रिजवान अंसारी। इस बार संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम को कोरोना काल में शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजने के एलान ने सबका ध्यान खींचा। हालांकि इससे पहले भी शांति का यह पुरस्कार कई संगठनों को मिल चुका है, लेकिन छह दशक पुराने संगठन को लंबे इंतजार के बाद इस पुरस्कार का हकदार पाया जाना, कई मायनों में अहम है। गिनीज वल्र्ड रिकॉर्डस की मानें, तो विश्व खाद्य कार्यक्रम दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय कार्यक्रम है। इससे इतर विश्व खाद्य कार्यक्रम 2030 तक दुनिया में भूख को खत्म करने के अपने वैश्विक लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध है। यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि जब से इस कार्यक्रम की स्थापना हुई है, तबसे ही यह भुखमरी को खत्म करने के अपने मिशन पर डटा हुआ है।

यह संगठन दो तरह से भोजन सहायता लोगों तक पहुंचाता है। पहला, यह खाद्यान्नों को लोगों तक पहुंचा कर उनके भोजन की व्यवस्था करता है। दूसरा, नकदी हस्तांतरण के जरिये यह लोगों की मदद करता है, जिससे उनकी खाद्य-जरूरतें पूरी होती हैं। 2005 में श्रीलंका में सुनामी के समय पहली बार नकदी हस्तांतरण शुरू किया गया था। 2019 में विश्व खाद्य कार्यक्रम ने 88 देशों के करीब 10 करोड़ लोगों को तकरीबन 42 लाख मीटिक टन भोजन और 1.2 बिलियन डॉलर नकद मदद सहायता प्रदान की। नोबेल समिति की मानें, तो विश्व खाद्य कार्यक्रम इन्हीं असाधारण कार्यो के लिए नोबेल से सम्मानित किया गया है।यह कोई छुपी बात नहीं है कि कोरोना काल में दुनिया भर में भूख से पीड़ितों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह संख्या लगातार विकराल होती जा रही है। नोबेल पुरस्कार कमेटी के मुताबिक यमन, कांगो गणराज्य, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान और बुर्किनाफासो जैसे देशों में हिंसक संघर्ष और महामारी की दोहरी मार से भुखमरी के कगार पर रहने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन इस दौरान विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपने प्रयासों को तेज कर एक प्रभावशाली क्षमता का प्रदर्शन किया है। यह भूख को खत्म करने के लिए किस कदर प्रतिबद्ध है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने कोरोना वैक्सीन आने तक महामारी के खिलाफ भोजन को सबसे अच्छा वैक्सीन बताया है।

जाहिर है विश्व खाद्य कार्यक्रम को शांति का नोबेल का एलान दुनिया में व्याप्त खाद्य असुरक्षा और भुखमरी की गंभीरता की तरफ इशारा कर रहा है। यह जमीनी स्तर से वैश्विक शासन के उच्चतम स्तर तक भूख और अकाल से लड़ने के निरंतर प्रयासों की ओर ध्यान आकर्षति करता है। यदि हम भूख को बुनियादी मानव अधिकारों और सम्मान के उल्लंघन के रूप में नहीं देखते हैं, तो एक बड़ी और कमजोर आबादी धीरे-धीरे मौत के मुंह में चली जाएगी और यह एक प्रगतिशील और समाज के लिए किसी हार से कम नहीं होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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