कपिल शर्मा। बालीवुड शब्द पिछली सदी के आठवें दशक में व्यावसायिक मसाला फिल्मों के बनने के बाद से प्रचलित हुआ था। उसके पहले बनने वाली हिंदी फिल्मों के लिए बालीवुड शब्द प्रचलित नहीं था। ऐसे में सवाल है कि आखिर बालीवुड में जब हिंदी फिल्में बनती हैं तो क्यों न इसका नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कर दिया जाए। यह सवाल तब और भी गंभीर हो जाता है जब यह पता चलता है कि हिंदी में बनने वाली फिल्मों के लिए प्रयोग की जाने वाली स्क्रिप्ट रोमन लिपि में लिखी जाती है।

देवनागरी में लिखी गई स्क्रिप्ट को पढ़ने से कई एक्टर मना कर देते हैं। कई निर्देशक तो समझ ही नहीं पाते हैं कि हिंदी में क्या लिखा गया है। विंडबना यह है कि हिंदी में बोले गए उन्हीं संवादों से वे करोड़ों दर्शकों के मन में अपनी जगह बनाते हैं, आर्थिक एवं कलात्मक सफलता पाते हैं। यह बिल्कुल उसी तरह का व्यवहार है कि हिंदी बोलकर खाया, कमाया जा सकता है, लेकिन हिंदी को प्रतिष्ठा के साथ अपनाया नहीं जा सकता। पिछले दिनों अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक कार्यक्रम में इसी मुद्दे को लेकर सवाल उठाया था। इस प्रकार उन्होंने बालीवुड की मूल समस्या से लोगों को अवगत कराया है।

दरअसल बालीवुड की समस्या यह है कि वह अपनी मूल पहचान को भूल गया है। वह हालीवुड को कापी करने के चक्कर में अपनी मौलिकता का नाश कर बैठा है। यही कारण है कि इन दिनों हिंदी में हमें बेहतरीन फिल्में देखने को नहीं मिल पा रही हैं। साथ ही बालीवुड स्वयं को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कहलाए जाने पर सहज नहीं महसूस कर पा रहा है। हर समाज की अपनी एक भाषा होती है, एक जीवनशैली, संस्कृति और सभ्यता होती है। इसी के ईद-गर्द कहानियां पैदा होती हैं। इन्हीं कहानियों पर फिल्में बनती हैं, लेकिन समस्या तब हो जाती है जब आप अपनी मूल पहचान को स्वीकार नहीं करना चाहते। तब आप दूसरे को अपने से बेहतर मानकर उसकी नकल करने लगते है। बालीवुड की मौजूदा हालत यही है।

वह हालीवुड को कापी कर रहा है, लेकिन तकनीक और कहानियों के मामलों में वैसी श्रेष्ठता का प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है। उससे प्रेरित कहानियां भारतीय जनमानस को छू नहीं पाती हैं। उनमें एक नकलीपन आ जाता है, जो दर्शक को कहानी से जुड़ने नहीं देता। इसलिए हिंदी पट्टी का जनमानस उससे बहुत ज्यादा जुड़ नहीं पाता है। वहीं दक्षिण भारतीय, बंगाली एवं मराठी फिल्मों ने अपनी इस मौलिकता को बरकरार रखा है। दक्षिण भारतीय फिल्मों की कहानियों का कथानक एवं पटकथा भारतीय जनमानस, समाज और संस्कृति से ज्यादा जुड़ी होती है। यही कारण है कि उत्तर भारतीय भी दक्षिण भारतीय फिल्मों को देखने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। भले ही फिल्म डबिंग में क्यों न देखनी पड़ जाए। बाहुबली के दोनों पार्ट, आरआरआर, पुष्पा, दृश्यम-2, केजीएफ के दोनों पार्ट की सफलता इसका उदाहरण है।

दो दशक पहले ऐसा नहीं था, लेकिन हाल के कुछ वर्षो में बालीवुड की पकड़ जनमानस में कमजोर हुई है तो इसका एक कारण यह भी है कि उसमें जिन फिल्मी घरानों की मौजूदा पीढ़ियां आज स्टार फिल्म निर्माता या निर्देशक के रूप में जमी हुई हैं, वे भारतीय समाज की भाषाई एवं सांस्कृतिक मौलिकता को अपनाने में सहज नहीं हैं। वे पश्चिमी मूल्यों से भरे हुए और अंग्रेजी में पढ़े-लिखे ऐसे पीढ़ीगत संपन्न फिल्मी परिवारों से हैं, जो हिंदी और उसकी क्षेत्रीय बोलियों को बोलने वाले करोड़ों दर्शकों के लिए फिल्मी कंटेट को तैयार कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर वे स्वयं ही अपनी पहचान को लेकर सहज नहीं हैं। लिहाजा वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आम हंिदूी पट्टी की कहानी को किस तरह से प्रस्तुत किया जाए।

हिंदी पट्टी की मौलिक कहानियों को समझने और उन्हें प्रस्तुत करने के लिए जो वास्तविक अनुभव और गहन अध्ययन चाहिए, उसका न होना भी इसका एक बड़ा कारण है। इस बात के कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर देखने में यही प्रतीत होता है। कलाकार जब आम लोगों की जिंदगी से कटा हुआ होता है तो वह उनकी जिंदगी को कैसे परदे पर दिखा पाएगा। कई बार ऐसी बातें भी सामने आती हैं कि कुछ बड़े स्टार स्क्रिप्ट में अपने रोल को अपनी सहूलियत के हिसाब से ढालते हैं, न कि अपने आपको स्क्रिप्ट के हिसाब से। ऐसे में स्क्रिप्ट कमजोर हो जाती है और उसमें रोल निभाने वाला स्टार हावी हो जाता है।

एक कारण यह भी है कि बालीवुड तमिल, मलयालम, मराठी, बंगाली एवं तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री को ज्यादा अहमियत नहीं देता है। इसकी वजह से बालीवुड एक अति-आत्मविश्वास का शिकार हो गया है। यह अति-आत्मविश्वास कई बार खतरनाक साबित होता है। ऐसा झटका देता है कि आदमी को फिर से अपनी वास्तविकता से सामना होता है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि बालीवुड अपनी वास्तविकता को स्वीकार करते हुए अपनी मौलिकता को सम्मान देना सीखेगा। फिर नई बेहतरीन कहानियों के साथ दर्शकों से जुड़ पाएगा।

[शार्ट फिल्ममेकर एवं गीतकार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal