UGC के नए समता नियमों पर सवर्ण समाज का विरोध, सरकार ने रास्ता निकालने के लिए शुरू किया मंथन
यूजीसी के नए समता नियमों को लेकर सवर्ण समाज के विरोध से केंद्र सरकार चिंतित है। इन नियमों का उद्देश्य ...और पढ़ें

UGC के नए समता नियमों पर सवर्ण समाज का विरोध।

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी ) के नए समता नियमों को वैसे तो उच्च शिक्षण संस्थानों से भेदभाव को मिटाने के लिए लाया गया था लेकिन सवर्ण समाज इन नियमों के दुरुपयोग होने को लेकर जिस आशंकित है और विरोध में खड़ा हो गया है, उससे न सिर्फ केंद्र सरकार की चिंताएं बढ़ गई है बल्कि संस्थानों में छात्रों के बीच और कटुता बढ़ने की भी संभावना है। केंद्र सरकार इसका रास्ता ढूंढने में जुट गई है।
बताया जा रहा है कि इस सिलसिले में शिक्षा मंत्रालय व यूजीसी ने महाधिवक्ता से संपर्क साधा है। माना जा रहा है कि जल्द ही इसका कोई रास्ता निकाला जा सकता है। नए नियम में अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ साथ ओबीसी को भी जोड़ा गया है और दुरुपयोग होने पर कार्रवाई जैसा प्रविधान हटा दिया गया है। चिंताएं इसी से बढ़ी हैं।
वैसे भी सवर्ण समाज यूजीसी के इन नियमों को लेकर जिस तरह से आंदोलित है और उन्हें समाज से जुड़े सांसदों, विधायकों व दूसरे नेताओं का समर्थन मिल रहा है, उससे इस आंदोलन के और भी उग्र होने की संभावना है। इनमें सवर्ण समाज के जुड़े कई भाजपा सांसद खुलकर मैदान में उतर गए है।
मंत्रालय से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो इस विरोध को बढ़ते देख शिक्षा मंत्रालय ने नए समता नियमों पर सवर्ण समाज की आपत्तियों को लेकर नए सिरे से मंथन शुरू किया है। साथ ही महाधिवक्ता से भी चर्चा की है। जो संकेत मिल रहे है, उनमें सवर्ण समाज की ओर से इसके दुरुपयोग को लेकर खड़ी की जा रही आपत्ति को दूर किया जा सकता है।
गौरतलब है कि यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े वर्ष 2012 के समता नियमों में यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद किया है। जो कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे छात्रों की आत्महत्या के मामलों के बाद दिए थे। ताकि कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
उच्च शिक्षण संस्थानों के समता संवर्धन नियमों में किए गए ये अहम बदलाव
भेदभाव के दायरे को विस्तार देना: वर्ष 2012 के नियमों की तुलना में 2026 के नियमों में भेदभाव की परिभाषा को अधिक सख्त और विस्तृत बनाया गया है। साथ ही जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा का दायरा भी बढ़ाया गया है। इनमें अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के साथ अब अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों व कर्मचारियों को भी इसके दायरे में लाया गया है। 2012 के रेगुलेशन में सिर्फ एससी व एसटी को जातिगत भेदभाव में रखा गया था।
झूठी शिकायतों पर दंड को हटाना: 2012 के नियमों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों पर जुर्माने व दंड के उपाय थे, जबकि 2026 के रेगुलेशन में से इसको हटा दिया गया है। इसके पीछे कारण बताया जा रहा है वह यह है कि ऐसा होने से असली पीड़ित शिकायत करने से डरे नहीं।
सख्त निगरानी तंत्र: नए नियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समता दस्ते और समता दूत की अनिवार्य रूप से नियुक्ति करनी होगी। वहीं भेदभाव के मामलों पर सात दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट देनी होगी। साथ ही दंड विधि के तहत कोई मामला बनता है तो पुलिस अधिकारियों को तत्काल सूचित किया जाएगा।
संस्थानों पर जिम्मेदारी: यदि संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो यूजीसी उनकी डिग्री, वित्तीय मदद या ऑनलाइन कोर्सों के संचालन आदि से रोक लगाने जैसी दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है।
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