नई दिल्ली, यशा माथुर। जब घूम रहे हों बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच, जब महसूस कर रहे हों हरी-भरी प्रकृति को नजदीक से, जब समंदर की लहरों पर डोलती नाव में खा रहे हों हिचकोले और जब निहार रहे हों दुनिया की उस विरासत को जिसके बारे में बचपन से सुना और पढ़ा हो तो जो अनुभूति होती है वह उत्साह और उल्लास से भरपूर होती है और अब यही हैं उत्सव के मायने। देश-विदेश की यात्रा दिल में उत्सव और उल्लास के भाव जगाती है। उत्सवों का सीजन शुरू होने को है, इस मौके पर यह जानते हैं कि कैसे अब यात्रा भी उत्सव का एहसास कराने लगी है...

इटली के केप्री आइलैंड में जहां तक नजर जा रही थी गहरा नीला समंदर था, लेकिन लहरें रेत को भिगो नहीं रही थीं, बल्कि पथरीली चट्टानों से टकरा रही थीं। मोटर बोट में बैठकर जब हम इन चट्टानों के पास गए, तो इनमें गहरी गुफाएं नजर आईं। बेशक इनमें पानी हिलोरे मार रहा था, लेकिन हमारी उत्सुकता बढ़ गई कि क्या होगा इनके अंदर? इसी समंदर के बीच दो बड़ी चट्टानें एक द्वार बनाती हैं। उसके बीच से जब मोटर बोट निकली तो हर किसी का उल्लास देखने लायक था। यही मुख्य आकर्षण है इस आइलैंड का। समंदर के उस दरवाजे के पीछे छूट जाने के बाद भी लगता रहा कि काश यह पल खत्म न हो। कुदरत की बनाई कलाकारी को हम और पास से निहारें।

कई सैलानियों ने अपनी नावें खड़ी करवा लीं और वे चारों तरफ से साफ समंदर, विशाल चट्टानों, इन पर बसे कैप्री शहर, दूर से दिखते पुराने यूरोपीय स्मारक और बोट से जंप लगाते शौकीन तैराकों को देख लेना चाहते थे। इन दृश्यों को दिल में अंकित कर लेना चाहते थे। जब इस तरह की यात्राओं से हम जुड़ जाते हैं, मन खुशी से भर जाता है और हर बार इस क्षण को जी लेने की इच्छा होती है, तो लगता है कि यात्रा एक उत्सव के माफिक ही तो है, जहां सिर्फ खुशी ही खुशी है।

भीड़ और जश्न का माहौल

त्योहारों में क्या होता है, हम सभी आपस में मिलते हैं, जश्न मनाते हैं, संस्कृति का सम्मान करते हैं। यात्राओं में भी पर्यटन स्थलों पर भीड़-भाड़ और जश्न मनाते लोग किसी उत्सव जैसा माहौल बना देते हैं। दुनिया के करीब 47 देशों और 800 शहरों की यात्रा करने वाले वरिष्ठ ट्रैवल ब्लॉगर और फोटोआर्टिस्ट अजय सूद के लिए भी हर यात्रा एक सेलिब्रेशन है। वे जब भी ट्रैवल के लिए निकलते हैं, तो उस स्थान को पूरा जी लेते हैं। अपने ब्लॉग 'ट्रैवल्योर' में यात्रा वृतांत लिखने वाले अजय कहते हैं कि 'चाहे मैं किसी पास वाले शहर या गांव में जाऊं या फिर किसी दूसरे देश में, मैं इसे उत्सव की तरह ही समझता हूं। लोगों का इकट्ठे होकर खुशी मनाना ही पर्व होता है।

न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वेयर आप कभी भी जाएं, वहां हर समय फेस्टिवल की तरह महसूस होता है। लोगों की भीड़ लगी होती है। अगर आप पेरिस में मोंटमार्टर जाएं, तो आपको त्योहार का ही माहौल मिलेगा। वीकऐंड्स में लोग अपने-अपने इंस्ट्रूमेंट्स ले आते हैं और कला का प्रदर्शन करते हैं। यह सब बड़े कलाकार नहीं, बल्कि शौकीन लोग होते हैं। यहां कलाकार दस मिनट में आपका पोट्रेट बना देते हैं। चेक रिपब्लिक में ओस्ट्रावा की सैर भी बहुत खुशी देती है।' अजय आजकल यूनेस्को के लिए 52 आर्टिकल्स की सीरीज लिख रहे हैं।

पहाड़ी नदी का संगीत

अगर यात्राओं के रंग जीवन में जुड़ जाएं, तो यह रंगीन होगा ही। जब तक हवाओं का संगीत न सुनें, जब तक लहरों के गीतों के साक्षी न बनें और जब तक पहाड़ की कुदरती खूबसूरती में घुल-मिल न जाए, तब तक घर से बाहर भी पर्व के एहसास को कैसे समझ पाएंगे? उत्‍तर सिक्किम में पहाड़ी नदी लाचुंग चू के पारदर्शी पानी के पत्थरों से टकराने का संगीत कानों को बहुत सुहाता है। इस बहती नदी के साथ फूलों की खूबसूरत यमथांग घाटी में लाल और गुलाबी रोडोडेंड्रोंस फूलों के पौधों की फूटती कोंपले जीवन में नया उत्साह जगाती हैं। 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस घाटी में सुहानी खिली धूप में चारों और बर्फ से ढकी पहाडिय़ां जब चांदी की तरह चमक रही होती हैं, तो इस दृश्य में खो जाने और उल्लास में डूब जाने का ही मन करता है। यही तो है एक त्योहार जैसी खुशी।

रामेश्वरम के रास्ते में देश के पहले सी ब्रिज यानी समुद्र पर बने पुल को देखना एक अनूठा अनुभव होता है। यह रेलवे ब्रिज रामेश्वरम को शेष भारत से जोड़ता है। 104 साल पुराने और करीब 2.3 किमी. लंबे इस कैंट लीवर ब्रिज को बड़े नेवी जहाज के आने पर खोला जाता है। राजस्थान में जयपुर के पास मौजूद बिशनगढ़ किले में रहना एक रोमांच है। करीब 230 साल का इतिहास समेटे इस किले को अब लग्जरी होटल में तब्दील कर दिया गया है, लेकिन किले में रहना और राजसी ठाठ का अनुभव करना भी तो एक सेलिब्रेशन है।

 

...ताकि फिर लौटना चाहें

अमेरिकी ट्रैवल राइटर और नॉवेलिस्ट पॉल थेरॉक्स का विचार है कि घूमना तभी आकर्षक बनता है, जब लौटकर उसके बारे में फिर से सोचा जाए। वैसे भी जिनकी सांसों में यात्रा बस गई है, उनके लिए यात्राएं तीज-त्योहार की तरह हैं। दुनिया के 16 देशों और अपने देश के 27 राज्य घूम चुकी अलका कौशिक ने हाल ही में अपनी यात्राओं की कहानी को अपनी किताब 'घुमक्कड़ी दिल से' में बयान किया है। यात्राएं उनकी जिंदगी में शामिल हो चुकी हैं।

अलका कहती हैं , 'मैं एक यात्रा करके घर आती हूं। अपनी चीजों को संभालती हूं और उन्हें फिर से बांध लेती हूं एक और यात्रा के लिए। यह चक्र कई सालों से जारी है। मैं रिपीट ट्रैवलर हूं। मैं एक जगह जाती हूं, तो कुछ जगह छोड़ कर आ जाती हूं। अपने दिल पर उनका निशान लगा लेती हूं कि इन जगहों पर मुझे फिर लौटना है। मैंने पिछले दिनों स्पेन का टूर किया, सत्तर दिन यूरोप में थी और सिर्फ पांच देश घूमी। मैं फिर से स्पेन गई, 22 दिन रही और उन्हीं जगहों पर घूमी। मुझे यात्राओं की गिनती नहीं करनी है और मेरी कोई बकेट लिस्ट भी नहीं है।' अलका बताती हैं कि यात्राओं के लिए मशहूर अमेरिकी ट्रैवलर एंथोनी बोर्डेन ने भी कहा था कि जब आप लौटें तो वहां कुछ ऐसा छोड़ कर आएं कि वापस लौटना चाहें।

धर्म-अध्यात्म का अनुभव

हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में धार्मिक पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। इनके लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च जाना एक खास पर्व के समान है। याद आती है अपनी यूरोप यात्रा जिसके टूर पैकेज में अधिकांश स्थान धार्मिक महत्व के थे। रोम में वेटिकन सिटी जाना, फ्लोरेंस के सांता मारिया डेल फियोर कैथेड्रल को देखना, वेनिस में मेडोन्ना डेल ओर्टो चर्च और सेंट जॉन एन्ड पाल चर्च में प्रार्थना करना विदेशी पर्यटकों का सपना होता है। अपनी यात्रा में धर्म, अध्यात्म और ध्यान का अनुभव करना भी तो पर्व में अर्चना करने के समान है।

अलका कौशिक ने अपनी कैलाश मानसरोवर यात्रा को एक ध्यानावस्था की तरह ही देखा। वे बताती हैं, 'इस यात्रा में मैंने पाया कि संकरे पहाड़ी रास्तों पर चलना एक अद्भुत तरीके की ध्यानावस्था है। इस तरह की यात्रा में आप सिर्फ अपने आपसे जुड़ते हैं। मैं दिन भर चलती तो मेरा पूरा ध्यान पंजों पर होता कि कहीं पैर डिग न जाएं, क्योंकि आधा, एक या डेढ़ फीट का संकरा मार्ग था। 15 हजार फीट की ऊंचाई पर चल रहे थे। नीचे दहाड़ती नदी बह रही है। चूंकि मानसून के दिनों में यह यात्रा होती है, तो आसमान भी बरसता है। पैर फिसला तो गए नदी में, उत्तराखंड में गिरेंगे, तो नेपाल में मिलेंगे। रास्ते में कोई बाजार नहीं है। आपके जेब मैं पड़ा लाख रुपया या दस रुपया बराबर है।

यहां लगता है कि ईश्वर की राह में सब बराबर हैं। पैदल चलना हमें जमीन से जोड़ता है। अहंकार से मुक्त करता है। इस एकांत में जब हमारे नीचे जमीन और ऊपर खुला आसमान होता है, तो अनंत ऊर्जा के साथ हमारा तालमेल बनता है।' ईश्वर से इसी साक्षात्कार को ही तो ढूंढ़ते हैं हम त्योहारों में।

अद्भुत होता है देवताओं का इकट्ठे होना

ट्रैवल ब्लॉगर अजय सूद का कहना है कि जब मैंने कुल्लू दशहरा पहली बार देखा तो यह लगा कि देश में सिर्फ यही दशहरा है, जो अलग कारण से मनाया जाता है। वैसे तो हम दशहरे को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाते हैं, लेकिन कुल्लू में दशहरे से पहले सौ से ज्यादा देवता इकट्ठा होते हैं। स्थानीय वाद्य बजाते हुए लोग इन्हें इनके मूल स्थान से कंधे पर उठा कर लाते हैं। यहां तक कि 100 किमी. तक भी पैदल चलते हैं। दशहरे के दिन उन्हें नदी के किनारे ले जाया जाता है। कहा जाता है कि जब महर्षि जमदग्नि कैलास पर्वत से वापस आ रहे थे, तो उनके सिर पर एक बड़ी टोकरी थी, जिसमें देवताओं की मूर्तियां थीं। तेज तूफान में सभी मूर्तियां कुल्लू घाटी की अलग-अलग जगहों में छिटक गईं। बाद में इनकी लोग पूजा करने लगे। यही देवता दशहरे के दिन मिलते हैं।

बार-बार जाना चाहूंगी कैलास मानसरोवर

ट्रैवल राइटर अलका कौशिक का कहना है कि अपने देश में हिमालय की शरण में जाना किसी उत्सव से कम नहीं है। 2014 में मैंने कैलास मानसरोवर की 22 दिन की यात्रा की थी, जिसमें हम केवल 4-5 दिन गाड़ी में रहे। बाकी दिन पैदल चले। यह बहुत ही कठिन यात्रा थी। उत्तराखंड से यह यात्रा शुरू हो जाती है और फिर करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर लिपुलेख दर्रा है, जिसे पार कर हम तिब्बत में उतर जाते हैं। तिब्बत में मानसरोवर का चक्कर लगाते हैं। फिर तीन दिन कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते हैं।

इस यात्रा से बढ़कर मुझे कोई यात्रा नहीं लगती। इतनी दुर्गम और कठिन यात्रा है यह कि लगता है कि हम वापस भी लौटेंगे या नहीं। इसके लिए तैयारी करनी होती है। फिटनेस चाहिए। तन, मन और धन तीनों की जरूरत है। मैं इस यात्रा को त्योहार की तरह सौ बार मनाना चाहूंगी। इसमें प्रकृति के ऐसे दर्शन होते हैं, जिन्हें शब्दों में बयान करना मुश्किल है। एडवेंचर और नेचर दोनों है इसमें। अध्यात्म का भी शिखर है। इस दौरान आप अपने आपसे बातें करते हैं। अपने ईश्वर से संवाद करते है और यही तो है पर्व का सार।

सेंट ऑगस्टीन का कहना है कि दुनिया एक किताब है और वे जो दुनिया नहीं घूमते, किताब के एक ही पन्ने पर अटके रह जाते हैं। 

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