नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। भारत विविधताओं का देश है, इसलिए कहा जाता है ‘कोश-कोश पर बदले पानी, चार कोश पर वाणी’। वक्त जब लोकसभा महासमर का हो तो वाणी ही नहीं, वेश-भूषा और खान-पान भी राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के लिए बहुत महत्व रखता है। नेता जिस इलाके में चुनाव प्रचार करने जाते हैं, प्रयास होता है कि वह उसी रंग में दिखाई दें। ऐसे में नेताओं के लिए आईटी इंजीनियरों के एक गांव में प्रचार-प्रसार करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। दरअसल, ये दुनिया का इकलौता संस्कृत भाषी गांव है।

यहां हम बात कर रहे हैं, कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरू से तकरीबन 300 किमी दूर मौजूद मत्तूर गांव की। यहां के लोग दैनिक जीवन से लेकर आम बोलचाल में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग करते हैं। मतलब संस्कृत इस गांव के लोगों के लिए रोजमर्रा की जुबान है। फिर चाहे वह बच्चा हो, बड़ा हो या बुजुर्ग या फिर अमीर अथवा गरीब। इस गांव में संस्कृत भाषा ने जाति-धर्म समेत सभी बैरियार तोड़ दिए हैं। यही वजह है कि यहां के हिंदु और मुस्लिम सभी संस्कृत बोलते हैं।

सुषमा स्वराज ने संस्कृत में दिया था भाषण
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के एक पुराने ट्वीट से पता चलता है कि एक बार उन्होंने यहां एक जनसभा की थी। इस जनसभा में उन्होंने संस्कृत भाषा में पूरा भाषण दिया था। सुषमा स्वराज ने इस बारे में ट्वीट कर खुशी भी व्यक्त की थी। उन्होंने ऐसा, यहां के लोगों का संस्कृत भाषा के प्रति सम्मान और लगाव देखकर किया था। जाहिर है, यहां के लोगों का संस्कृत के प्रति लगाव देखकर चुनावी सीजन में बहुत से नेता यहां संस्कृत में चुनाव प्रचार करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, सबके लिए संस्कृत भाषा में प्रचार करने या यहां के लोगों से बात करना संभव नहीं है।

ऐसे हुई संस्कृत भाषी गांव की शुरूआत
कर्नाटक के मत्तूर गांव के संस्कृत भाषी बनने की शुरूआत तकरीबन 36 वर्ष पहले हुई थी। वर्ष 1981-82 तक इस गांव में कन्नड़ भाषा ही बोली जाती थी, जो यहां के राज्य की सरकारी भाषा है। तब यहां पर कुछ लोग तमिल भाषा भी बोलते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार इस गांव को संस्कृत भाषी बनाने की शुरूआत, इस भाषा के खिलाफ शुरू हुए अभियान के साथ ही हुई है। दरअसल, कुछ लोग संस्कृत को ब्राह्मणों की भाषा बताकर उसकी आलोचना और खिलाफत करने लगे थे। यही वजह है कि अचानक संस्कृत की जगह कन्नड़ को दे दी गई। यहीं से संस्कृत भाषा को बचाने का अभियान शुरू हुआ, जो यहां के लोगों के लिए अपनी जड़ों को बचाए रखने जैसा है।

इन्होंने की थी शुरूआत
संस्कृत भाषा की कम होती लोकप्रियता और इसके विरोध को देखते हुए पेजावर मठ के स्वामी ने सबसे पहले मत्तूर को संस्कृत भाषी गांव बनाने का आव्हान किया था। इसके बाद गांव के लोगों ने संस्कृत भाषा में ही बात करने का निर्णय लिया और इसके खिलाफ चल रहे नकारात्मक प्रचार को सकारात्मक रुख दे दिया। स्थानीय लोग बताता हैं कि पेजावर मठ के स्वामी की अपील पर गांव के लोगों ने 10 दिन तक दो घंटे संस्कृत भाषा का अभ्यास किया। इसके बाद पूरा गांव संस्कृत में बातचीत करने लगा। अब संस्कृत यहां की आम बोलचाल की भाषा हो चुकी है। यहां के बच्चे भी संस्कृत में ही बात करते हैं। इसके अलावा ये लोग स्थानीय बोली संकेथी का भी इस्तेमाल करते हैं।

संस्कृत पहली भाषा है
3500 की जनसंख्या वाले इस गांव के छात्र भी संस्कृत को पहली भाषा के तौर पर चुनते हैं। मालूम हो कि कर्नाटक के स्कूलों में त्रिभाषा सूत्र के तहत तीन भाषाएं चुनने का विकल्प दिया जाता है। ऐसे में छात्र पहली भाषा के तौर पर संस्कृत का ही चुनाव करते हैं। दूसरी भाषा के तौर पर ज्यादातर छात्र अंग्रेजी और तीसरी भाषा के तौर पर कन्नड़, तमिल या किसी अन्य स्थानीय भाषा को तरजीह देते हैं।

यहां हर घर में है इंजीनियर
संस्कृत भाषी गांव सुनकर बहुत से लोग इस इलाके के पिछड़े हुए या रूढ़ीवादी अथवा पुरातन विचारधारा का होने का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहां के लोग जितनी अच्छी संस्कृत बोलते हैं, उतनी ही अच्छी अंग्रेजी या अन्य स्थानीय भाषाएं भी जानते हैं। यहां के एक नागरिक इमरान के अनुसार, संस्कृत आने के बाद कन्नड़ या अन्य स्थानीय भाषाओं को समझने में मदद मिलती है। साथ ही अंग्रेजी और विज्ञान जैसे विषयों को समझने में भी मदद मिलती है। यही वजह है कि यहां के लगभग हर घर में कोई न कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर या मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर चुका है। इन लोगों का कहना है कि संस्कृत भाषा इनके लिए किसी भी मोर्चे पर बाधक नहीं बनी।

संस्कृत सीखने के फायदे
यहां के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर शशांक बताते है कि उन्होंने वैदिक गणित पढ़ी है। इससे उन्हें काफी मदद मिली है। उनके साथ के लोग कैलकुलेटर का प्रयोग करते हैं, जबकि उन्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ती है। प्रोफेसर श्रीनिधि बताते हैं कि हमें संस्कृत बोलने की जरूरत है। संस्कृत सीखने से हमें न केवल भारतीय भाषाओं को समझने में मदद मिलती है, बल्कि जर्मन और फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं को भी सीखने में मदद मिलती है। यहां के बहुत से लोग नौकरी-पेशे की वजह से विदेशों में रह रहे हैं, लेकिन जब भी कभी वह अपने गांव लौटते हैं बड़े गर्व से संस्कृत भाषा में आपस में बात करते हैं।

संविधान में 22 भाषाओं को मिली है मान्यता
भारत के अलग-अलग हिस्सों में तकरीबन 1600 बोलियां या भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से 22 भाषाओं को संविधान में मान्यता मिली हुई है। वर्ष 2003 में चार नई भाषाओं को संविधान संशोधन कर मान्यता दी गई। इससे पहले संविधान में केवल 18 भाषाओं को ही मान्यता प्राप्त थी। जिन्हें संविधान में जगह नहीं मिला है, उन्हें बोली कहा जाता है। 2011 की जनणना में देश में लगभग 122 भाषाएं दर्ज की गईं थीं। संविधान में जिन 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, उसमें हिन्दी, अंग्रेजी, असमी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओड़िया, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलगु और उर्दू शामिल है।

संस्कार भारती देती है संस्कृत का प्रशिक्षण
कर्नाटक के मत्तूर गांव को संस्कृत भाषी बनाने में संस्कार भारती नाम की संस्था का भी अहम योगदान है। संस्कार भारती एक शैक्षणिक संस्था है जो पांच हजार से ज्यादा लोगों को संस्कृत बोलना, लिखना और पढ़ाना सिखाती है। संस्कार भारती ने पूर्व में मीडिया में दिए बयानों में कहा था कि वह यह काम विश्व की प्राचीनतम भाषा को बचाने और उसे सम्मान देने के लिए कर रही है। एक स्थानीय निवासी के अनुसार गांव के बच्चे आठ वर्ष की आयु से ही वेदों का अध्ययन शुरू कर देते हैं।

दूर-दूर से लोग आते हैं इस गांव
कर्नाटक का मत्तूर गांव देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। यही वजह है कि हिस्ट्री चैनल समेत कई अन्य संस्थान इस गांव पर डॉक्यूमेंट्री बना चुके हैं। बताया जाता है कि इस गांव में होटल वगैरह नहीं है, फिर भी देश-दुनिया से लोग इस गांव को देखने आते हैं। काफी संख्या में बाहर के राज्यों व देशों से लोग यहां संस्कृत सीखने भी आते रहते हैं।

संस्कृत ही नहीं सहेज रहे संस्कृति भी
मत्तूर गांव के लोग केवल संस्कृत ही नहीं बल्कि देश की संस्कृति और परंपराओं को भी सहेजने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इस गांव में घुसते ही आपको इसका अंदाजा लग जाएगा। यहां के लोगों की वेशभूषा से लेकर उनके खान-पान और उनकी जीवनशैली भी पारंपरिक है। बताया जाता है कि इस गांव में कभी भूमि विवाद नहीं हुआ। यहां हर धर्म के लोग आपस में बहुत मिल-जुलकर रहते हैं। यहां के स्कूलों में आम तौर पर देवी सरस्वती और विवेकानंद की मूर्ति देखने को मिलती है, जो छात्रों को प्रेरित करती है।

Posted By: Amit Singh

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