देश क्षेत्रवाद और जातिवाद के कारण खड़ी होने वाली दर्जनों समस्याओं से जूझ रहा है, जबकि हमारे राजनीति दल व नेता इसे बढ़ावा देने पर ही आमादा रहते हैं। तमाम खामियों और बुरे परिणामों के बावजूद क्षेत्रवाद व जातिवाद की राजनीति के जरिये देश के कई राष्ट्रीय तथा राज्यस्तरीय दल फल-फूल रहे हैं। इन दोनों हथियारों को इस्तेमाल कर सत्ता पर काबिज होने की होड़ के चलते देश में सैकड़ों छोटे-बड़े राजनीतिक दल उभरे। जातीय और क्षेत्रीय आधार पर राजनीति करने वाले दलों को फायदा भी मिला। हालांकि, क्षेत्रवाद और जातिवाद देश की एकता, अखंडता के लिए खतरा होने के साथ ही राष्ट्रनिर्माण और विकास में बाधाएं भी डाल रहा है। क्षेत्रवाद व जातिवाद से जुड़े ऐसे ही पहलुओं और चुनौतियों पर नजर डाल रहा है जनजागरण..

बहुआयामी होता है क्षेत्र

क्षेत्र एक भौगोलिक शब्द है। भौगोलिक परिदृश्य में क्षेत्र स्थिर रहता है, लेकिन जैसे ही इसे सामाजिक और राजनीतिक परदिृश्य में देखा जाता है, तो इसकी कई दिशाएं व सिरे नजर आने लगते हैं, जो काफी गतिमान होते हैं। इसी क्षेत्र को जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहलू से समझा जाता है, तो इसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व भूगर्भ तथ्य शामिल हो जाते हैं। क्षेत्र में ऐसे ही कई तथ्य और पहलू शामिल रहते हैं, जो मिलकर इसे एक इकाई बनाने के साथ ही जीवन भी देते हैं। क्षेत्र एक देश की प्रशासकीय इकाई हो सकता है या राष्ट्रों के समूह का भू-रणनीतिक संयोजन हो सकता है, जिसमें राजनीतिक-आर्थिक या सैन्य हित शामिल रहते हैं। इसी तरह क्षेत्र ऐतिहासिक, भाषाई, सांस्कृतिक, सामाजिक और ढांचागत आधार पर विषमता भी प्रदर्शित करता है।

क्षेत्र और क्षेत्रवाद

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 28 सितंबर, 1961 को राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में संप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद जैसे दानवों के प्रति सभी को चेताया था। ठीक 45 साल बाद पहली सितंबर, 2005 को राष्ट्रीय एकीकरण परिषद [एनआइसी] के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि बहुलतावादी समाज और राजनीतिक परिदृश्य में हमारे पास क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय पहचान के लिए पर्याप्त जगह है। ये पहचान हमारे राष्ट्र के व्यापक विचार की विरोधी नहीं है। हमें इन क्षेत्रीय पहचानों के फलने-फूलने को सकारात्मक रूप से देखना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ये स्थानीय पहचानें हमारे विभिन्नता भरे राष्ट्र में सहिष्णुता के साथ शामिल हों। आजादी के 14 साल बाद नेहरू को एनआइसी की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद चार दशक दशक तक इसका दुरुपयोग होता रहा। इसके बाद जब एनआइसी को पुनर्जीवित किया गया तो मनमोहन सिंह ने एकरूपता के बजाय अनुरूपता पर जोर दिया।

राष्ट्रनिर्माण में बाधक जातिवाद

जातिवाद राष्ट्रनिर्माण और एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा है। जाति प्राचीन कालीन प्रणाली है, जिसका परंपरागत तौर पर अनुसरण किया जा रहा है। लिहाजा, लोगों को नए विचार और वैज्ञानिक सिद्धांतों को स्वीकार करने में परेशानी होती है। जातिवाद राष्ट्रवाद के विकास और वृद्धि का रोड़ा है। इसी जातिवाद के कारण देश कई समूहों और उप-समूहों में बंट चुका है। यही नहीं, जातियों में भी उप-जातियां हैं। इस वजह से कई बार अंतर-जातीय और जाति के भीतर ही तनाव की स्थिति देखी गई है। इस विवाद से राष्ट्र के एकीकरण को धक्का लगता है। यह जातिवाद लोकतांत्रिक क्रियाकलापों में भी व्यवधान डालता है। राजनेता जातिवाद को अपने फायदे के लिए भुनाते हैं। चुनावों के समय अक्सर देखा गया है कि विभिन्न नेता व दल जाति के आधार पर वोट मांगते हैं और वे अपने इरादों में कामयाब भी हो जाते हैं। जातिवाद ने राजनीति के आधुनिकीकरण के सपने को भी कमजोर किया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह जातिवाद धर्मनिरपेक्ष समाज के निर्माण में भी रुकावट बनकर खड़ा है।

बंटवारे के लिए आंदोलन

भारत की विभिन्नता के चलते आजादी के पहले ही साल में काफी लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि यह देश ज्यादा समय तक एक राज्य के तौर पर नहीं रह पाएगा, बल्कि कई राज्यों में बंट जाएगा। आजादी के साथ ही विभिन्न समुदायों ने आतंक और अन्य हथकंडों का इस्तेमाल कर भारत को अलग-अलग स्वतंत्र देशों में बांटने की कई कोशिशें कीं। बावजूद इसके भारत संयुक्त देश के तौर पर खड़ा है।

कश्मीर में कई संगठनों और कई भूमिगत संगठनों ने पहले तो वादी को पाकिस्तान के साथ जोड़ने की मांग की। बाद में स्वतंत्र कश्मीर की मांग मुखर हुई। सिखों ने स्वतंत्र सिख राष्ट्र खालिस्तान की मांग के लिए हथियार उठा लिए। पूर्वोत्तर भारत में भी कई संगठन स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहे हैं। ब्रिटिश शासनकाल में पूर्वोत्तर भारत असम प्रांत में था। चीन से सटे इस क्षेत्र के कई समुदायों को भारतीय कानून में आदिवासी बताया गया है। ये आदिवासी दिखने में चीनी लगते हैं, जबकि ये लोग चीनी-तिब्बती भाषा बोलते हैं। आजादी के बाद इस क्षेत्र के कई समुदायों ने चीन का समर्थन हासिल कर भारत से अलग राष्ट्र की कोशिशें कीं। 1960 के दशक में मिजोरम के विद्रोहियों ने स्वतंत्र राष्ट्र की घोषणा तक कर दी थी। भारतीय सेना ने इन विद्रोहियों का दमन किया। इसके बाद विद्रोही नेताओं ने भारत सरकार के साथ शांति समझौता किया। इस क्षेत्र के विभिन्न आदिवासी समुदायों के लिए भारत सरकार ने देश की हद में स्वायत्त राज्य बनाए। इन राज्यों को असम से अलग कर बनाया गया था।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम ने असम के लोगों को बगावती सुर दे दिए। उन्होंने भी भारत से अलग स्वतंत्र राष्ट्र की मांग उठानी शुरू कर दी। 1980 के दशक में इस क्षेत्र में एक आतंकी संगठन भी था, जिसमें पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के विद्रोही भी शामिल थे। इस आतंकी संगठन ने एकजुट होकर भारत सरकार के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया। दक्षिण भारत में देश की आजादी से पहले ही अलग दविड़स्तान की मांग सिर उठाने लगी थी। आजादी के बाद इस क्षेत्र के लोगों ने स्वायत्त द्रविड़ राज्य की मांग की। तमिलनाडु से श्रीलंका गए तमिलों ने स्वतंत्र उत्तरी श्रीलंका की मांग, जिसे भारतीय तमिलों ने पूरा समर्थन दिया।

बढ़ते क्षेत्रीय दल

आम चुनाव आम जनता के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए भी उत्सव बनता जा रहा है, इसका एक प्रमाण है पार्टियों की बढ़ती संख्या। वर्ष 2009 में आम चुनाव रूपी लोकतंत्र के यज्ञ में 363 राजनीतिक दल शामिल थे। इनमें केवल सात राष्ट्रीय दल के तौर पर मान्यता प्राप्त थे। ये हैं..

भारतीय जनता पार्टी [भाजपा]

बहुजन समाज पार्टी [बसपा]

इंडियन नेशनल कांग्रेस [कांग्रेस]

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [भाकपा]

भारतीय मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी [माकपा]

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी [राकांपा]

राष्ट्रीय जनता दल [राजद]

शेष 356 पार्टियों में 34 को राज्यस्तरीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त थी। बाकी बची 322 गैरमान्यता प्राप्त दल के रूप में पंजीकृत थीं। समय के साथ क्षेत्रीय दलों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। ये क्षेत्रीय दल स्थानीय मुद्दों और जातीय समीकरणों के आधार पर सफलता भी हासिल कर रहे हैं।

निर्दल प्रत्याशियों का दखल

चुनाव में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी भी अपना भाग्य आजमाते हैं, लेकिन पिछले छह लोकसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि विजयी निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या दहाई से भी कम रही। इनमें से कई निर्दलीय उम्मीदवार अपनी क्षेत्रीय व जातीय पहचान की वजह से मैदान में उतरे थे। वर्ष 1952 में जब पहली लोकसभा का गठन हुआ था, तो उसमें 37 निर्दलीय थे, जो सदन की कुल सदस्य संख्या का करीब सात फीसद थे।

15वीं लोकसभा तक आते-आते यह महज 9 निर्दलीय सदस्यों तक सिमट गई। वर्ष 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में 1874 उम्मीदवारों में से 533 [करीब 28 प्रतिशत] निर्दलीय थे। उनके प्रदर्शन से उत्साहित होकर अगले आम चुनावों [1957] में उनकी भागीदारी बढ़कर 31 प्रतिशत हो गई। सफल होने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या भी 37 से बढ़कर 42 हो गई। 1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन पहले जैसा नहीं रहा। उनकी संख्या घटकर 20 रह गई। यह गिरावट 50 प्रतिशत से भी ज्यादा थी। हालांकि, चौथी लोकसभा में कामयाब होने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में काफी वृद्धि हुई और यह 35 तक पहुंच गई। इसी से उत्साहित होकर 1971 में हुए पांचवें लोकसभा चुनावों में और ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरे। पांचवीं लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले कुल उम्मीदवारों में करीब 40 फीसद निर्दलीय उम्मीदवार थे। हालांकि, महज 14 ही चुनाव जीत सके और पर्याप्त मत न मिलने की वजह से कुल निर्दलीय उम्मीदवारों में 94 प्रतिशत की जमानत जब्त हो गई। पांचवे आम चुनाव के खराब प्रदर्शन के बावजूद बाद के लोकसभा चुनावों में हिस्सा लेने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हुई। छठे आम चुनाव में 50 प्रतिशत से ज्यादा उम्मीदवारों ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा। सातवें आम चुनाव में इनकी संख्या बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। आठवें आम चुनाव में इसमें और वृद्धि हुई तथा 71 प्रतिशत उम्मीदवारों ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।

11वें आम चुनावों में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवारों में 76 प्रतिशत निर्दलीय थे। 1998 में जमानत राशि में वृद्धि होने के बाद 12वें आम चुनाव में हिस्सा लेने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या घटकर करीब 40 प्रतिशत रह गई।