अब्बास अहमद, भिंड। चंबल के बीहड़ अब बदल रहे हैं। यह बीहड़ अब ऐसी युवा पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं, जो बंदूक के शौक से पहले की तरह बीहड़ को बदनाम नहीं बल्कि देश को गौरवान्वित करेगी। जी हां! बीहड़ की बेटियां बंदूक के शौक को करियर का विकल्प बना रही हैं। इसके जरिए बेटियां उस मानसिकता को भी बदल रहीं हैं, जिसमें उन्हें बेटों से कमतर आंकते हैं। हाल में जिले की 21 बेटियों ने राइफल, पिस्टल शूटिंग में राज्य स्तर की प्रतिस्पर्धा में अपना लोहा मनवाया है।

निशानेबाजी से करियर पर निशाना लगा रही बेटियों का लक्ष्य देश के लिए गोल्ड जीतना है। कहती हैं, विश्व पटल पर चंबल के बीहड़ की एक नई तस्वीर पेश करना है..। भिंड, मप्र के उत्कृष्ट स्कूल क्रमांक-1 की 21 बेटियों ने आर्मी में नॉन कमीशंड अफसर रहे कोच भूपेंद्र कुशवाह से प्रेरित होकर पहली बार करीब एक साल पहले बंदूक थामी। कोच ने बेटियों को बंदूक के जरिए खेल करियर के बारे में बताया। साथ ही बेटियों को बताया कि शूटिंग में ओलंपिक पदक जीतकर वह चंबल की धरती और देश का नाम रोशन कर सकती हैं।

बीहड़ और बंदूक का पुराना रिश्ता

बीहड़ की इन बेटियों के संभावनाओं से भरे बेहतर खेल करियर के प्रति लालायित होने के पीछे एक अन्य कारण बीहड़ और बंदूक का पुराना रिश्ता भी रहा है। जिस बीहड़ में मुंह से निकलने वाली बोली की जगह बंदूक से निकलने वाली गोली को तवज्जो दी जाती रही, जहां बात-बात पर गोली चलती और जहां बंदूक मर्दाना शान का प्रतीक रही, वहां बेटियों का बंदूक से यह नया जुड़ाव पुरुषवादी समाज की रूढि़यों को तोड़ने का एक सशक्त प्रयास भी है।

राइफल और पिस्टल थाम अचूक निशाने का अभ्यास करतीं इन बेटियों में से एक ने हमसे कहा- बंदूक हमें हौसला देती है। इसे थामते ही मजबूती का अहसास होता है..। कोच भूपेंद्र कुशवाह कहते हैं कि राइफल शूटिंग में 14 से 19 वर्ष उम्र की बेटियां बढ़चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। वर्तमान में अंडर-14, अंडर-17 और अंडर-19 में 21 बेटियों ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपनी निशानेबाजी का लोहा मनवाया है।

बेटियों की वजह से बना पहला शूटिंग क्लब

उत्कृष्ट स्कूल क्रमांक-1 में भिंड जिले का पहला शूटिंग क्लब बना है। बेटियों के निशानेबाजी में बढ़ते लगाव के कारण ही इस क्लब का गठन किया गया। हालांकि इसमें बेटियों के साथ बेटे भी अभ्यास कर रहे हैं। राइफल शूटिंग के प्रति बेटियों में जुनून इतना है कि रविवार या दूसरी छुट्टी के दिन भी क्लब की एक्टिविटी जारी रहती है। यहां बेटियों को राइफल-पिस्टल थामकर लक्ष्य पर निशाना लगाते देख एकबार तो आंखें ठिठक जाती हैं, बीहड़ और बंदूक का पुराना रिश्ता मन में कौंध उठता है। लेकिन बेटियों के हाथों में यह बंदूक तो पदक पर निशाने के लिए है, यह बात सुखद अहसास से भर देती है।

क्या कहती हैं बेटियां

छात्रा प्रियांशी ने बताया कि पहली बार बंदूक थामकर एक अलग अहसास हुआ। राइफल शूटिंग का खेल आकर्षित करता है। यह हमें अंदर से आत्मविश्र्वास भी देता है। अच्छी पढ़ाई के साथ हम शूटिंग को करियर बनाएंगे। इससे हमारे जिले, प्रदेश और देश का नाम होगा।

छात्रा स्वाति राजावत ने बताया कि बंदूक शुरू से ही लुभाती रही है। हमें कोच ने प्रेरित किया तो पहली बार इसे करियर के लिए हाथों में उठाया। राज्य स्तरीय प्रतिस्पर्धा में पहुंचे तो अब उम्मीद जागी है कि इसके जरिए हम खेल में बेहतर करियर बना पाएंगे। यह रोमांचक भी है।

Posted By: Dhyanendra Singh

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