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संवैधानिक मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित, स्थायी संविधान पीठ गठित करने का किया आग्रह

By Mala DixitEdited By: Deepak Gupta
Published: Wed, 23 Sep 2026 08:35 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठों को भेजे गए संदर्भों के वर्षों तक लंबित रहने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

संवैधानिक मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित। (फाइल)

संवैधानिक मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित। (फाइल)

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठों के लंबित मामलों पर चिंता जताई।

  2. न्यायालय ने स्थायी पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का आग्रह किया।

  3. संवैधानिक प्रश्नों के निपटारे में अत्यधिक देरी संस्थागत असहजता का कारण।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठों को भेजे जाने वाले संदर्भों के वर्षों तक लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताई है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में बुधवार को अलग-अलग राय देने वाले न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि संदर्भों के निपटारे में अत्यधिक देरी स्वयं संस्थागत असहजता का कारण है और इससे बचने के लिए आत्मनिरीक्षण की जरूरत है।

कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से अनुरोध किया है कि संवैधानिक प्रश्नों का निर्णय करने के लिए एक स्थायी पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित करने पर विचार करें।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अपने आदेश में अनूप बरनवाल बनाम केंद्र सरकार मामले का उदाहरण दिया। इसमें 2015 में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर हुई थी।

2018 में इसे संविधान पीठ को भेजा गया और निर्णय आने में इसके बाद पांच वर्ष और लगे। इस तरह मामले को निर्णय तक पहुंचने में कुल आठ वर्ष लगे। ज्ञात हो कि यह वही मामला था जिसके बाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शतें व कार्यकाल अधिनियम 2023 बना।

पीठ ने उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले का भी उल्लेख किया। इसमें सात-न्यायाधीशों की पीठ से किए गए संदर्भ को नौ-न्यायाधीशों की पीठ तक पहुंचने में नौ वर्ष लगे और इसके बाद निर्णय में पांच महीने और लगे। न्यायाधीशों ने कहा कि इससे पहले भी यह संदर्भ 2002 से 15 वर्ष तक लंबित रहा था।

याचिकाकर्ताओं की चिंता उचित प्रतीत होती है- पीठ

पीठ ने कहा कि ऐसे में याचिकाकर्ताओं की यह चिंता उचित प्रतीत होती है कि पांच न्यायाधीशों की पीठ को भेजे गए संदर्भ वर्षों तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं। यदि आंकड़ों को मार्गदर्शक माना जाए तो कोई भी व्यक्ति उचित स्तर के विश्वास के साथ कह सकता है कि यह नहीं कहा जा सकता कि लंबे समय से लंबित संदर्भों का समाधान कब होगा।

कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं कि ये गंभीर चिंता का विषय है और संदर्भों के समाधान में अत्यधिक देरी स्वयं संस्थागत असहजता का कारण है, जिससे बचने के लिए सभी संबंधित पक्षों को प्रयास करना चाहिए। वास्तव में आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है।

कहा चुंकि संवैधानिक प्रश्नों का समाधान करना इस अदालत के न्यायाधीशों का प्राथमिक कार्य है, इसलिए यह कोर्ट की मुख्य प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। पांच से 20 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक संदर्भों का लंबित रहना संस्थान की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है। अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर उस तात्कालिकता और तत्परता से समाधान करें, जिसका यह हकदार है।

कोर्ट ने कहा कि पांच जजों की पीठ के विचार के लिए आने वाले मुद्दे देश के लोकतांत्रिक ढांचे और उसके नागरिकों के लिए मौलिक महत्व के हैं। इसलिए हमें पूरी आशा और विश्वास है कि यह संदर्भ भी अन्य मामलों की तरह अपने निर्णय के लिए अत्यधिक विलंब का शिकार नहीं होगा।