सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। लुंज-पुंज शहरी निकाय, भ्रष्ट प्रशासन और कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के शहरों का बंटाधार हो गया है। स्मार्ट सिटी बनाने की पहली सूची में इन बड़े राज्यों का एक भी शहर न चुना जाना वहां के राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन के मुंह पर तमाचा है।

राजनीतिक रूप से खुद को सयाना बताने वाले और देश को चलाने की बात करने वाले इन प्रदेशों के नेतृत्व का विकास के मुद्दे पर रंग उतर गया है। शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू ने भी कहा, "इन राज्यों ने गंभीर पहल नहीं की है। यहां की सरकारों ने अपने शहरों के लिए कोई ठोस प्रस्ताव नहीं भेजा। इससे यहां के शहर मेरिट सूची में नीचे चले गए।" उन्होंने कहा कि वे इन राज्यों के विरोधी नहीं हैं। स्मार्ट सिटी का निर्णय एक स्वतंत्र कमेटी ने लिया है।

दरअसल, स्मार्ट सिटी के निर्माण में विदेशी निवेशकों को लुभाने की पुरजोर कोशिश की जाएगी। इसके लिए शहरों की क्रेडिट रेटिंग करानी अनिवार्य होगी, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के सभी शहर फेल हैं।

कहां से आएगा पैसा

स्मार्ट सिटी चुने जाने के लिए निर्धारित मानकों पर यहां के शहरी निकाय खरे नहीं उतर पा रहे हैं। स्मार्ट सिटी के लिए प्रस्तावित उत्तर प्रदेश के सभी 13 शहरों की वित्तीय स्थिति डांवाडोल है। सूत्रों के मुताबिक, उनके प्रस्तावों में स्मार्ट सिटी के लिए धन उपार्जन के ठोस उपाय नहीं सुझाए गए हैं। योजना का अभाव है, जिससे निवेशक इन राज्यों के शहरों को स्मार्ट बनाने को भला क्यों इच्छुक होंगे?

धन जुटाने का श्रोत सूखा

उत्तर प्रदेश और बिहार के ज्यादातर शहरों में आंतरिक स्त्रोतों से धन जुटाने की प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है। उपभोक्ताओं से शुल्क वसूलना यहां के शहरी निकायों में "गुनाह" है। इस मामले में यहां की सरकारें मनमानी करती रही हैं। राजनीतिक लोकप्रियता के लिए स्थानीय करों की माफी आम बात है। इसके चलते आंतरिक आय जुटाने के सभी संसाधन पंगु हो चुके हैं।

समय पर वेतन नहीं

उत्तर प्रदेश और बिहार के शहरी निकायों में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान समय पर नहीं होता है। बनारस, मुजफ्फरपुर, बिहार शरीफ, रामपुर, बरेली, गाजियाबाद, मुरादाबाद, रांची, झांसी, इलाहाबाद, अलीगढ़, कानपुर, भागलपुर और आगरा जैसे शहरों में वेतन बांटने के लिए भी यदा कदा राज्य सरकार के आगे हाथ पसारने पड़ते हैं।

बेहिसाब बदइंतजामी

  • उत्तर प्रदेश और बिहार में उपभोक्ताओं व निकाय प्रशासन के बीच तालमेल का सर्वथा अभाव है।
  • नागरिकों से सीधे संवाद की व्यवस्था इन तीन राज्यों में शायद ही कहीं है।
  • इन राज्यों के शहरी निकायों में आन लाइन शिकायत निवारण की व्यवस्था अभी दूर की कौड़ी है।
  • इन राज्यों के ज्यादातर शहरी निकायों में मौजूदा सेवाओं का हाल भी बेहाल है।
  • जलापूर्ति, स्वच्छता, परिवहन, सीवेज, जल निकासी और अन्य मामलों में भी ज्यादातर शहर फिसड्डी निकले हैं।
  • जन सहभागिता प्राप्त करने में ज्यादातर शहर बहुत पीछे हैं।
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Posted By: Sachin Mishra