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तमिलनाडु में पलटेगा सियासी पासा? थलपति विजय की सरकार गिराने की बिछ रही बिसात; जानिए क्या है पूरा प्लान

By Shubham KumarEdited By: Shubham Kumar
Published: Wed, 09 Sep 2026 07:28 PM (IST)Updated: Wed, 09 Sep 2026 07:32 PM (IST)

तमिलनाडु की सियासत में थलपति विजय को घेरने के लिए विरोधी दल एकजुट होने लगे हैं। एआईएडीएमके के खुले चैलेंज ...और पढ़ें

तमिलनाडु की सियासत।

तमिलनाडु की सियासत।

HighLights

  1. AIADMK और DMK विजय सरकार के खिलाफ एकजुट होने के संकेत।

  2. विजय के गठबंधन में वाम दल और कांग्रेस से आंतरिक मतभेद।

  3. विधायकों की टूट और सहयोगियों की नाराजगी सरकार के लिए चुनौती।

डिजिटल डेस्क, चेन्नई। तमिलनाडु की सियासत इस समय एक बेहद रोमांचक और विस्फोटक मोड़ पर पहुंच चुकी है। वजह है कि एक तरफ मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय राज्य और देश में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ उनके धुर विरोधी अब हाथ मिलाने की तैयारी करने लगे हैं।

इसी बीच ध्यान देने वाली बात यह है कि बुधवार को तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) मुख्यालय में कांग्रेस, वीसीके, आईयूएमएल और एमडीएमके जैसे सहयोगियों के साथ एक अहम बैठक संपन्न हुई, जिसमें इस गठबंधन का नाम 'सेक्युलर सोशल जस्टिस विक्ट्री अलायंस' रखा गया।

विजय के खिलाफ रचा जा रहा कोई चक्रव्यू?

राज्य में चल रही सियासी गर्माहट के बीच टीवीके की आज की बैठक और योजनाओं के इतर, सतह के नीचे चल रहा राजनीतिक घटनाक्रम कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। अब सवाल तो यहां तक पूछे जाने लगे हैं कि विधायकों की टूट और सहयोगियों की तनातनी के बीच क्या थलपति की सरकार को गिराने का कोई बड़ा चक्रव्यूह रचा जा रहा है?

AIADMK और DMK की 'अंडरग्राउंड' नजदीकी

इस बात में तो कोई दोहराई नहीं है कितमिलनाडु की राजनीति हमेशा से दो ध्रुवों AIADMK और DMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन विजय के आने से यह मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।

ऐसे में हाल ही में पूर्व सीएम एडापड्डी के. पलनीस्वामी ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि वे टीवीके के खिलाफ हैं और अगर कोई अन्य दल भी इस विरोध में शामिल होना चाहता है, तो उनका स्वागत है। यहां तक कि उन्होंने डीएमके को भी अप्रत्यक्ष रूप से इस समीकरण में शामिल होने का खुला चैलेंज दे दिया है।

विधायकों में टूट भी बड़ा कारण

बता दें कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद अन्नाद्रमुक के 6 विधायक टूटकर विजय के पाले में चले गए थे। इस सियासी चोट ने पारंपरिक दलों को सकते में डाल दिया है। ऐसे में यह भी एक बड़ी वजह है कि अब विरोधी दल विजय की सरकार और उनकी पार्टी को खत्म करने के लिए वैचारिक दूरियां मिटाने पर विचार कर रहे हैं।

विजय की पार्टी की डगमगाती नींव

विजय के नेतृत्व वाले इस नए गठबंधन की नींव अभी से डगमगाती हुई नजर आ रही है। अब इसके दो कारण है। पहला कि पार्टी से लेफ्ट का किनारा करना। इस बात को ऐसे समझिए कि सीपीआई (CPI) और सीपीएम (CPM) ने टीवीके की बैठकों से लगातार दूरी बना रखी है। वाम दलों ने साफ कर दिया है कि उनका समर्थन सिर्फ बाहर से और केवल 'मुद्दों के आधार' पर होगा। वे इस गठबंधन में पूरी तरह घुलने-मिलने को तैयार नहीं हैं।

पीएम पद को लेकर कांग्रेस से टकराव

दूसरी तरफ कांग्रेस से खटपट की खबरें भी विजय की पार्टी के लिए बड़ा खतरा बनता हुआ नजर आ रहा है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि टीवीके नेताओं की तरफ से 2029 के लोकसभा चुनाव में विजय को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने की मांग ने कांग्रेस को भड़का दिया है।

हालांकि कांग्रेस साफ कह चुकी है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनके सर्वमान्य नेता राहुल गांधी ही हैं। अब ऐसे समय में इस बयानबाजी ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही अविश्वास की दीवार खड़ी कर दी है, जिसका फायदा विरोधी उठाने की फिराक में हैं।

एमके स्टालिन का 'कमबैक' प्लान

अच्छा, इन सभी के बीच डीएमके प्रमुख और पूर्व सीएम एमके स्टालिन ने भी विजय पर कड़ा प्रहार किया है। स्टालिन ने हाल ही में तंज कसते हुए कहा था कि विजय विधानसभा को फिल्म का सेट समझते हैं और डायलॉग बोलते हैं।

स्टालिन ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में यह आत्मविश्वास भरने की कोशिश की है कि डीएमके चुनाव हारने के बाद बैठने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि वह जोरदार वापसी करना जानती है। ऐसे समय में स्टालिन का यह आक्रामक रुख साफ संकेत देता है कि डीएमके अंदरखाने सरकार को अस्थिर करने या विजय के राजनीतिक प्रभाव को खत्म करने के लिए हर संभव रणनीति पर काम कर रही है।

अंत में समझिए पूरा सियासी समीकरण

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जिस तरह से पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी AIADMK और अन्य दल एकजुट होने के संकेत दे रहे हैं और सत्ताधारी खेमे के भीतर खासकर कांग्रेस और वाम दलों के साथ वैचारिक मतभेद उभर रहे हैं, वह थलपति विजय के लिए खतरे की घंटी है।

इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि एक तरफ प्रशासनिक मोर्चे पर विपक्ष के हमले तेज हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ विधानसभा के भीतर विधायकों की टूट-फूट और सहयोगियों की नाराजगी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। ये सारी बातें आने वाले दिन तमिलनाडु की राजनीति में किसी बड़े भूचाल का संकेत दे रहे हैं।