती हैं। ऐसे में केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना संभव नहीं है।

न्यूक्लियर रिएक्टर बिना सूरज की रोशनी के भी सालों तक लगातार बिजली आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं।

क्या हैं रणनीतिक चिंताएं?

तकनीकी रूप से यह कदम जितना क्रांतिकारी दिखता है, उतना ही जोखिम भरा भी है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि रॉकेट लॉन्च के दौरान किसी भी विफलता से रेडियोएक्टिव पदार्थ वायुमंडल या चंद्रमा पर फैल सकता है।

पृथ्वी के विपरीत, चांद पर रिएक्टरों के चारों तरफ भारी सुरक्षा घेरा बनाना बेहद मुश्किल और कठिन होगा। इसी खतरे को कम करने के लिए अमेरिका और रूस दोनों ही अपने रिएक्टरों को निष्क्रिय अवस्था में चांद पर भेजने की योजना बना रहे हैं। सुरक्षा के अलावा, इस होड़ ने भू-राजनीतिक चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।

बता दें, 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के तहत कोई भी देश चांद पर अपने संप्रभु अधिकार का दावा नहीं कर सकता, लेकिन नासा को डर है कि चीन और रूस द्वारा स्थापित न्यूक्लियर रिएक्टर के आसपास एक प्रतिबंधित सुरक्षा क्षेत्र बन सकता है। इससे अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों और रोवर्स की आवाजाही सीमित हो सकती है, जो कि अंतरिक्ष में सभी देशों की मुक्त पहुंच के वैश्विक सिद्धांत के खिलाफ होगा।