नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। Type 2 Diabetes: बड़ी उम्र में टाइप-2 डायबिटीज होने के शुरुआती लक्षण बचपन में ही दिख जाते हैं। हालिया शोध में यह बात सामने आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि डायबिटीज के लक्षण कई वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ते हैं और अक्सर प्रौढ़ अवस्था आते-आते लोगों को इसका पता चलता है। अध्ययन के दौरान 4,000 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था। आठ साल, 16 साल, 18 साल और 25 साल की उम्र में इन सभी के खून की जांच की गई। इस दौरान इनके जीन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, साथ ही खून में पाए जाने वाले कुछ सूक्ष्म अणुओं को जांचा गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि खून में आठ साल की उम्र से ही कुछ ऐसे संकेत मिलने लगते हैं, जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का कारण बनते हैं। 50 साल पहले ही दिख जाने वाले इन लक्षणों को पहचानकर बड़ी उम्र में डायबिटीज का शिकार होने से बचा जा सकता है।

 

डायबिटीज होने के लक्षण

डायबिटीज जिसे सामान्यत: मधुमेह कहा जाता है। डायबिटीज होने का प्रमुख कारण मीठे का अधिक सेवन होता है। बता दें कि डायबिटीज मेटाबॉलिस्म (चयापचय) संबंधी बीमारियों का एक समूह है। जिसमें लंबे समय तक हाई ब्लड सुगर का स्तर रहता है। हाई ब्लड सुगर के मरीजों के लक्षणों में अक्सर पेशाब आना होता है, प्यास की बढ़ोतरी होती है, और भूख में वृद्धि होती है। डायबिटीज एक गंभीर बीमारी है। तीव्र जटिलताओं में डायबिटीज या गंभीर स्थित में मरीज की मौत तक हो सकती है। डायबिटीज जब अधिक गंभीर हो जाती है तो इसके कई जटिल रुप दिखाई देते हैं। जिसके प्रमुख लक्षण हृदय रोग, स्ट्रोक, क्रोनिक किडनी की विफलता, पैर अल्सर और आंखों की रोशनी में भी नुकसान दिखाई देता है।

डायबिटीज के प्रकार

टाइप 1 डायबिटीज

टाइप 1 डायबिटीज बचपन में या किशोर अवस्‍था में अचानक इन्‍सुलिन के उत्‍पादन की कमी होने से होने वाली बीमारी है। इसमें इन्‍सुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा किसी एंटीबॉडीज की वजह से बीटा सेल्‍स के पूरी तरह काम करना बंद करने से होता है। ऐसे में शरीर में ग्‍लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इन्‍सुलिन के इंजेक्‍शन की जरूरत होती है। इसके मरीज काफी कम होते हैं।

टाइप 2 डायबिटीज

टाइप 2 डायबिटीज आमतौर पर 30 साल की उम्र के बाद धीरे-धीरे बढ़ने बाली बीमारी है। इससे प्रभावित ज्‍यादातर लोगों का वजन सामान्‍य से ज्‍यादा होता है या उन्‍हें पेट के मोटापे ककी समस्‍या होती है। यह कई बार आनुवांशिक होता है, तो कई मामलों खराब जीवनशैली से संबंधित होता है। इसमें इन्‍सुलिन कम मात्रा में बनता है या पेंक्रियाज सही से काम नहीं कर रहा होता है। डायबिटीज के 90 फीसदी मरीज इसी कैटेगिरी में आते हैं। एक्‍सरसाइज, बैलेंस्‍ड डाइट और दवाइयों से इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है।

डायबिटीज के रोगी क्या करें, क्या न करें

  • अब बात करेंगे कि डायबिटीज के रोगियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। डायबिटीज के रोगियों को एक डेली रूटीन बनाना बहुत ही जरूरी है।
  • सुबह जल्दी उठना चाहिए।
  • व्यायाम के लिए समय निकलना चाहिए।
  • सुस्त जीवनशैली के बजाए सक्रिय जीवन शैली अपनाना चाहिए।
  • साइक्लिंग, जिमिंग, स्विमिंग जो भी पसंद है उसे 30-40 मिनट तक ज़रूर करने की आदत डालें।
  • डायबिटीज एवं हार्ट की दवाएं कभी बंद नहीं होती हैं। इसलिए मरीज दवाएं कभी नहीं छोड़ें। इन दवाओं से किडनी और लिवर पर कोई असर नहीं पड़ता है।
  • चालीस की उम्र के बाद शुगर की जांच, लिपिड प्रोफाइल की जांच, किडनी फंक्शन टेस्ट, लिवर फंक्शन टेस्ट, टीएमटी जांच, रेटिना की जांच जरूर कराएं।

क्या खाएं

  • डायबिटीज में थोड़ा और आसानी से पचने वाला भोजन करना चाहिए।
  • डायबिटीज में हम सारे मौसमी और रस वाले फल खा सकते हैं। ड्राय फ्रूट्स की बात करें तो अखरोट, बादाम, चिया सीड्स, मूंगफली और अंजीर भी ले सकते हैं।
  • अपनी डाइट में गुनगुना पानी, छाछ, जौ का दलिया और मल्टीग्रेन आटा (मिलाजुला अनाज) शामिल करें।
  • डायबिटीज के रोगी को दिन में सोना, मल-मूत्र आदि वेगों को नहीं रोकना चाहिए। मांसाहार, शराब और सिगरेट आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • डायबिटीज रोगी को अधिक से अधिक पानी पीना चाहिए। ऐसे में वे नींबू पानी लेंगे तो यह उनकी सेहत के लिए और भी अच्छा होगा।

इन चीजों को न खाएं

डिब्बा बंद आहार,बासी खाना, फ़ास्ट फूड, जंक फूड, ज्यादा तेल-मसाले वाले भोजन नहीं खाना चाहिए। इन आयुर्वेदिक उपचारों का पालन करके आप हेल्दी रह सकते हैं।

डायबिटीज वाले ध्यान दें

डायबिटीज के साथ जिंदगी जी रहे लोगों को गर्मियों में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। गर्मियों में शरीर में पानी की कमी (डिहाइडे्रशन) होने से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है, जो डायबिटीज वालों के लिए समस्या पैदा कर देती है। इसलिए डायबिटीज वालों को कम-से-कम तीन लीटर पानी पीना चाहिए। ग्लूकोमीटर द्वारा नियमित रूप से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा की जांच करें। डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवाओं में बदलाव करना चाहिए।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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