चीन-अमेरिका के बीच AI वॉर? ब्रिक्स के अगले दिन गरमाया मोर्चा
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद चीन और अमेरिका के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर वैश्विक शक्ति-संतुलन की नई दौड़ ...और पढ़ें

HighLights
चीन ने ब्रिक्स के लिए ओपन-सोर्स AI इकोसिस्टम का प्रस्ताव किया।
अमेरिका AI दौड़ में आगे होने का दावा कर रहा है, निर्यात नियंत्रण लगाए।
भारत ने तकनीक के हथियारकरण के खिलाफ चेतावनी दी, ग्लोबल साउथ पर जोर।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारत में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के अगले ही दिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) वैश्विक शक्ति-संतुलन का नया मैदान बनती दिख रही है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने सदस्य देशों के लिए चीन के नेतृत्व वाला ओपन-सोर्स एआई इकोसिस्टम प्रस्तावित किया है तो राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस दौड़ में चीन से आगे है।
राष्ट्रपति ट्रंप के बयान को दरअसल, चीन की तरफ से दुनिया के प्रमुख विकासशील देशों को अपने ओपन सोर्स एआई की तरफ लुभाने की लगातार हो रही कोशिश से जोड़ कर देखा जा रहा है। दो महीने पहले ही चीन ने 29 देशों के साथ वर्ल्ड एआई कोऑपरेशन आर्गनाइजेशन का गठन किया है और अब वह ब्रिक्स के सदस्यों व साझेदारों के सामने भी प्रस्ताव रख दिया है।
34 देशों ने हस्ताक्षर किये
दूसरी तरफ, अमेरिकी एआई कंपनियों ने एआई की प्रगति को ‘स्लोडाउन’ करने का आह्वान किया है। जबकि अमेरिका के नेतृत्व में पैक्स सिलिका संगठन की अंतिम बैठक जून, 2026 में हुई थी। इसमें जारी संयुक्त बयान मे 34 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं लेकिन उसके बाद अमेरिका के भीतर ही एआई की प्रगति को लेकर विरोधाभाष सामने आ रहा है। स्वयं ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी कंपनियों की एआई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने की बात की जा रही है। संकेत साफ है कि एआई संबंधित प्रौद्योगिकी को लेकर वैश्विक कूटनीति में तनाव बढ़ने जा रहा है।
विशेष प्रशिक्षण आयोजित
13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स के समापन सत्र में शी ने कहा कि चीन ब्रिक्स के लिए ओपन-सोर्सएआई समुदाय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा, बड़े भाषा माडल के विकास व उपयोग में सहयोग देगा, विशेष प्रशिक्षण आयोजित करेगा और खुला एआई पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा करेगा। यह प्रस्ताव उस पृष्ठभूमि में आया है जब चीनी कंपनियां ओपन-सोर्स माडल पर जोर दे रही हैं और अमेरिकी दिग्गज अधिक बंद, फ्रंटियर माडल पर काम कर रहे हैं।
दो महाशक्तियों की दौड़ नहीं
भारत भी अमेरिका व चीन की इस प्रतिद्वंदिता को पहचान रहा है। ब्रिक्स के समापन सत्र में पीएम नरेन्द्र मोदी की चेतावनी कि 'तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स का हथियार बनाना साझा प्रगति में बाधा बन सकता है', को भारत की नीति का ही द्योतक है। पीएम मोदी ने उस बयान के जरिए चीन व अमेरिका, दोनों को यह बताने की कोशिश की है कि एआई सिर्फ दो महाशक्तियों की दौड़ नहीं, बल्कि इस प्रौद्योगिकी पर गरीब व विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) की भी पहुंच होनी चाहिए।
एआई आधारित प्रौद्योगिकी को लेकर लामबंदी
पिछले तीन-चार महीनों में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में एआई को लेकर अपने अपने हितों की रक्षा करने के कई उदाहरण दिखते हैं। अमेरिका ने बेहद उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड एक्सेस और कुछ फ्रंटियर माडल पर निर्यात नियंत्रण व इन्हें सिर्फ 'भरोसेमंद साझेदारों' के साथ साझा करने की व्यवस्था करने का ऐलान किया है।
एआई स्टैक का निर्यात कूटनीति का हिस्सा
पैक्स सिलिका जैसे गठबंधन के जरिए ट्रंप प्रशासन ने एक तरह से चीन या अमेरिका में से एक को चुनने का दबाव बनाया है। भारत भी पैक्स सिलिका का सदस्य है। साथ ही ट्रंप ने खाड़ी देशों को चिप्स व निवेश के सौदे से जोड़ा और अपने एआई स्टैक का निर्यात कूटनीति का हिस्सा बनाया। इसके जबाव में चीन ने जुलाई 2026 में शंघाई मुख्यालय वाले वर्ल्ड एआई कोऑपपरेशन आर्गनाइजेशन पर 29 देशों के साथ समझौता किया है।
प्रौद्योगिकी की दुनिया
पाकिस्तान, रूस, मलेशिया, केन्या, क्यूबा, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, ब्राजील जैसे देश इसके सदस्य हैं। चीन ने रेअर अर्थ मिनिरल्स के निर्यात को नियंत्रित कर दुनिया को बताया कि वह प्रौद्योगिकी की दुनिया में कितनी अफरा-तफरी मचा सकता है। उधर, यूरोपीय संघ ने एआई एक्ट लागू कर बाजार-प्रवेश को नियम का हथियार बनाया।
इसका मतलब यह है कि दुनिया की किसी भी देश की एआई कंपनी अगर ईयू में आता है तो उस पर ईयू का एआई कानून लागू होगा। नहीं माना तो बाजार बंद। राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को कहा है कि 'जो एआई जीतेगा, वहीं जीतेगा’ इस प्रतिद्वंदिता को दिखाता है। ऐसे में माना जा रहा है कि इसी महीने अमेरिका में शी और ट्रंप की प्रस्तावित मुलाकात में एआई गवर्नेंस का मुद्दा प्रमुख एजेंडा होगा।
