'अदृश्य और खतरनाक', सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया में AI के इस्तेमाल को लेकर दी चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT के एक फैसले पर गंभीर चिंता जताई, जिसमें AI-जनरेटेड नकली उदाहरणों का इस्तेमाल किया गया था। ...और पढ़ें

एआई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दी चेतावनी। (फाइल फोटो)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने AI-जनरेटेड नकली उदाहरणों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
NCLT के फैसले को रद्द कर इंसानी नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दिया।
AI के अंधाधुंध उपयोग को 'अदृश्य और खतरनाक' बताया, सावधानी बरतने को कहा।
माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एआइ से बने फर्जी फैसलों की कानूनी मिसालें देने पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा है कि एआइ से बने फर्जी फैसलों को कानूनी मिसालों के तौर पर इस्तेमाल करना कानून और न्याय के क्षेत्र में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव जैसा है। यह अदृश्य और खतरनाक होता है, और जबतक किसी को इसका पता चलता है, तब तक यह भारी तबाही मचा चुका होता है। कोर्ट ने कहा कि एआइ से बने फैसलों या उदाहरणों का हवाला देने या इस्तेमाल करने के मामले में अदालतों को जीरो टालरेंस नीति अपनानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह न सिर्फ न्यायिक फैसले की प्रक्रिया को दूषित करता है, बल्कि उसकी असल जान (बुनियादी आधार) को भी खत्म कर देता है। इसके साथ ही कोर्ट ने एआइ से बने फर्जी फैसलों के आधार पर दिये गए एनसीएलटी और एनसीएलएटी के एक फैसले को रद कर दिया और मामला नये सिरे से निपटाने के लिए वापस भेज दिया है। ये महत्वपूर्ण फैसला गुरुवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने दिया। पीठ ने एसेल इंफ्राप्रोजेक्टस की दिवालियापन प्रक्रिया पर एनसीएलटी और एनसीएलएटी के फैसले को रद कर दिया है क्योंकि ट्रिब्युनल ने एआइ टू्ल्स से बनाए गए ऐसे फैसलों के उदाहरणों पर भरोसा किया था, जो असल में मौजूद ही नहीं थे, वे नकली थे या मनगढ़ंत थे।
पीठ ने कहा कि एआइ से बने फैसलों या उदाहरणों का हवाला देने या इस्तेमाल करने के मामले में अदालतें को जीरो टालरेंस नीति अपनाएं। कोर्ट ने कहा कि किसी वकील का बिना जांच-पड़ताल किये ऐसे फैसलों का हवाला देना गलत आचरण है। इसी तरह अगर कोई जज अपने फैसले के समर्थन में एआइ से बनी ऐसी नकली मनगढंत (भामक) सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह भी एक गंभीर चूक है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि कानून की नजर में ऐसा फैसला कोई फैसला नहीं माना जाएगा, चाहें उस सामग्री का फैसला लेने की प्रक्रिया में सीधा असर पड़ा हो या अप्रत्यक्ष।
ऐसे फैसलों को रद कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे न्याय करने की प्रक्रिया की पवित्रता का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा कि फैसला लेने की प्रक्रिया में ईमानदारी बनाए रखना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि हम बार (वकीलों) और बेंच (जजों) दोनों के लिए ऐसी सामग्री का हवाला देने, उसका जिक्र करने या उस पर भरोसा करने के मामले में जीरो टालरेंस की नीति को दोहराते और घोषित करते हैं। साथ ही स्पष्ट किया कि कोर्ट के इस फैसले का एआइ के सही इस्तेमाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बल्कि यह नकली या मनगढ़ंत सामग्री को अदालत के पुराने फैसले के तौर पर पेश करने या उस पर भरोसा करने के खिलाफ है।
कोर्ट ने ऐसी सामग्री के इस्तेमाल पर कार्रवाई और जवाबदेही की भी बात की है। कोर्ट ने बार काउंसिल आफ इंडिया को एक समिति बनाने का निर्देश दिया है जो इस मुद्दे पर विचार विमर्श करके गाइडलाइन तय करेगी और साथ ही नियमों के उल्लंघन पर की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई तय करेगी। कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए।
यह मामला पूजा रमेश सिंह, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड से जुड़े दिवालियापन के विवाद से उपजा था। अपीलकर्ता ने एनसीएलटी मुंबई के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें सेक्शन सात के तहत दीवालियापन की अर्जी को मंजूरी दी गई थी। बाद में एनसीएलएटी ने उसे सही ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एनसीएलटी ने अपने फैसले को सही ठहराने के लिए जिन कानूनी मिसालों का हवाला दिया था, वे असल में मौजूद ही नहीं थे। इनमें मनगढ़ंत केस के नाम और असली साइटेशन (हवाले) गलत तरीके से जोड़े गए थे। ये साइटेशन जांच में अस्तित्वहीन पाए गए।
हालांकि प्रतिवादी जम्मू कश्मीर बैंक ने हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट किया कि उनके वकील ने इन मामलों का हवाला नहीं दिया था और एनसीएलटी ने इन्हें अपनी खुद की रिसर्च से प्राप्त किया था। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गलती का स्रोत कानून के शासन को हुए नुकसान को कम नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे फैसलों को रद करने के अपरिहार्य परिणाम से कहीं अधिक, हमारे निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण बात ये है कि हम न्याय-निणर्यन में सहायता के लिए एआइ तकनीक को अपनाएं और साथ ही हर चरण में इंसान की भागीदारी सुनिश्चित करने हुए न्यायिक प्रक्रिया पर पूर्ण और समग्र नियंत्रण बनाए रखें।
