संसद में टीएमसी को झटका: दो अहम संसदीय समितियों की गंवाई अध्यक्षता
संसद में हुए स्थायी समितियों के पुनर्गठन में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि पार्टी ने दो महत्वपूर्ण संसदीय समितियों की अध्यक्षता गंवा दी है।

संसद में टीएमसी को झटका। (पीटीआई)
HighLights
टीएमसी ने वाणिज्य मामलों की संसदीय समिति की अध्यक्षता खोई।
रसायन और उर्वरक संबंधी समिति पर भी टीएमसी का अधिकार समाप्त।
भाजपा और अन्य दलों के नेताओं ने अपनी अध्यक्षता बरकरार रखी।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संसद के गलियारों से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक बड़ी और मर्मस्पर्शी राजनीतिक खबर सामने आई है। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा विभिन्न विभागों से संबंधित संसदीय स्थायी समितियों के हालिया पुनर्गठन में टीएमसी को करारा झटका लगा है।
पार्टी ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण संसदीय समितियों की अध्यक्षता गंवा दी है, जिससे राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। ताजा बदलावों के तहत, वाणिज्य मामलों की संसदीय समिति की कमान अब टीएमसी सांसद डोला सेन की जगह भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधांशु त्रिवेदी को सौंप दी गई है।
कीर्ति आजाद की जगह काकोली घोष दस्तीदार को कमान
इसके अलावा, रसायन और उर्वरक संबंधी समिति पर भी टीएमसी का अधिकार समाप्त हो गया है, जहां पार्टी के बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने अपने पूर्व दल के सहयोगी कीर्ति आजाद का स्थान लिया है। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच यह बदलाव टीएमसी के लिए एक गहरे आघात की तरह है, जो संसद में उसकी घटती प्रशासनिक पकड़ को बयां करता है।
इन सांसदों की अध्यक्षता बरकरार
दूसरी ओर, इस पुनर्गठन में अन्य दलों के कई दिग्गजों को राहत मिली है। द्रमुक सांसद त्रिची शिवा और कनिमोरी को क्रमशः उद्योग तथा खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों की समितियों का प्रमुख दोबारा नियुक्त किया गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर (विदेश मामलों की समिति), चरनजीत सिंह चन्नी (कृषि समिति) और मुकुल वासनिक अपनी-अपनी समितियों के अध्यक्ष बने हुए हैं।
राजग के प्रमुख सहयोगियों भी दबदबा कायम
इसके अलावा, जदयू, शिवसेना (शिंदे गुट) और तेदेपा जैसे राजग के प्रमुख सहयोगियों के नेताओं का दबदबा भी समितियों में बरकरार रखा गया है।
संसद के इस नए समीकरण ने राजनीतिक गलियारों में यह अहसास करा दिया है कि सत्ता के गलियारों में संतुलन तेजी से बदल रहा है, जहां एक क्षेत्रीय दल के रूप में टीएमसी को अपनी साख बचाने के लिए अब नए सिरे से कूटनीतिक संघर्ष करना होगा।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
