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प्राइवेट जासूसों पर नियम बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेताया, दुनिया भर के देशों में क्या हैं कानून?

Published: Sun, 20 Sep 2026 11:50 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने निजी जासूसों द्वारा जुटाए गए सबूतों और उनकी निगरानी की वैधता पर चिंता जताई है, क्योंकि भारत में इन्हें नियंत्रित करने वाला कोई कानून नहीं है।

भारत में निजी जासूसों पर कानून बनाने की सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

भारत में निजी जासूसों पर कानून बनाने की सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने निजी जासूसों द्वारा जुटाए सबूतों की वैधता पर चिंता जताई।

  2. भारत में निजी जासूसी एजेंसियों को नियंत्रित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं।

  3. सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को इस क्षेत्र के लिए कानून बनाने का निर्देश दिया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शर्लक होम्स और हर्क्यूल पोइरोट जैसे काल्पनिक जासूस सुराग मिलते ही किसी भी हद तक चले जाते थे और मामूली जानकारियों से पूरा अपराध सुलझा लेते थे। उन्हें कभी उन कानूनी सवालों का सामना नहीं करना पड़ा जो आज के असली जासूसों के सामने खड़े होते हैं।

इन सवालों में सबसे प्रमुख सवाल है, क्या किसी पर छिपकर नजर रखना कानूनी है और इसकी इजाज़त किसने दी? इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक हालिया फैसला भारत में प्राइवेट जासूसों और उनके जुटाए सबूतों के कानूनी आधार पर गंभीर सवाल उठाता है।

हिमांशु चोरडिया बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान

31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य मामले में फैसला सुनाया। इस मामले में एक पति ने अपनी पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंधों को साबित करने के लिए निचली अदालत के सामने 237 तस्वीरें और 92 वीडियो पेश किए थे।

अदालत को संदेह हुआ कि ये इलेक्ट्रॉनिक सबूत प्राइवेट जासूसों या डिटेक्टिव एजेंसियों के जरिए हासिल किए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि प्राइवेट जासूसी में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों और पर्सनल डेटा का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसे नियंत्रित करने के लिए देश में कोई कानून नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

प्राइवेट जासूसों द्वारा सबूत जुटाने की व्यवस्था को बिना नियम-कानून वाला क्षेत्र करार देते हुए कोर्ट ने कहा कि बदलते दौर में सबूत इकट्ठा करने के तरीकों से निपटने के लिए एक स्पष्ट सिस्टम की जरूरत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जासूसों को वॉयरिज्म (दूसरों की निजता में छिपकर देखने) जैसे आरोपों से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

इसके साथ ही फैसले की एक-एक कॉपी लॉ कमीशन और केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेजने का आदेश दिया गया।

भारत में नहीं है कोई कानून

भारत में प्राइवेट जासूसी एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल कोई खास कानून नहीं है। साल 2000 के नवीनचंद्र एन. मजीठिया बनाम मेघालय राज्य मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) प्राइवेट जांच एजेंसियों को मान्यता नहीं देता।

कोई व्यक्ति अपने जोखिम पर उन्हें काम पर रख सकता है, लेकिन उनकी जांच को कानूनन मान्य जांच नहीं माना जा सकता और सरकारी वकील अदालत में उन सबूतों को पेश नहीं कर सकता।

इसके अलावा आर.एम. मल्कानी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के तहत रिकॉर्ड किए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए प्रासंगिकता, स्रोत की पहचान और सत्यापित सटीकता का तीन-स्तरीय टेस्ट लागू होता है। साथ ही एविडेंस एक्ट (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम) के तहत 65B(4) का सर्टिफिकेशन भी अनिवार्य है।

केंद्र सरकार ने प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसीज (रेगुलेशन) बिल, 2007 पेश किया था, जिसमें जासूसों के लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन और प्राइवेसी के उल्लंघन पर सजा के नियम थे, लेकिन 23 मार्च 2020 को इसे राज्यसभा से वापस ले लिया गया।

दुनियाभर में अलग-अलग नियम

दुनिया के अन्य देशों में जासूसी को लेकर अलग-अलग नियम हैं। ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में जासूसों को फिंगरप्रिंट और क्रिमिनल रिकॉर्ड जांच से गुजरना पड़ता है। कनाडा के ओंटारियो में फील्ड एजेंट और एजेंसी दोनों के लिए अलग लाइसेंस जरूरी है।

सिंगापुर में पुलिस लाइसेंस जारी करती है, जबकि नीदरलैंड में न्याय मंत्रालय से परमिट लेना होता है। अमेरिका में कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में 6,000 घंटे का अनुभव और परीक्षा पास करना अनिवार्य है।

यूरोपीय संघ में प्राइवेसी कानूनों के तहत डेटा जुटाने की सख्त सीमाएं हैं। वहीं चीन ने 1993 में ही प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों पर बैन लगा दिया था और जापान अपने डिटेक्टिव बिजनेस एक्ट के जरिए पुलिस नोटिफिकेशन को अनिवार्य बनाता है।