संसदीय समिति की बैठक में यूपीआई पर टैक्स का कांग्रेस सांसदों ने नहीं किया था विरोध? छिड़ा विवाद
केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच यूपीआई पर नए चार्ज (MDR) को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस ...और पढ़ें

मनीष तिवारी और गौरव गोगोई।
HighLights
कांग्रेस ने यूपीआई एमडीआर पर विरोध न करने के दावे खारिज किए।
कांग्रेस सांसदों ने कहा, यूपीआई टैक्स प्रस्ताव समिति में नहीं था।
कांग्रेस ने सरकार पर विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यूपीआई पर नए चार्ज (MDR) को लेकर केंद्र सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। इसी बीच संसदीय समिति की बैठक में कांग्रेस सांसदों की तरफ से असहमति दर्ज न कराने के दावों को लेकर कांग्रेस नेताओं ने जोरदार पलटवार करते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। गौरव गोगोई और मनीष तिवारी समेत कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने इसे सरकार का भ्रामक दावा करार दिया है।
बता दें कि विवाद बढ़ने के बाद यह दावा सामने आया था कि अगस्त में हुई वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति की बैठक में कांग्रेस के पांच सांसद गौरव गोगोई, पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ मौजूद थे, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव पर कोई असहमति दर्ज नहीं कराई थी।
आरोपों पर कांग्रेस सांसद को पलटवार
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने इन आरोपों का कड़ा जवाब देते हुए कहा कि समिति की बैठकों में यूपीआई टैक्स या MDR को लेकर कोई भी विशिष्ट या ठोस प्रस्ताव नहीं रखा गया था। उन्होंने जोर देते हुए बताया कि बैठक में न तो दरें बताई गईं, न ही कोई राशि, सीमा या छूट का स्लैब तय हुआ था।
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी गोगोई का समर्थन करते हुए अपना रुख साफ किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर साफ किया कि संसदीय समिति के सामने कभी भी 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस विशिष्ट MDR प्रस्ताव को नहीं लाया गया था। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि सरकार राजनीतिक लाभ लेने के लिए संसदीय समितियों की गोपनीय कार्यवाही का गलत इस्तेमाल कर रही है।
कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप
इसके साथ ही कांग्रेस का यह भी आरोप है कि सरकार अमेरिकी दबाव और वीजा जैसी विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह कदम उठा रही है। कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए इसे डिजिटल व्यवस्था के साथ खिलवाड़ और जनता की जेब पर डाका डालने वाला फैसला करार दिया है।
समझिए क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई, जब केंद्र सरकार ने छह साल से पूरी तरह मुफ्त चली आ रही यूपीआई व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए 15 अक्टूबर से मर्चेंट को होने वाले 2000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाने का फैसला किया है।
हालांकि, आम लोगों के बीच होने वाले पर्सन-टू-पर्सन ट्रांजैक्शन और 2000 रुपये से कम के भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। साथ ही, यह शुल्क उपभोक्ताओं पर नहीं बल्कि व्यापारियों पर लगेगा और 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर यह अधिकतम 300 रुपये तक सीमित होगा।
अब समझिए सरकार और NPCI का पक्ष
गौर करने वाली बात यह भी है कि वित्त मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर स्पष्ट किया है कि यूपीआई पर 0.4% MDR लगाने के फैसले के पीछे किसी भी तरह का विदेशी प्रभाव नहीं है। भारत के नीतिगत फैसले पूरी तरह स्वतंत्र हैं, जिनका उद्देश्य एक आत्मनिर्भर और समावेशी डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम तैयार करना है।
दूसरी ओर नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के अनुसार, सर्वर, बैंडविड्थ, धोखाधड़ी से बचाव और बैंक तकनीकी सहायता जैसे कार्यों का सालाना परिचालन खर्च करीब 20000 से 20,700 करोड़ रुपये बैठता है। इस राजस्व से बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
