अश्विनी कुमार। 19वीं सदी के अंतिम दशक में की गई एक भविष्यवाणी, ‘भारत अकल्पनीय परिस्थितियों के बीच अगले 50 वर्ष में ही स्वाधीन हो जाएगा’ सच निकली। यह विश्वास उस युवा परिव्राजक स्वामी विवेकानंद का था, जिन्होंने अपने विचारों से उस दौर के समाज को चेतना के उस स्तर पर जागृत करने का प्रयास किया, जहां अपनी संस्कृति के प्रति गौरव भाव से ही स्वतंत्र लहरें उछाल मारती हैं। फिर वह भाव, सामाजिक हो या राजनीतिक, हर उस बंधन को तोड़ने के लिए आजादी की ओर स्वत: उन्मुख होता चला गया।

दिखाया वैचारिक क्रांति का मार्ग: ‘तुम बस विचारों की बाढ़ ला दो, बाकी प्रकृति स्वयं संभाल लेगी।’ स्वामी विवेकानंद के इसी मंत्र ने पूरी दुनिया को भारत की सनातन शक्ति, धर्म-अध्यात्म और उन विचारों से ओतप्रोत समाज की ओर आकृष्ट किया। पाश्चात्य की भौतिक चमक-दमक पर बहुत भारी रहा है यहां का जीवन दर्शन, फिर भला वह परतंत्र कैसे रह सकता था! जिस दर्शन ने अमेरिका और यूरोप से लेकर पूरी दुनिया को प्रभावित कर दिया हो, एक तुच्छ ब्रितानी राज उसे कैसे जीत सकता था? अपने लोगों को बार-बार महान भारत के संस्कार, यहां के वेद, ऋचाओं, महापुरुषों और सतीत्व बल से भरी देश की नारियों के बारे में बताते-बताते स्वामी विवेकानंद ने हर उस आत्मा को झकझोरने का प्रयास किया, जहां से चिंतन सूक्ष्म स्वरूप में निकलकर वैचारिक क्रांति के रास्ते लक्ष्य की ओर विराट गति से बढ़ता जाता है।

समझाई धर्म की ताकत: स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कल थे। ‘देश की पहचान तभी है, जब वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है।’ इस बात पर उनका हमेशा जोर रहा, लेकिन वह इस बात के भी पक्षधर थे कि इसके द्वार खोलने के लिए वह आत्मिक चेतना जरूरी है, जिसमें अपने पुरखों के प्रति गौरव और स्वाभिमान का रक्त शिराओं में दौड़ रहा हो। यही कारण है कि उन्होंने धर्म-अध्यात्म के मार्ग से उस चेतना को जागृत करने का बीड़ा उठाया, जहां से हर सामाजिक-राजनीतिक बंधन की गांठें खुलनी शुरू होती हैं। इसलिए उनकी सोच थी कि यूरोप की ताकत राजनीति हो सकती है, पर भारतीय समाज की ताकत उसका धर्म है, लेकिन इसका स्वरूप बहुत विराट है। यह संकुचित नहीं है।

दिया एकता का मूलमंत्र: स्वामी विवेकानंद ने इस बात को गहराई से समझा कि अगर यहां का समाज पाश्चात्य चमक के वशीभूत हो जाए तो उनके भौतिक शरीर को परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े रहने से कोई नहीं बचा सकता। यही कारण है कि वह भारत के युवाओं से आह्वान करते रहे कि उस पुण्यभूमि को समझो, जहां जन्म लेने का गौरव प्राप्त हुआ है। उस जड़ता को तोड़ने का आह्वान करता उनका स्वदेश मंत्र यही तो है- ‘हे भारत! तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श सीता, सावित्री, दमयंती हैं। मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्व त्यागी उमानाथ शंकर हैं, मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, तुम्हारा धन और तुम्हारा जीवन इंद्रिय सुख, व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता के लिए बलिदान स्वरूप रखे गए हो, मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र है।’ सबसे पहले यह जरूरी है कि अपने भाई-बहनों की पीड़ा से स्वयं का हृदय रो पड़े। यही भाव एकता की जड़ें मजबूत करेगा। जब समाज टुकड़ों में विभाजित रहेगा, कोई भी आकर शासन कर लेगा। इसलिए उन्होंने कहा कि अशिक्षित, अज्ञानी, दलित सभी तुम्हारे भाई हैं, प्राण हैं। सामाजिक स्तर पर देश को एकता के सूत्र में पिरोते हुए एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई के लिए तैयार की गई इस जमीन को महात्मा गांधी से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक ने महसूस किया।

जागृत भारत के वक्ता: ‘भारत का भविष्य’ में उल्लेख है कि स्वामी विवेकानंद ने यूं ही नहीं कहा था- ‘सुदीर्घ रजनी अब समाप्त होती हुई जान पड़ती है। महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है। महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहे हैं। जिस सुदूर अतीत के घनांधकार का भेद करने में किंवदंतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है। ..और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है।’ उन्होंने यह सार्वजनिक भाषण 25 जनवरी, 1897 को रामनाद के राजा द्वारा समर्पित मानपत्र के उत्तर में दिया था।

महिला शिक्षा का समझाया महत्व: स्वामी विवेकानंद ने इस बात को अच्छी तरह समझा कि आधी आबादी यानी महिलाओं को जब तक शिक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक देश की उन्नति और कोई भी क्रांति संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने पाश्चात्य की शिक्षा और तकनीक पर भी बल दिया, पर भारतीय सनातन आदर्श और उस नैतिक बल पर डटे रहने की शर्त के साथ। ‘सर्वप्रथम स्त्री जाति को सुशिक्षित बनाओ, फिर वे स्वयं कहेंगी कि उन्हें किन सुधारों की आवश्यकता है। तुम्हें उनके प्रत्येक कार्य में हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार है?’ इस सोच के साथ स्वामी विवेकानंद ने भविष्य के उस भारत की तस्वीर गढ़ना शुरू किया, जिसमें यहां की नारियां भी कंधे से कंधा मिलाकर हर लड़ाई में साथ चल सकें। न सिर्फ इस विचार को सामने रखा, बल्कि इसको धरातल पर सच करने का रास्ता भी सुझाया। उनके अनुसार, ‘भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिससे वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भलीभांति निभा सकें। वे संघमित्र, लीला, अहिल्याबाई और मीरांबाई आदि भारत की महान देवियों द्वारा चलाई गई परंपरा को आगे बढ़ा सकें एवं वीरप्रसू बन सकें।’

सांस्कृतिक चेतना के सर्जक: स्वामी विवेकानंद भविष्य के भारत को इस दृष्टि से देख रहे थे कि चेतना और विचार के स्तर पर यहां के लोग अपनी महान संस्कृति को समङों, क्योंकि इसी के बाद ही हर लक्ष्य आसान होता चला जाएगा। इसे नेताजी सुभाषचंद्र बोस के इस कथन से समझा जा सकता है- ‘यद्यपि स्वामी विवेकानंद ने कोई राजनीतिक विचार या संदेश नहीं दिया, लेकिन जो उनके संपर्क में आया या जिसने भी उनके लेखों को पढ़ा, वह देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो गया। उसमें स्वत: ही राजनीतिक चेतना पैदा हो गई।’ देश के महापुरुषों के इन विचारों को ‘मेरा भारत, अमर भारत’ पुस्तक में संकलित किया गया है।

धैर्य की प्रतिमूर्ति: स्वामी विवेकानंद के विचारों से लोकमान्य तिलक भी प्रभावित हुए। उनके अनुसार, ‘अंग्रेजी शिक्षा के साथ ही पश्चिम की भौतिकता का प्रवाह भी भारत में इतनी तेजी के साथ बहा चला आ रहा था कि उसे वापस लौटाने के लिए एक असाधारण धैर्यशील और बुद्धिमान पुरुष के आविर्भाव की आवश्यकता थी। स्वामी विवेकानंद के पहले यह कार्य थियोसाफिकल सोसाइटी ने आरंभ किया था, परंतु इसमें कोई दोराय नहीं है कि उस दिशा में सच्चे हिंदुत्व का आनयन सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी ने ही किया।’ इसी क्रम में कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने यहां तक कहा, ‘यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़ें।’

देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, उसमें स्वामी विवेकानंद जैसे महान मनीषी के उन विचारों को कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने जनमानस के आत्मा को झकझोर कर उन्हें नींद से जगाया। उन्हें आत्मबल, अपनी शक्ति और महान सांस्कृतिक थाती का एहसास कराया। वह कल भी लोगों के मन-मस्तिष्क में थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे!

Edited By: Sanjay Pokhriyal