नई दिल्ली, माला दीक्षित। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बगावत से स्पष्ट हो गया है कि आपसी मतभेद सुलझाने का पारंपरिक इन हाउस प्रोसीजर नाकाफी है और इसके लिए किसी स्थायी कानूनी तंत्र की आवश्यकता है। सेवानिवृत न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि भविष्य में ऐसी किसी स्थिति से बचने के लिए ऐसा करना अब अनिवार्य हो गया है।

मौजूदा व्यवस्था में न्यायाधीशों की समस्याओं और शिकायतों के लिए कोई कानूनी या संवैधानिक तंत्र नहीं है। एक इन हाउस प्रोसीजर है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के प्रस्ताव में स्वीकार किया था। बाद में मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में भी उसे स्वीकार किया गया। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों यहां तक कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आयी शिकायत को सुलझाने का तंत्र दिया गया है। लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत को निपटाने की व्यवस्था नहीं है।

मौजूदा विवाद में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये हैं। ये चारों जज कोलिजियम के सदस्य भी हैं। ऐसी समस्या से निपटने के लिए तंत्र की जरूरत पर दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश एपी शाह कहते हैं कि संसद से कानून बना कर किसी बाहरी संस्था के दखल को शामिल करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। इसके लिए इन हाउस प्रोसीजर की तय आंतरिक व्यवस्था पर चीफ जस्टिस कान्फ्रेंस में विचार विमर्श होना चाहिए और कुछ संशोधन करके उसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आने वाली शिकायतों को निपटाने का कोई तंत्र शामिल किया जाना चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश एसआर सिंह का कहना है कि जब शिकायत मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ हो जैसा कि मौजूदा मामला है, तो उस पर फुल कोर्ट में विचार होना चाहिए और मतदान हो। जो बहुमत की राय हो वह मुख्य न्यायाधीश पर बाध्यकारी होनी चाहिए। लेकिन पटना हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश नागेन्द्र राय जस्टिस सिंह के मत से सहमति नहीं हैं। उनका कहना है कि फुल कोर्ट (सभी न्यायाधीश एक साथ बैठ कर विचार करें) में किसी मुद्दे का हल होना बहुत आसान नहीं होता। जजों की संख्या ज्यादा होती है। इतनी तरह के विचार और विरोध आते हैं कि उसमें हल निकलना मुश्किल होता है।

राय का कहना है कि कुछ पद ऐसे होते हैं जिनके बारे में ज्यादा नियम कानून नहीं बनाये जाते ये मान कर चला जाता है कि इस पद पर बैठने वाला संस्था की गरिमा और पद की अहमियत का ख्याल रखेगा और वो जो भी काम करेगा वो तर्कसंगत होगा। इसीलिए मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति के खिलाफ शिकायत का कोई तंत्र नहीं है सिर्फ महाभियोग के जरिए ही उन्हें पद से हटाए जाने की व्यवस्था रखी गई है। जबकि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के वकील ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि इन हाउस प्रोसीजर में भी जो फैसले लिये जाते हैं उन्हें मानने की आरोपी जज पर कानूनी बाध्यता नहीं है जैसे कि कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन ने कोलीजियम की इस्तीफा देने की राय को नकार दिया था और अंतत: बाद मे उन पर महाभियोग चला था। ऐसे में किस तरह का शिकायत तंत्र हो इस पर एक बहस की जरूरत है। पहले न्यायाधीशों की जवाबदेही का एक विधेयक आया था लेकिन इस पर और बहस की जरूरत है ताकि न्यायपालिका की स्वयत्तता बरकरार रहे।

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By Tilak Raj