उच्च शिक्षा में नेतृत्व की कमी: यूजीसी-एआईसीटीई अध्यक्ष पद खाली, नीतिगत फैसले अटके
देश की उच्च शिक्षा में नेतृत्व का संकट गहरा गया है, जहां यूजीसी और एआईसीटीई जैसे प्रमुख नियामकों में अध्यक्ष पद एक साल से अधिक समय से खाली पड़े हैं।

यूजीसी और एआईसीटीई अध्यक्ष पद एक साल से खाली
HighLights
यूजीसी और एआईसीटीई अध्यक्ष पद एक साल से खाली
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक संसद में अटका हुआ
उच्च शिक्षा संस्थानों में नीतिगत निर्णय प्रभावित हो रहे हैं
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। देश की उच्च शिक्षा के सामने इन दिनों अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान के चलते जहां यूजीसी व एआइसीटीई जैसे नियामकों में अध्यक्ष का पद साल भर से खाली पड़ा है, वहीं विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान से जुड़ा विधेयक अभी भी संसद में अटका हुआ है।
साथ ही जो स्थिति बनी हुई है, उसमें उसे लेकर जल्द कोई सहमति बनने की संभावना भी नहीं है। उच्च शिक्षा के भीतर बनी इस स्थिति से देश भर के उच्च शिक्षण संस्थान भी उलझन में हैं। उनका दावा है कि यूजीसी व एआइसीटीई जैसे नियामकों के पास स्थायी नेतृत्व नहीं होने से नीतिगत निर्णय लगातार टल रहे हैं।
वैसे तो यूजीसी के अध्यक्ष का प्रभार उच्च शिक्षा सचिव को दे रखा है, वहीं इसीतरह एआइसीटीई के अध्यक्ष का जिम्मा दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह को दे रखा है। हालांकि इन दोनों ही के पास पहले से अपने मूल विभाग की बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में वह इन दोनों नियामकों से जुड़े रूटीन कामों तक खुद को सीमित रखे हुए है।
उच्च शिक्षा की यह स्थिति तब है कि जब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) से जुड़ी सिफारिशों के अमल में तेजी दिखाने का समय है। इसमें एंट्री और एक्जिट प्लान सहित एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट व एक संस्थान से दूसरे संस्थान के बीच क्रेडिट ट्रांसफर जैसे पहलों को सख्ती से लागू करना है।
उच्च शिक्षा के सामने यह स्थिति तब निर्मित हुई है, जब दिसंबर 2025 में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक को संसद में पेश किया गया। इससे पहले यानी अप्रैल 2025 में खाली हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अध्यक्ष का पद अब तक खाली ही है। वहीं दिसंबर 2025 में खाली हुए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) के अध्यक्ष का पद भी खाली है। इतना ही नहीं, दोनों ही नियामकों में उपाध्यक्ष का भी इससे पहले से ही खाली पड़ा है।
