मुद्दों से खाली तमिलनाडु, सिर्फ चेहरों और चाल पर टिका चुनाव; त्रिभाषा फॉर्मूला से होगी नैया पार
तमिलनाडु चुनाव में परिसीमन और सनातन धर्म टिप्पणी जैसे मुद्दों के बावजूद कोई स्पष्ट लहर नहीं दिख रही है। डीएमके ...और पढ़ें

के. पलानीस्वामी, मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और एक्टर विजय

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जितेंद्र शर्मा, कोयंबटूर। लहरें कितना भी उफान लें, लेकिन सागर शांत ही रहता है। राजनीतिक दृष्टिकोण से ऐसा ही कुछ मिजाज समुद्र किनारे बसे राज्य तमिलनाडु का समझ आता है। त्रिभाषा फार्मूला लागू करने की बात हो, सनातन के विरुद्ध सत्ताधारी दल की टिप्पणी हो या परिसीमन जैसे मुद्दों पर सत्ताधारी डीएमके की हुंकार।
चुनाव में मुद्दों की कमी
यह ऐसे मुद्दे हैं, जिनमें दूर से काफी ताप और तपिश महसूस होती है, लेकिन भीषण गर्मी वाला यह राज्य इस मामले में ठंडा है। न तो डीएमके तमिल अस्मिता के नाम पर अपने लिए स्थानीय भावनाओं की डोर मेंअपने लिए कोई मजबूत वोटबैंक बांध सकी है और न मुख्य विपक्षी एआईएडीएमके भ्रष्टाचार से लेकर किसी मुद्दे पर सत्ता विरोधी ऐसी लहर उठा पाई, जिससे डीएमके की चुनावी नैया स्पष्ट डोलती दिखाई दी हो।
दरअसल, द्रमुक अध्यक्ष व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने फिर से बयान दिया है कि मोदी सरकार परिसीमन के माध्यम से दक्षिण के मुकाबले उत्तर भारत की सीटें लोकसभा में बढ़ाकर उत्तर भारत के हाथ में ताकत देना चाहती है। ऐसा ही राग पार्टी की उप महासचिव व सांसद कनिमोझी ने आलापा है।
स्टालिन का आरोप
इसके अलावा सीएम स्टालिन लगातार राजग गठबंधन पर इसी आरोप के साथ हमला कर रहे हैं कि एआइएडीएमके तो दिल्ली यानी कि केंद्र की भाजपा सरकार की कठपुतली बनकर मैदान में उतरी है। इसके अलावा डीएमके नेता किसी और मुद्दे पर जोर देते नहीं दिख रहे हैं।
सवाल यह है कि जिस राज्य में भाजपा अभी तिल के बराबर है, उसे ताड़ बनाने की कोशिश क्यों है? इसका जवाब फिलहाल चुनावी माहौल दे रहा है। दरअसल, द्रमुक के नेतृत्व वाले एसपीए सहित अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले एनडीए ने चुनावी रेवडि़यां हवा में तबियत से उछाली हैं, लेकिन जनता में उन्हें लपकने की ललक नहीं दिख रही है।
राज्य में चालीस हजार से अधिक मंदिर हैं। इसके बावजूद संभवत: उदयनिधि स्टालिन ने तमिल अस्तित्व, द्रविड़ राजनीति आदि के दांव के भरोसे ही सनातन धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी का साहस जुटाया, लेकिन इस मुद्दे ने कोई स्पष्ट लकीर नहीं खींची है। न मुद्दे ने अपेक्षाकृत हिंदू आस्था के मुद्दे को उफान दिया है और न ही, द्रविड़ राजनीति के उभरते चेहरे के रूप में उदयनिधि की स्वीकार्यता दिखती है।
चुनाव राजनीतिक चेहरों पर केंद्रित
सांस्कृतिक नगरी मुदरै में जरूर दीपथून विवाद की कुछ आंच है, लेकिन यह कितना असर दिखाएगी, यह समय बताएगा। मुद्दों के सन्नाटे को औद्योगिक नगरी कोयंबटूर से भी समझा जा सकता है। चूंकि, यहां फैक्ट्री-कारखाने बहुत हैं, इसलिए श्रमिक संगठनों की भरमार है। यह संगठन सालभर छोटे उद्योगों और मजदूरों के मुद्दों को उठाते रहते हैं, लेकिन फिलहाल इन मुद्दों पर भी खामोशी है। यहां तक कि पहली बार कोयंबटूर के चुनावी मैदान में वामदल का प्रत्याशी नहीं है।
प्रयास है कि डीएमके के रास्ते में कोई रोड़ा न आए। हालांकि, हिंद महासभा समर्थिक कोयंबटूर जिला टेक्सटाइल वर्कर यूनियन के पदाधिकारी मनमोहनम कहते हैं कि चुनाव में भले कोई मुद्दा न बन पाया हो, लेकिन उद्योगों और मजदूरों की बहुत समस्या है। हम जल्द ही मीटिंग करने जा रहे हैं। ऐसे में मुद्दों के खालीपन के बीच दो ही तथ्य सामने दिखाई दे रहे हैं।
देखना होगा कि जिस तरह से दोनों गठबंधनों ने छोटे-छोटे दलों के साथ जातीय आधार वाले नेताओं के चेहरे साथ जोड़कर वोटों का गुलदस्ता बनाने की कोशिश की है, वह कितना कारगर होती है और इसी तरह नजरें टिकी हैं कि टीवीके प्रमुख विजय किसका खेल बनाते-बिगाड़ते हैं।
