नई दिल्ली। कोरोना से मृत्यु दर सवाल खड़े होने लगे हैं। भारत में यह 2 फीसद के आसपास है। अलग-अलग देश अपने-अपने तरीके से कोरोना मृत्यु दर को परिभाषित कर रहे हैं। अगर ब्रिटेन का उदाहरण लें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ब्रिटेन की मृत्यु दर 5 फीसद है जबकि वैश्विक स्तर पर मृत्यु दर 4 फीसद ही है। लेकिन ब्रिटेन का दावा है कि उनके यहां की मृत्यु दर 0.5 से एक फीसद तक ही है।

दरअसल, कोरोना के परीक्षण का पैमाना भी देशवार भिन्न है। बीबीसी के अनुसार कोई अधिक संख्या में मरीजों का परीक्षण कर रहा है तो कोई सीमित। ऐसे में मृत्यु दर का सटीक आकलन भी प्रभावित होता है। इतना ही नहीं मृत्यु दर उम्र और सामान्य स्वास्थ्य जैसे कारकों पर भी निर्भर करती है।

खतरे में कौन ज्यादा, कौन कम : वे बुजुर्ग जो अस्वस्थ हैं और कोरोना पॉजीटिव तो उनके लिए खतरा ज्यादा है। इंपीरियल कॉलेज लंदन के हालिया अध्ययन के मुताबिक जिनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है उनमें मृत्यु दर की आशंका 10 गुना बढ़ जाती है जबकि 40 से कम उम्र वालों में बहुत कम। हालांकि ब्रिटेन के मुख्य स्वास्थ्य सलाहकार प्रो. क्रिस व्हिटी कहते हैं कि भले ही बुजुर्गों की मृत्यु दर ज्यादा है, इसका मतलब यह नहीं कि युवाओं के लिए यह वायरस निस्तेज है। इसलिए यह नहीं कह सकते कि केवल उम्र ही संक्रमण के जोखिम को निर्धारित करता है। चीन के 44 हजार केसों के अध्ययन के बाद पता चलता है कि जिन कोरोनाग्रस्त को मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी या सांस रोग था, उनमें मृत्यु की आशंका पांच गुना ज्यादा थीं। यह सारी तस्वीरें हमें यह तो दर्शाती हैं कि खतरे में कौन ज्यादा है लेकिन ये नहीं बतातीं कि अमूक वर्ग, समूह सबसे ज्यादा खतरे में है।

पुष्ट मामलों में मृत्यु दर समग्र मृत्यु दर नहीं : वायरस संक्रमण के अधिकांश मामले कहीं गिने ही नहीं जाते क्योंकि हल्के-फुल्के संक्रमण में लोग डॉक्टर के पास ही नहीं जाते। ब्रिटेन के मुख्य विज्ञानी सलाहकार सर पैट्रिक वैलेंस ने 17 मार्च को एक अनुमान लगाया कि वहां लगभग 55 हजार केस है, लेकिन उसी दिन पुष्ट मामलों की संख्या केवल 2000 थी। जाहिर है पुष्ट मामलों पर आधारित मृत्यु दर काफी अधिक होगी। ऐसे में मृत्यु दर का सटीक आकलन करना बेहद चुनौतीपूर्ण है।

अलग-अलग देशों में मृत्यु दर भिन्न क्यों : इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक शोध के मुताबिक किसी देश में संक्रमित मरीजों की पहचान, जांच का तरीका काफी अच्छा है तो किसी का बहुत बुरा। जांच के नियम, जांच की संख्या भी अलग है। ऐसे में सभी की तस्वीर अलग है। दक्षिण कोरिया ने अधिकाधिक जांच की तो वहां मृत्यु 1 से भी कम आंकी गईं। यहां कई ऐसे मामले थे जिनमें संक्रमण हल्का-फुल्का था। इनकी जांच दूसरे देश करते तक नहीं। विकासशील व कई अन्य देश लक्षण पाए जाने पर ही जांच कर रहे हैं। उनके पास संसाधन कम हैं, लिहाजा वहां हल्के-फुल्के संक्रमित मरीजों की पहचान ही नहीं हो पाती।

वैज्ञानिक ऐसे करते हैं मृत्यु दर का निर्धारण : मृत्यु दर की साफ तस्वीर देने के लिए वैज्ञानिक उपरोक्त सभी पहलुओं पर मिले साक्ष्यों को जोड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर कह सकते हैं कि हल्केफुल्के संक्रमण वाले लोगों के ग्रुप पर भी कड़ी निगरानी रखी जाती है। इससे जो तथ्य मिलते हैं, वह निष्कर्ष में शामिल हाते हैं। ईस्ट एंजिला विवि के मेडिसीन के प्रोफेसर पॉल हंटर का कहना है कि ऐसा करने से मृत्यु दर कम हो जाती है, बढ़ भी जाती है। इस तरह वैज्ञानिक एक अधिकतम और न्यूनतम आंकड़ा देते हैं साथ ही वर्तमान का बेहतर अनुमान।

संसाधन समर्थ बनाम असमर्थ : वर्तमान में रोजाना 10 हजार लोगों की जांच करने वाला ब्रिटेन अब 25 हजार जांचें रोज करने की योजना बना रहा है जबकि जर्मनी रोजाना 20 हजार जांचे करता है। यही वजह है कि यूरोपीय देशों में जर्मनी में सबसे कम 0.5 फीसद मृत्यु दर है। इसके साथ ही मृत्यु उपलब्ध संसाधन और महामारी के स्तर पर भी निर्भर करती है। अगर किसी देश में महामारी फैलती है, एकाएक मरीजों की संख्या बढ़ती है और सीमित स्वास्थ्य संसाधन होने की वजह से अपेक्षित संख्या में लोगों को आइसीयू और वेंटिलेटर व्यवस्था नहीं मिल पाती है तो उनकी मृत्यु दर बढ़ जाती है।

स्रोत : बीबीसी

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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