सोनवर्षा (भागलपुर) [संजय सिंह]।  जश्न-ए-आजादी के गीतों के साथ आसमान में शान से लहराते तिरंगे की दास्तान में त्याग का एक नाम सुदामा देवी का भी है, जिन्होंने इसी दिन के लिए अपना गहना-जेवर तक बेच दिया। मांग का सिंदूर भी धुल गया, पर वह पीड़ा सीने में ही दफन रही। तब के रिवाज के मुताबिक, वे भी बहुत कम उम्र में ही दुल्हन बनकर भागलपुर के बिहपुर थाना क्षेत्र के सोनवर्षा स्थित अपनी ससुराल पहुंच गईं, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके पति लड्डू कंवर तो आजादी की दुल्हन को घर लाने सब कुछ दांव पर लगा चुके हैं। ...और इसी दीवानगी ने घर आई दुल्हन सुदामा देवी का सब कुछ छीन लिया।

बूढ़ी आंखों में अतीत का दर्द

करीब 85 वर्ष की हो चुकीं सुदामा देवी को आज भी सन 1942 याद है, जब उन्हें पति की शहादत का संदेश मिला। बूढ़ी आंखों से छलकता अतीत। वे बताने लगती हैं- जब देखि लेलियै कि हुनकरो यही मन छै तो हमहुं संग हो लियै...(जब मैंने जान लिया कि उनकी यही इच्छा है तो हम भी साथ हो गए...।) साल-दो साल ही तो हुए थे शादी के। तब समझ भी कहां थी?

पति ने छिपा रखी थी अपनी पहचान

वे बताती हैं, शादी के पहले इस बात की भनक तक नहीं थी कि उनके वाले पति लड्डू कंवर क्या करते हैं। यह सब शादी के बाद पता चला, जब देर रात कुछ लोगों को घर के दरवाजे पर देखा। वे तरह-तरह की बातें करते थे। इस संबंध में जब उनसे पूछती तो वे बातों को टाल जाते। कुछ दिनों बाद भनक लगी कि उनके पति अंग्रेजों के विरुद्ध कुछ योजना बन रहे हैं। सरदार सिंह, द्वारिका कंवर, फौजी यादव, अर्जुन सिंह वगैरह उनके यहां आते रहते थे।

गहना-जेवर सब कुछ सौंप दिया

धीरे-धीरे उन्हें सब पता चल गया। जब उनकी यही इच्छा थी तो वे भी साथ हो लीं। वे बताती हैं, आर्थिक स्थिति खराब थी। वे लोग भोजन और हथियार के लिए इधर-उधर से पैसे जुटाते थे। उन्होंने दहेज में मायके से मिला अपने गहना-जेवर और चांदी के सिक्के उन्हें सौंप दिए। सिर्फ मंगलसूत्र बच गया था।

जब मिली शहादत की सूचना

1942 में लड्डू कंवर ने अपने साथियों के साथ रात में सोनवर्षा पुलिस शिविर पर हमला कर दिया। अंग्रेज सिपाही क्रांतिकारियों का रुख देख नाव से भाग रहे थे। इस दौरान 17 सिपाहियों की मौत हो गई। क्रांतिकारियों ने उनका हथियार लूट लिया। इसी दौरान एक सिपाही की गोली से उनके पति शहीद हो गए। उन्हें इसकी सूचना मिली, सब कुछ उजड़ गया था।

चोरी-छिपे किया अंतिम संस्कार

अंग्रेजों का खौफ इतना था कि परिजनों ने भी पति के शव को पहचानने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों के सिपाही शव लेकर चले गए। इसके बाद उन्होंने अपने मायके बेनीपट्टी (मधुबनी) के पालीगांव में जाकर चोरी-छिपे कुश का पुतला बनाकर अंतिम संस्कार किया। यह बताते-बताते सुदामा देवी की आंखों से आंसू बहने लगे। पति की कोई तस्वीर तक नहीं। सुदामा देवी को अपनी कोई संतान नहीं है। आज भी पेंशन का पैसा गरीबों में खर्च कर देती हैं। उनकी सगी बहन के पुत्र रामानंद कुंवर और पोता बमबम उनकी देखभाल करते हैं।

आजादी के दीवानों का गांव

भागलपुर जिला स्थित सोनवर्षा गांव गंगा तट पर है। यहां आजादी के कई दीवाने हुए। 1921 में अंग्रेजों ने जबरन यहां के किसानों पर टैक्स लगा दिया। विरोध के स्वर तेज हुए तो उसे कुचलने को रांची से गोरखा फोर्स को बुलाया गया था। किसानों के साथ हुए संघर्ष में आठ गोरखा जवान मारे गए थे। इसका उल्लेख केंद्र सरकार के गृह विभाग के पॉलिटिकल फाइल नंबर 252 में दर्ज है। फिर यहां के किसानों का दूसरा विद्रोह 1942 में हुआ। इसमें 17 सिपाही मारे गए। इसी लड़ाई में इस गांव के लड्डू कंवर शहीद हुए थे।

 

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